हिन्दी साहित्य का समर्पित व्यक्तित्व

डा. मो. मजीद मिया:कभी कभी मन कुछ कहता है किन्तु बाहरी दुनियां में हम इस तरह उलझे हुए है कि वह आवाज हमारे कानों तक नहीं पहुँचती । फुर्सत में जब कभी हम अपने मन की बातें सुनते हैं तो वो बातें कुछ लेखनी के माध्यम से हमारे सामने आ जाती हैं । हर एक मनुष्य का स्वभाव अलग एवं उनका अपना होता है । सभी मनुष्य एक दूसरे को पसंद नहीं करते और पसंद करना ही होगा ऐसा भी नहीं है । साधारणतः मानवीय स्वभाव एवं चरित्र हर एक मनुष्य का अलग–अलग होता है । साधारणतः मनुष्य किसी को उनके काम के कारण पसन्द करते हैं तो किसी को विभिन्न स्वार्थवश पसन्द करने के लिए बाध्य हो जाते हैं । कुछ लोग किसी के व्यक्तित्व एवं व्यवहार के कारण पसन्द ना करने पर भी उसके द्वारा किए गए कार्य के कारण भी प्रशंसा करते देखे जाते हैं । इस संदर्भ में सुनने को मिलता है– ‘स्वभाव से मनुष्य जैसा भी हो उनके कार्य की प्रशंसा करनी चाहिए’ । कहने का आशय है कि किसी भी मनुष्य की प्रशंसा उनके साहित्यिक क्षेत्र में संलग्नता एवं कार्य के कारण करनी चाहिए ।
आज मैं उस हिन्दी दुनिया के चहेते एवं हमेशा दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहने वाले व्यक्ति की प्रशंसा में अपने अनुभव को साझा करना चाहूँगा जो मेरे और मेरे जैसे कितने ही छात्र–छात्राओं के लिए पुज्यनीय एवं मार्गदर्शक हैं । मैं क्या कहूँ अगर आपको कभी उनसे मिलने का मौका मिला तो देखेंगे की उनके हर एक वाक्य में सादगी एवं सहजता झलकती है और उनके सावभाव के साथ–साथ शारीरिक बनावट भी बहुत आकर्षक है । अक्सर देखा गया है कि वे अपने मेहनती स्वभाव के कारण कठिन परिस्थितियों में भी साहित्य सृजन में लगे रहते हैं । यह भी जग जाहिर है कि उनका भीतर का स्वभाव हमेशा से गरीब एवं बेसहारा छात्र के प्रति समर्पित रहा है और वे हमेशा उनके भविष्य को लेकर गंभीर भी रहते हैं । हिन्दी के साथ–साथ नेपाली एवं बंगला भाषा के प्रति उनका लगाव एवं प्रेम उनके व्यापी सोच एवं हृदय को चरितार्थ करता है कि वे हिन्दी के साथ–साथ दूसरे भाषा को लेकर कितने गंभीर हैं यह उनकी लेखनी एवं व्यक्तित्व से ही पता चलता है । वे अपना सम्पूर्ण जीवन संघर्षपूर्ण बिताते हुए भी सामाजिक कार्याें में संलग्न रहकर प्रगतिवादी दर्शन को परिभाषित करते हुए अपने सामाजिक मानसिकता को प्रदर्शित करते हैं ।
मैं जहाँ तक उनको जानता हूँ तो आप साहित्य के विभिन्न विधा में अपना कलम चला चुके हैं । कविता, लेख, आलेख आदि में उनका लेखन एवं रुचि ही उनका अलग परिचय है । साहित्य के विभिन्न विधाओं में उनका लेखन ही उनके बहुमुखी व्यक्तित्व को दर्शाता है । उनकी साहित्यिक प्रतिभा औपचारिक रूप में ‘रवीन्द्रनाथ और हिन्दी साहित्य’ से आरम्भ माना जाता है । उनकी विभिन्न भाषाओं में पकड़ एवं उनका बंगला एवं नेपाली साहित्य को लेकर शोध कार्य के कारण ही आप अपने देश मे ही नहीं पड़ोसी देश नेपाल एवं भूटान के साहित्यिक संस्थाओं से आबद्ध हैं । उनके द्वारा पिछले कुछ समय पहले प्रगतिशील लेखक संघ नेपाल के केन्द्रीय उपाध्यक्ष होकर अपने साहित्यिक व्यक्तित्व को क्रमशः आगे बढ़ाते हुए देखा गया है ।
