हिन्दी नेपाल की आत्मा – विश्व हिन्दी दिवस को सादर समर्पित

लेखक–रामाशीष-एक कहावत है – ‘जादू वह, जो सिर चढ़कर बोले। इसी प्रकार भाषा वह, जो बिना पढ़े बोले। और, ‘भाषा को यह जन्मजात स्थान प्राप्त है, शिशुओं के जन्मदाता माँ में,   जो उसकेे सूक्ष्म तरंग संकेतों को भी सहज ही समझ जाती है और उसकी समस्या का झट समाधान कर देती है। इसी प्रकार वह नन्हीं सी जान भी जन्म के कुछ ही दिनों के अन्दर मां की हंसी-खुशियों की सूक्ष्म तरंगों को पहचानकर मुस्कुराहट बिखेर   देती है। और, अपनी मीठी किलकारियों से मां को गद-गद कर देती है। इसी दौरान बच्चे के मुंह से जो पहला अक्षर या शब्द निकलता है, वही आगे चलकर उसकी मातृभाषा बन जाती है।
इस नजरिए से ‘नेपाल में देखें तो यहां हिन्दी को ‘मां-शिशु बीच की सूक्ष्म-तरंग- भाषा से भी  काफी उपर का स्थान अपने आप मिल चुका  है। क्योंकि, नेपाल में हिन्दी के पठन-पाठन पर पिछले साठ वर्षों से पाबन्दी लगी हुर्इ है, इसके बावजूद, आज स्कूल का मुंह तक नहीं देखे  हुए यहां के बच्चे भी हिन्दी के दो-चार शब्द और दो चार वाक्य बोल लेते हैं। और, उनसे थोड़े बड़े अर्थात पांच से दस वर्ष के उम्र के बच्चों की बात करें तो वह अपनी तोतली बोली में हिन्दी फिल्मों के गीत तथा भजनों की दो चार पंकितयां भी गुनगुना लेते हैं। यही नहीं इस उम्र के बच्चे तो हिन्दी की ‘काटर्ूनी-कहानियां भी बखूबी पढ़ लेते हैं और टीवी पर आनेवाली हिन्दी के काटर्ून फिल्मों का मज़ा भी खूब लेते हैं। कुछ ही वर्ष पहले हिन्दी में निर्मित ”बाल गणेश नामक काटर्ून फिल्म का नेपाली बच्चों ने भी खूब मजा लिया और अभी भी जब कभी टीवी पर  बाल-गणेश फिल्म दिख जाती है तो ये बच्चे उसे जरूर देखते हैं।
यहीं देखिए, हिन्दी के मामले में तो ‘जन्मदाता मां और शिशु का आमना-सामना भी नहीं है, फिर भी यहां के बच्चों की जुवान पर हिन्दी बैठती चली जा रही है जिसे उसने अपने मां-बाप या पास-पड़ोस से कभी सुना ही नहीं। राजधानी काठमांडू या अन्य पहाड़ी शहरों के बच्चों को तो हिन्दीभाषी पड़ोसियों का भी संगत नहीं मिला जिनके सम्पर्क से वह हिन्दी के दो-चार शब्द सीख पाए होते, फिर भी राजधानी सहित हिमालय पार के मुस्तांग जिले जैसे दुर्गम क्षेत्र के बच्चे भी हिन्दी के कुछ शब्द बोल लेते हैं और हिन्दी फिल्मी गीतों को गुनगुना लेते हैं। यह हाल है राजधानी काठमांडू एवं अन्य पहाड़ी शहरों के बच्चों का, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है।
