हिन्दी पर प्रतिवन्ध का मतलव चीन की गुलामी स्विकारना : पूर्व मन्त्री संजय साह

भारतीय गाडी को रोकते हुये चितवन नेकपा माओवादी के कार्यकर्ता ।फोटो: चान्दनी हमाल,रिपवलिका।

राजा महेन्द्र ने पंचायती व्यबस्था को लागु करके सबसे पहला काम के रुप मे हिन्दी पर प्रतिवन्ध लगाया था । यह काम उन्होने चीन और अमेरिका के इसारे पर किया था । आज वही पंचायति मानसिकता को उजागर करते हुये नेकपा माओवादी ने भारतीय नम्वरप्लेट की गाडी और हिन्दी फिल्म पर रोक लगाकर अपने गुरु भाई बेजिगं को खुश करने का प्रयाश किया है । लेकिन इसका चौतर्फी विरोध होना सुरु हो गया है । विरोधी पार्टी ने इसपर प्रतिक्रिया देते हुये इसे तुरन्त वापस लेने को नेकपा माओवादी से आग्रह किया है । लेकिन नेकपा माओवादी ने इसे वापस लेने के वजाय विरोधी गठबन्धन से ही वापस होने की बात कही है । इससे यह साफ हो गया है कि यह प्रतिवन्ध की घोषणा एक वहुत बडा षर्यन्त्र के तहत की गयी है ।

हिमालिनी प्रतिनिधि ने इसपर कई नेताओं से बातचित की । अपनी तिखी प्रतिक्रिया देते हुये तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के महासचिव जितेन्द्र सोनल ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण वताया है तथा कहा है कि इससे  भारत के साथ नेपाल के संबंधों पर प्रतिकूल असर पर सकता है । “भारत के साथ हमारा पुराना बहुआयामी संबंध है , नेपाली के हजारों लोग भारत जाकर गंगा नदी में पवित्र स्नान करतें हैं और इसी तरह बड़ी संख्या में भारतीय भी हमारे यहाँ पशुपतिनाथ दर्शन के लिये आते हैं। सोनल ने कहा कि यह इससे पुरे देश मे विशेष कर मधेश मे अभूतपूर्व कठिनाइयों का सामना करना पर सकता है । नेकपा माओवादी अगर यह निर्णय वापस नही लेती तो मधेशी लोग सडक पर हतरने को बाध्य हो जायेगें ।
इस सिलशिला मे मधेश क्रान्ति फोरम के संयोजक एवं पूर्व मन्त्री संजय कुमार साह ने कहाँ है कि इस पर रोक लगाकर नेकपा माओवादी ने देश और जनता प्रति बिलकुल गैर जिम्मेवार होने का संकेत दिया है । भारत और नेपाल के बीच केवल व्यापारी सम्बन्ध नही है बल्कि बेटी रोटी और साँस्कृतिक सम्बन्ध भी है । उन्होने यह भी कहा कि भारत का विरोध करने का मतलव है कि चीन की गुलामी और चमम्चा गिरी स्विकार करना । नेकपा माओवादी का यह कदम पागलपन कहाँ जा सकता है । जनकपुर के नेपाली काँग्रस के नेता राजेन्द्र कुमार साह (राजु) के अनुसार माओवादी का यह कदम दोनो देश के बीच का सम्बन्ध विच्छेद करने का चाल है, जे कभी सम्भवन नही हो सकता है । उन्होने ये भी कहा कि विरोध करने से पहले उन्हे यह सोचना चहिये था की भारतीय गाडी से नेपाल सरकार को करोरों रुप्ये का टैक्स आता है । राष्ट्रीय हित सोचने वाले कभी भी नेपाल और भारत के बीच के सम्बन्ध मे दरार की बात नही करेगा । जनकपुर से ही मानव अधिकारवादी एवं प्रोफेसर विजय दत्त कहते है भारतीय गाडी और हिन्दी चलचित्र पर रोक लगाना राष्ट्रीयता नही है । दो देश बीच के सम्बन्ध खराब करने की मानसिकता हो सकता है । राष्ट्रीयता ह्रदय से होता है । किसी को विरोध करने से नही । वरिष्ठ पत्रकार सुजीत कुमार झा के अनुसार अनहोनी बाते करके हमेसा से विवाद मे रहनेवाला नेकपा माओवादी पहले अपने ही भितर देखे की इस राष्ट्र को कैसे सम्पन्न बनाया जाए । उन्हे इस विवाद मे नहीं फसकर अपने देश मे विद्दमान विवाद को समाधान  करना चाहिए । वैसे इससे पहले भी ये विदेशी कपडा और विदेशी नाम रखे स्कूल, कलेजका विरोध करके चर्चा मे आया था । राजबिराज से नेसपाआ के नेता खुशीलाल मण्डल ने नेकपा माओवादी के इस कदम को उग्रराष्ट्रवाद की पराकाष्टा करार दिया है ।उनके अनुसार यह लोगों मे भ्रम फैलाने की कोशिस है जो कभी सफल नही हो सकता । नेपालगंज से विनय दिक्षीत ने कुछ ऐसा प्रतिक्रिया भेजा है ।राजेन्द्र विश्वकर्मा,राष्ट्रिय युवाध्यक्ष मधेशी जनअधिकार फोरम, नेपाल । माओवादियोंका यह बन्द जायज नहीं है लेकिन बिना बन्द किए सरकार सुनती भी नहीं है” । लक्ष्मी नारायण बर्मा,अध्यक्ष,सदभावना पार्टी, जिल्ला कार्यसमिति बाँके ।
“ सरकारको पहल करना चहिये कि जिस तरह भारतीय गाडी निर्वाद रुपमें नेपाल में आती हैं उसी तरह नेपाली गाडियोको भी भारत में जानेकी सुविधा होनी चाहिए, सरकारी नीति होना आवश्यक है बन्द जायज नहीं है सरकारको आगे आना चहिए । ” बृजेश कुमार त्रिपाठी,सचिव,संघीय सदभावना पार्टी बाँके ।
बन्द पूर्णतया नाजायज है, क्यों कि भारत हमार मित्र राष्ट्र है और हम चन्द फायदे के कारण किसीको बाधा अवरोध नही करसकते कानून ने भी हमें वह अधिकार नहीं दिया है । कैलास दास।
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