हिन्दी साहित्य जगत एवं हिन्दी विषय के विद्यार्थी के लिए डॉ. तिवारी एक प्रखर परिचित नाम हैं । आप एक कुशल समालोचक, प्रवीण भाषाविद, एक आदर्श शिक्षक, एक सफल अनुवादक, एक पक्के साहित्यकार एवं एक चिंतक हैं । आपका जन्म १९७२ को ग्राम देहमा, जिला–गाजीपुर, उत्तरप्रदेश में हुआ था । इससे पता चलता है कि आप ने अपने जीवन में कितने ही साहित्यिक बसंत पार कर लिया है । आपके पिता स्वर्गीय शिव पूजन तिवारी, माता श्रीमति श्याम बदन तिवारी आप ने अपनी शिक्षा में एम.ए., बी.एड., पी–एच.डी, साथ ही रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (हिन्दी–अँग्रेजी–बंगला) कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरा किया । साथ ही आप २०१५ तक नानी भट्टाचार्य स्मारक महाविद्यालय, पो–जयगाँव,जिला–जलपाईगुड़ी में हिन्दी विभाग के सम्मान जनक स्थिति में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक रह चुके हैं । वहाँ एवं साथ ही पूरे उत्तर बंगाल के जनसाधारण के बीच हिन्दी विषय एवं साहित्य को सम्मान जनक स्थिति में लाने का श्रेय आप ही को जाता है ।
प्रकाशन – प्रकाशन के क्षेत्र में डॉ. तिवारी बहुत धनी हैं । आप ने अपने अल्प आयु में ही बहुत से प्रसिद्ध पुस्तकें प्रकाशित किया है जो हमारे हिन्दी साहित्य जगत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । अभी तक उनके द्वारा रचित ढेरों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आप के द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में १. रवीन्द्रनाथ और हिन्दी साहित्य, २. ‘तुलसीदास और भानुभक्तः सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य’, ३ . ‘हिन्दी कहानीः संवेदना के धरातल पर’, ४. ‘समय, संकट और उत्तरण’ शीर्षक पुस्तक का बंगला से हिन्दी में अनुवाद ।
अनुवाद– ‘समय, संकट और उतरण’ शीर्षक पुस्तक का बांगला से हिन्दी में अनुवाद ।
अन्य– हिन्दी की विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में आलेख एवं कवितायें एवं अनुवाद प्रकाशित हुई है । आप के द्वारा लिखित आलेख एवं आपके सामाजिक एवं साहित्यिक विचार हिन्दी के विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है ।
इनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों एवं आलेखों से हम सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए । हिन्दी साहित्य के अध्ययन एवं अध्यापन में डॉ. तिवारी का महत्वपूर्ण योगदान मेरी जुबानी ही नहीं किसी भी उत्तर बंगाल के हिन्दी शाखा के छात्र–छात्राओं से आपको पता चल जाएगा । आप हिन्दी भाषा से लेकर नेपाली एवं बंगला भाषा के साहित्य जगत के विभिन्न बदलाव एवं उतार–चढ़ाव के अध्ययन एवं लेखन में आज तक सक्रिय हैं । आप विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रपत्र प्रस्तोता, साहित्य एवं विभिन्न सामाजिक संस्थाओं आदि में पदाधिकारी, विभिन्न साहित्य समारोह आदि में मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, स्रोत व्यक्ति आदि से युक्त व्यक्तित्व हैं । आपको भाषा के एक–एक शब्दों को परिष्कृत कर उसके अर्थ, व्युत्पत्ति आदि के बारे में चिंतन करते हुए देखा जाता रहा है और सबसे बड़ी बात यह कि अपने भाषा