जबकि, भारत के पशिचम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों से जुड़े नेपाल के तरार्इ क्षेत्रों के बच्चों की बात करें तो वह तो सुबह से शाम तक केवल हिन्दी भजन और प्रार्थना ही सुनते हैं क्योंकि इस क्षेत्र के सभी मठ-मंदिरों में सुबह पांच बजे से ही हिन्दी भजनों के  स्वर सुनार्इ देने लगते हंै। इसके अलावा हाल के वर्षों में तरार्इ के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित एफ.एम. रेडियो स्टेशनों से भी वही भजन, कीर्तन और हिन्दी फिल्मी गानों के स्वर उनके कानों में जाते हैं। साथ ही अपने आसपास के समाज में भी हिन्दी से मिलती-जुलती भाषाएं उन्हें सुनने को मिलती हैं। वैसे भी भारतीय सीमा से लगी, एक करोड़ से भी अधिक आबादवाली नेपाल की पूर्वी सीमा मेची नदी से पशिचमी सीमा महाकाली नदी तक की 1750 किलोमीटर लम्बी और    40 किलोमीटर चौड़ी पÍी (मधेश-तरार्इ) के शत प्रतिशत लोगों की बोलचाल की भाषा मैथिली, भोजपुरी और अवधि की संगम भाषा हिन्दी है। इसका सबसे बड़ा कारण सीमापार के भारतीय क्षेत्र में सघन आबादीवाले राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड अवसिथत हैं जिनकी ‘संगम-भाषा हिन्दी है। इन राज्यों से सैकड़ो वषोर्ं से  बेटी-रोटी, नाना-नानी, चाचा-चाची, फुआ-फूफा, मौसा-मौसी, दादा-दादी, बहन-बहनोर्इ, मामा-भांजा और साला-जीजा आदि रिश्तों के अत्यन्त ही सुमधुर संबंध  हैं, जो दोनों देशों की भूमि और कानूनी सीमाओं को नहीं मानते।
इस दृषिट से मनन करने पर ऐसा लगता है जिस प्रकार शरीर में प्राण और आत्मा विधमान है, फिर भी वह दिखता नहीं। ठीक उसी प्रकार ‘हिन्दी नेपाल के मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों और जजों की कलमों से भले ही नहीं लिखी जाती हाें, सरकारी दस्तावेजों में हिन्दी के वाक्य भले ही अंकित नहीं हों, स्कूल-कालेजों में हिन्दी भले ही नहीं पढ़ायी जाती हों – फिर भी नेपाल केे मंत्रियों, अफसरों, शिक्षक-शिक्षिकाओं, विधार्थियों से लेकर साग-सब्जी और चाट-पकौड़े बेचनेवालों तक की जुवान पर हिन्दी है। यहां की आम जनता हिन्दी समझ, बोल, पढ़ और लिख सकने में सक्षम है। इस रूप में हिन्दी नेपाल में सर्वव्याप्त है, वह नेपाल की अन्तरात्मा है, जिसका भौतिक असितत्व भले ही नहीं दिखता हो लेकिन वह तो नेपाली नागरिकों के दिलो-दिमाग   का हिस्सा बन चुकी, जनजन की बोली बन चुकी है। हिन्दी नेपाल में सर्वव्याप्त है, चाहे इस तथ्य को ‘एक वर्गविशेष के शासक वर्ग और ‘शासक जातियां अपनीे ‘भारत-विरोधी राष्ट्रवाद के हठ के कारण भले ही स्वीकार नहीं करें।
स्मरणीय है कि राजा महेन्द्र ने 1959 में नवस्थापित बहुदलीय-संसदीय प्रजातांत्रिक प्रणाली की निर्वाचित सरकार की हत्या कर दी और 1965 में अमेरिकी सहयोग से शिक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत ‘शिक्षा सामग्री केन्द्र स्थापित कर, इसी के माध्यम से देश भर के लिए नया पाठयक्रम लागू कर दिया जिसमें प्रार्इमरी से लेकर हार्इ स्कूल और कालेजों तक में हिन्दी के पठन-पाठन पर पाबन्दी लगा दी। तब से तानाशाही निर्दलीय पंचायती शासन के तीस वर्षों तक तो हिन्दी के पठन-पाठन पर पाबन्दी लगी ही रही, 1990 में नेपाली कांग्रेस-नेकपा (एमाले) के नेतृत्व में हुए जनआन्दोलन के बाद पुनस्र्थापित बहुदलीय संसदीय प्रजातांत्रिक सरकारों के कार्यकाल में भी वह पाबन्दी नहीं हटायी गर्इ। और, आज गणतंत्र की स्थापना हो जाने के बाद भी हिन्दी पर लगी वह पाबन्दी कायम ही है जबकि वर्तमान सरकार में हिन्दीभाषी मधेशी नेताओं की लगभग आधे की हिस्सेदारी है।
