हिन्दी भाषा के प्रति रमण पाण्डे की निष्ठा

गा“धीवाद से प्रभावित, राजनीति एवं अध्यान में अभिरुचि खनेवाला, शाकाहा भोजन कने वाला, मधेश का दुश्मन पहाड वर्ग नहीं, कुछ मधेशी है, यह कहने वाला विश्व में संख्यात्मक एवं प्रकाशन की दृष्टि से तृतीय भाषा हिन्दी के प्रति निष्ठा खने वाला तथा नेपाल में सर्म्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी को नेपाली के समान समकक्षी मान्यता दिलाने के लिए कटिबद्ध एवं २० वर्षसे केवल हिन्दी बोलने वाला व्यक्ति मण कुमा पाण्डेय का जन्म वि.सं. २०२६ मंसि २५ गते महोत्ती जिला स् िथत पिपा गा.वि.स. में हुआ है। स् पष्ट प्रख वक्ता पाण्डेय का कहना है कि ाजनीति देश का मेरुदण्ड है। प सक्षम नेतृत्व के अभाव में देश की चौतर्फी अवस् था जर्ज हो गई है। विद्यार्थी काल में गजेन्द्रनाायण सिंह के भाषण औ अपने घ-पविा का वातावण भी सद्भावपर्ूण्ा होने के काण ही ाजनीति के प्रति झुकाव होना स् वाभाविक था। इस लगाव के काण ाजनीतिक सक्रियता बढने लगी। पहाडी, मधेशी जैसे विभेदपर्ूण्ा ाजनीति का विोधी पात्र होने के काण भी ाजनीतिक यात्रा में समर्पित हुए। ‘समाज में व्याप्त सभी प्रका के शोषण को अन्त्य कने का अभियान है’, ऐसा उनका कहना है।
सद्भावना पार्टर्ीीे साथ आवद्ध हो ाजनीतिक क्षेत्र में पाण्डेय ने बढÞचढÞक अपनी सक्रियता दिखाया है। उन्होंने विद्यालय स् त से ही ने.स.पार्टर्ीीे भातृ संगठन ने.वि. मंच महोत्ती के प्रथम संस् थापक अध्यक्ष है। सद्भावना विद्यार्थी मंच के केन्द्रिय प्रचा-प्रसा एवं संगठन विभाग प्रमुख, सद्भावना युवा मंच के केन्द्रीय सदस् य वि.सं. ०६२ में सद्भावना पार्टर्ीीेन्द्रीय अनुसाशन समिति सचिव, वि.स. ०६४ में सदभावना के महासचिव का पद सम्हाल चुके हैं औ अभी वर्तमान में सद्भावना पार्टर्ीींसदीय समिति के सदस् य है।
जिम्मेवा पदों प हक काम कने वाले मण पाण्डेय अपने देश औ समाज में २० वार्षों से हिन्दी बोलने वाले व्यक्ति के रुप में जाने जाते हैं, नेपाली नहीं बोलते हैं। नेपाली भाषा नहीं बोलने में कोई विभेदात्मक भाव नहीं हैं। व अच्छी तह नेपाली बोलते है। उनका कहना है कि नेपाल औ नेपाली भाषा से प्रेम कता हूँ। पाण्डेय नेपाली नहीं हिन्दी बोल्ते हैं। इस में उनका कहना है कि नेपाल में हिन्दी भाषा को भी नेपालीभाषा की तह मान्यता दी जाय। भाषा किसी की निजी नहीं होती है। भात की ाष्ट्र भाषा हिन्दी हो जाने के काण हिन्दी भाषा भात की हो गई, ऐसी बात नहीं। नेपाल में हिन्दी को दूसी बडÞी भाषा के रुप में स् थापित किया जा सकता है। हिन्दी विश्व की दूसी बडÞी भाषा ही नहीं है, यह भाषा नेपाल में सम्पर्ूण्ा मधेशियों को जोडÞने वाली सर्म्पर्क भाषा है। हिन्दी भाषा नेपाली तथा अन्य सभी भाषाओं के बीच सर्म्पर्क काने वाली भाषा है, इस काण से भी हिन्दी भाषा को किसी भी हालत में मान्यता मिलनी चाहिए। एक भाषा-भाषी दूसी भाषा-भाषी के साथ मेची से महाकाली बीच संवाद कना पडÞा तो हिन्दी का ही प्रयोग किया जाता है। तर्सथ हिन्दी को नेपाल में  द्वितीय भाषा के रुप में स् थापित कना चाहिए, ऐसा उनका मानना है।
नेपाल में हिन्दी को मान्यता तथा लोकप्रियत बनाने की लडर्Þाई में २० वर्षसे संलग्न है। हिन्दी को नेपाली के समकक्ष ाष्ट्रभाषा के रुप में स् थापित कने के लिए दृढसंकल्पित है। बी.बी.सी. साझा सवाल का बहिष्का उन्होंने इसलिए किया क्योंकि आयोजकों ने उन्हें हिन्दी में बोलने इजाजत नहीं दिया। माईक देक भी उनसे जब माईक वापस लिया गया, उससे पर्ूव उन्होंने दृढता के साथ कहा कि मैं पिछले २० वर्षो से खस भाषा नहीं बोलता हूँ। जब उन्हें हिन्दी में नहीं बोलने दिया तो साझा सवाल प्रस् तोता नाायण श्रेष्ठ को पण्डेय ने भी सभा में साम्प्रदायिक भावना से ग्रस् त हो क काम कने वाला पत्रका कहते हुए कार्यक्रम का बहिष्का क दिया था। हिन्दुस् तान दैनिक पत्रिका से बातचीत कते हुए पाण्डे ने कहा कि मधेश में प्रयुक्त मैथिली, भोजपुी, अवधी थारु आदि भाषाओं के आधा प कोडÞ मधेशियों को बाँट देती है औ यहाँ की एकता को ाजनैतिक पार्टियाँ कम कके स् वार्थ साधना कती है। हमाी सर्म्पर्क भाषा हिन्दी है। अतः इस सर्म्पर्क भाषा हिन्दी को नेपाली के समकक्ष ाष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए मैंने भी भीष्म प्रतिज्ञा की है। जिससे मैं जीवन के अन्तिम क्षण तक निर्वाह करने की कोशिश करता रहुँगा ।

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