इस असहज सिथति में भी नेपाल के बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े तक, साक्षर से लेकर स्कूल-कालेज-विश्वविधालयों तक के शिक्षक, सरकार के छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े हाकिम तक हिन्दी समझते हैं, हिन्दी बोलते हैं। वह हिन्दी पढ़ते और लिखते हैं, यहां तक कि दुर्गम पहाड़-पर्वतों की निरक्षर जनता भी हिन्दी समझ और बोल लेती हैं। और, यदि पूरे भारत में अपनी जीविका चला रहे लगभग 80-85 लाख नेपाली कामदारों की बात करें तो हिन्दी तो उनकी जीविका का मुख्य माध्यम है, उनके जीवन मरण का साथी है, उनका प्राणवायु ‘आकिसजन है।
हिन्दी का सबसे बड़ा कटु सत्य
सबसे बड़ा कटु सत्य तो यह है कि नेपाल के उन्हीं तथाकथित राष्ट्रवादियों और राजनीतिकर्मियों के आतंक से ग्रस्त, रोजगार की तलाश में भारत घुसे बेचारे दीनहीन  नेपालियों को चाहे होटलों और चाय दुकानों में प्लेट धोने या वेटरों का काम करना पड़ता हो या उन्हें दरवान, चौकीदार, ड्रइवर एवं मुम्बर्इ की ‘बहुमंजिली इमारतों में गार्ड की सलामी डयूटी देनी पड़ती हो, मीठी हिन्दी ही उन्हें विश्वसनीय और लोकप्रिय बनाती हैं। भारत के निजी घरों में झाड़ू-पोछा, चौका वर्तन (सफार्इ) और भोजन पकानेवाली नेपाली माता बहनों की हालत देखेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे लेकिन उनकी टूटी-फूटी मीठी हिन्दी ही उन्हें मालिकों के घर आए मेहमानों से अच्छी-खासी टिप्स और इनाम दिलवाती हैं। और, मुम्बर्इ के मनोरंजन गृहों  और ‘कोठों पर देह-व्यापार के नरक में जी रही लाखों नेपाली माता बहनों को यदि हिन्दी सिनेमा के गीतों पर ठुमके लगाने नहीं आए, तो उनका धन्धा ही बन्द हो जाए,। वह बिना अन्न-पानी, तड़प-तड़पकर मर जाएं क्योंकि नेपाली दलालों द्वारा ही मुम्बर्इ, दिल्ली में बेची गर्इं उक्त माता-बहनों को, उस नरक से निकलने का कोर्इ सुरंग मार्ग भी नहीं मिल पाता।
और, इससे भी थोड़ा और अधिक गहरार्इ में जाएं तो पाएंगे कि पूर्वी, दक्षिणी और पशिचमी सीमा पार करते ही, नेपाल के बड़े से बड़े भारत विरोधी, हिन्दी-विरोधी तथाकथित राष्ट्रवादी, माओवादी, समाजवादी, राजावादी और नेपाल में उत्पन्न दिन प्रतिदिन के राजनीतिक घटनाक्रमों को भारत के विस्तारवाद से जोड़नेवाले ‘नेपाल भक्त नेता भी, यह भूल जाते हैं कि वह नेपाल की धरती पर नहीं हैं, वह भारत की धरती पर आ चुके हैं, उन्हें ‘विदेश भारत में अन्तर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी में बोलना चाहिए। क्योंकि, सीमा पार करते हुए उन्हें रिक्शा चालकों, बस कंडक्टरों, रेलवे स्टेशनों पर कुली से लेकर टिकट काउन्टरों, प्लैटफार्मों, टिकट चेकरों, रेल गार्डों और रेल के डब्बों में बैठे हिन्दीभाषी यात्रियों से ही पाला पड़ता है और वही हिन्दी उनके मुंह से स्वत: फूट पड़ती है जिसके प्रति नेपाल में घृणा फैलाकर वह भारत की धरती पर पांव धरे होते हैं। क्योंकि, यदि वह हिन्दी नहीं बोलें तो उन्हें एक कप चाय, एक बोतल पानी और रेल डब्बों में भोजन तक नहीं मिले।
मातृभाषा से भी उपर हिन्दी
नेपाल के इस हालात को आखिर कहा क्या जाए ? अत: दाबे के साथ कहा जा सकता है कि नेपाल में हिन्दी ने ‘मातृभाषा से भी उपर का स्थान प्राप्त कर लिया है, चाहे नेपाल के शासकों के दिलो-दिमाग में हिन्दी को विदेशी भाषा मान बैठने का ‘कैंसर रोग क्यों न लगा हुआ हो। वैसे 2007 के मधेश आन्दोलन के दौरान तथा आन्दोलन के बाद देश भर में फैली हवा ने ‘हिन्दी से परहेज को थोड़ा हलका जरूर कर दिया जिसके फलस्वरूप मधेश के अधिकांश संविधान सभा तथा व्यवस्थापिका संसद के सदस्यों ने सदन में हुर्इ  बहस में हिन्दी में ही अपने विचारों को रखा और, उन्हें संविधान सभा के सभामुख (स्पीकर) की ‘हिन्दी नहीं बोलने की चाबुक का सामना नहीं करना पड़ा।
प्रधानमंत्री की ‘बूझ-पचायी या ‘बेर्इमानी
शायद उन्हीं संघर्षों के कारण नेपाल की नर्इ गणतांत्रिक हवा में देश भर की राष्ट्रीय भाषाओं की जो एक मान्य-सूची बनायी गयी है उसमें हिन्दी को सोलहवें स्थान पर रखा गया है।  फिर भी, ‘हिन्दी नेपाल के शासन, प्रशासन, सत्ता और राजनीति पर सैकड़ो वषोर्ं से केंचुली मारकर बैठे हुए एक वर्गविशेष के महानुभावों के गले के नीचे नहीं  उतर पा रही है। यहां तक कि नर्इ दिल्ली में शिक्षा पाए तथा चीन में लाखों व्यकितयों की हत्या कर चीन की सत्ता पर कब्जा करनेवाले माओत्से तुंग के कठमुल्ले भक्त प्रधानमंत्री बाबूराम भÍरार्इ भी हिन्दी के कÍर विरोधी हैं। वह तो पत्रकार सम्मेलनों हिन्दी में किए गए सवालों का जबाब भी नेपाली में ही देते हैं। फिर भी, पिछले दिनों जब वह तरार्इ के सिरहा जिले के एक दलित परिवार में ‘रैन बसेरा कार्यक्रम के तहत रात बीताने गए तो वहां उपसिथत गांव के लोगों (मधेशियों) को उन्होंने हिन्दी में ही सम्बोधित किया, उनके बीच हिन्दी में ही भाषण किया और उनलोगों से हिन्दी में ही बातचीत भी की। स्पष्ट है कि यहां  एक भाषा-विशेष की आड़ में, सदियों से शासन पर जमे हुए भÍरार्इ जैसे लोगों को नेपाल में हिन्दी की जड़ों के बारे में गहरार्इ से जानकारी है, फिर भी वह ‘बूझ-पचाने (जानकर भी अनजान बनने) का काम करते आ रहे हैंं।
नेपाल के शेक्सपियर ‘बालकृष्ण सम और हिन्दी
हिन्दी के इसी महत्व को स्वीकार करते हुए नेपाल के ‘शेक्सपियर मानेजानेवाले महान साहित्यकार स्व. बालकृष्ण सम ने नर्इ दिल्ली में 1967 में भारत-नेपाल मैत्री संघ द्वारा आयोजित एक सम्मान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि ”यदि हिन्दी नहीं होती तो नेपाल में जागृति नहीं आती। वास्तविकता तो यह है कि देवकी नन्दन खत्री द्वारा लिखित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति को पढ़ने की लालसा में ही हमलोगों ने, उस समय चोरी-छुपे हिन्दी पढ़ना शुरू किया, जब नेपाल में पढ़ने-लिखने पर पाबन्दी लगी हुर्इ थी। और, कुछ साधन-सम्पन्न एवं साहसी लोग ही अपने बच्चों को पढ़ने के लिए चोरी-छुपे पटना, बनारस एवं सीमापार के स्कूलों में भेज दिया करते थे जहां उनकी शिक्षा हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम से होती थी।
‘भारत-नेपाल मैत्री संघ के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. ओमप्रकाश शर्मा की अध्यक्षता में संसद मार्ग चौक सिथत नेशनल कामर्सियल बैंक बिलिडंग के एक हाल में आयोजित उक्त कार्यक्रम में महान कवि सम ने इसके साथ ही एक बहुत ही मार्मिक प्रश्न उठा डाला। उन्होंने आयोजकों को खड़ी-खोटी सुनाते हुए कहा ”यह जो भारत-नेपाल मैत्री संघ है, आखिर इसकी क्या जरूरत ? मैत्री संघ तो वैसे दो देशों के बीच बनाया जाता है जहां यह खोजना पड़ता है कि दोनों देशों के बीच कौन-कौन सी समानताएं हैं, किन-किन विन्दुओं पर दोनों देश के लोगों की मैत्री हो सकती है ? जबकि, भारत और नेपाल के बीच तो मैत्री की कोर्इ जरूरत ही नहीं। भारत और नेपाल तो खून के रिश्ते से जुड़ा हुआ देश है, दोनों ही देशों में माता-पिता, भार्इ-बहन, साला-जीजा और मामा-भांजा का रिश्ता है। हम दोनों ही देशों के लोग अयोध्या के राम और जनकपुर की सीता, मथुरा वृन्दावन के कृष्ण और राधा, पशुपतिनाथ और विश्वनाथ, मुकितनाथ और कन्याकुमारी, अमरनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम के उपासक हैं, हम सभी अपने को उन्हीं अवतारों और ऋषि-मुनियों की सन्तान मानते हैं, तो फिर हम मित्र कैसे हो सकते ? हमलोग उससे कहीं अधिक उपर हैं। इसलिए इस भारत-नेपाल मैत्री संघ की क्या आवश्यकता ? इस पर सारा हाल सन्न रह गया था और ओमप्रकाश शर्मा तो हतप्रभ हो गए, उनका गला भर आया, कुछ भी नहीं बोल सके।
सन्त नेता कृष्ण प्रसाद भÍरार्इ और हिन्दी
हिन्दी के उसी महत्व को आत्मसात करते हुए 1990 के जनआन्दोलन के बाद गठित अन्तरिम सरकार के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. कृष्ण प्रसाद भÍरार्इ ने भारतीय  दैनिक नवभारत टार्इम्स को एक विशेष भेंट में कहा था -”हिन्दी तो वह भाषा है जो न केवल पूर्वी तरार्इ के निवासियों को पशिचम तरार्इ के निवासियों से जोड़ती है, बलिक पहाड़ और तरार्इ के निवासियों को भी हिन्दी ही एक दूसरे जोड़ती है। क्योंकि, जब कोर्इ पहाड़ी युवक तरार्इ के शहरों में काम की तलाश में आता है तो वह अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में ही साहू-महाजनों से सम्पर्क किया करता है। वह न तो भोजपुरी-मैथिली-अवधि बोलता है और न ही वह नेपाली भाषा से काम चला पाता है। वास्तविकता तो यह है कि एकमात्र हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो नेपाल को भारत से सरकारी और जनस्तर तक जोड़ पाने में सक्षम है।
भावी संविधान में हिन्दी
देखना है नया संविधान कौन करवट लेता है, नये संविधान सभा में तरार्इ-मधेश क्षेत्र के हिन्दीभाषी प्रतिनिधि हिन्दी को नेपाली के बराबर का  दर्जा दिलाने में सफल होते हैं या नहीं ? क्योंकि, पिछले मधेश विद्रोह और संविधान सभा चुनाव के दौरान तरार्इ मधेश की अधिकांश पार्टियों ने मधेशी जनता को ”उनकी प्रतिबंधित भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का वचन दिया था। विश्वास किया जाता है कि आगामी चुनाव में भी मधेश में ‘हिन्दी को नेपाली के समान राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाना तो एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा ही, संविधान सभा में भी ‘हिन्दी अपने सम्मान जनक स्थान के लिए संघर्ष करती रहेगी।
हिन्दी दिवस के अवसर पर नेपाल के लगभग 400 एफ.एम.रेडियो स्टेशन हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं जो अपने महत्वपूर्ण प्रसारणों में हिन्दी सिनेमा के गीतों और कर्णप्रिय भजनों से नेपाली तथा सीमा पार के भारतीय श्रोताओं को चौबीसो घंटे मंत्रमुग्ध करते रहते  हैं। इस क्रम में नेपाल के लगभग 30 टेलीविजन चैनेल तथा भारत के भी दर्जनों टी.वी. चैनेल भी साधुवाद के पात्र हैं जो अपने लोकप्रिय हिन्दी सिरियलों और हिन्दी सिनेना के माध्यम से न केवल नेपाल, अपितु विश्व भर में ‘सहज हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और हिन्दी सीखने, समझने और बोलने में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।
दर्जनों भाषाओं का संगमस्थल – हिन्दी
”वास्तविकता तो यही है कि हिन्दी न तो बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश और दिल्लीवालों की मातृभाषा है और न ही वह शासन की तलवार के बल पर जनजन तक पहुंची है। हिन्दी तो मैथिली, भोजपुरी, अवधि, उदर्ू, फारसी, बंगला, पंजाबी, हरियाणवी, राजस्थानी, बंगाली और नेपाली आदि भाषाओं का संगम स्थल है। हिन्दी साहित्य से यदि सन्त तुलसी दास, सूरदास, मीरा बार्इ, सन्त तुकाराम और गुजराती भक्त कवियों की रचनाओं को निकाल दिया जाए तो उसका कोर्इ असितत्व नहीं बचेगा। हिन्दी की जननी भी वही संस्कृत है जो नेपाली भाषा की जननी है। इस रूप में हिन्दी और नेपाली तो सगी बहनें हैं। नेपाली और हिन्दी के इस पवित्र एवं अक्षुण्ण संबंधों को यदि नेपाली शासक वर्ग महसूस कर लें और इसे आत्मसात कर लें तो नेपाल में न केवल भाषा का विवाद सदा सदा के लिए समाप्त हो जाएगा अपितु ‘हिन्दी और नेपाली के संगम पर नेपाल और भारत दोनों ही देशों का ‘देवनागरी-साहित्य फूलेगा, फलेगा और सहज मधुर शब्द भंडारों से दोनों ही साहित्य का भंडार भर जाएगा। दोनों ही भाषाओं के विकास में चार चांद लग जाएगा।

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