के अलावे दूसरे भाषाओं का ज्ञान प्राय सभी को होता हैं पर आप मे बंगला एवं नेपाली भाषा के बारीक ज्ञान को देखकर ऐसा लगता है कि बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जिनको ऐसा ज्ञान होता है । आपके द्वारा लिखा प्रत्येक लेख बौद्धिक चिंतनपरक एवं यथार्थ से जुड़ा होता है । आपके द्वारा रचित ‘तुलसीदास और भानुभक्त सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य’ में नेपाली एवं तुलसी कृत भारतीय संस्कृति के एकरूपता के विषय में अत्यंत गहराई है जो नेपाली एवं भारतीय संस्कृति में संबंध को चरितार्थ करता है ।
डॉ. तिवारी में विभिन्न अनुभव एक भाषाई एवं सामाजिक ज्ञान का भंडार है । आप स्रुवयं ही इतिहास एवं संस्रुरुकृति संस्रुरुमररुण केरु पुस्रुरुतक हैरुंरु। आप उत्तररु बंगाल मेरुं दार्जिलिंग, जलपाईगुडवयं ही इतिहास एवं संस्कृति संस्मरण के पुस्तक हैं । आप उत्तर बंगाल में दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी एवं उत्तर पूर्व राज्य सिक्किम आदि क्षेत्रों में इकलौते ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें हिन्दी साहित्य के साथ–साथ नेपाली एवं बंगाली समाज एवं साहित्य में भी सम्मान जनक दृष्टि से देखा जाता है । कुछ दिनों की ही बात है आपको भानुभक्तीय रामायण एवं तुलसी कृत रामचरितमानस पर तुलनात्मक अध्ययन के ऊपर बहुत ही परिष्कृत एवं सजीवता के साथ व्याख्या करते हुए देखा गया था । जिसे उत्तर बंगाल के नेपाली समाज के साथ–साथ पड़ोसी राज्य सिक्किम एवं पड़ोसी देश नेपाल मे भी बहुत सराहा गया है ।
डॉ. तिवारी अत्यंत ही मिलनसार, हँसमुख, युवा जोश से पूर्ण, सदाचारी, गुणी, सरल एवं सहज व्यक्तित्व वाले हैं और सबसे बड़ी बात यह कि आप छात्रवर्ग के मध्य बहुत ही प्रिय एवं सम्मानीय हैं । मैंने तो अपने जीवन में ऐसे शिक्षक को पहली बार देखा है । आज के दौड़ में जहां छात्र के साथ–साथ उनके अभिभावक जहां हमेशा शिक्षक वर्ग से चिढ़े रहते हैं और आज के शिक्षक जिनको शिक्षण से ज्यादा अपने व्यापार की पड़ी है वहाँ एक ऐसे व्यक्ति जिन्हें अपने शिक्षण, लेखन एवं छात्रों से प्रिय कुछ नहीं है, जिसके कारण आप हमेशा से ही अपने छात्रों के लिए पूज्य एवं आदरणीय हैं और रहेंगे । तिवारी जी कठिन दिनो मे भी स्वार्थपूरती के लिए कभी भी गलत पथ पर चलते हुए नहीं देखे गए एवं जो लोग उनकी आलोचना करते हैं उनके लिए कभी भी उन्होने उनकी आलोचना नहीं की उल्टे आप उनकी प्रशंसा करते हुए देखे जाते हैं । आप हमेशा से कठिन परिस्थिति में गरीब बेसहारा बेरोजगार एवं शोषित छात्रों के लिए अपने आवाज को शोषकों के विरुद्ध बुलंद करते हुए देखे गए हैं । मैं एवं उत्तर बंगाल के छात्र–छात्राएं जितनी भी इनकी प्रशंसा करें वह सूरज को दिया दिखने जैसा ही होगा । और उनकी प्रशंसा मे क्या लिखूँ हम छात्रों एवं हिन्दी साहित्य प्रेमियों की यही शुभ कामना है कि ऐसे ही आप अपने द्वारा रचित लेखों को साहित्य की दुनिया में लाते रहें एवं अपने छात्रों की इसी तरह अपने बच्चे की भांति प्रेम एवं सहयोग करते रहें जिससे कि हिन्दी साहित्य के साथ–साथ पूरे समाज का भला होता रहे । आजकल आप जिस रचना में लगे हुए हैं वह रचना भी जल्द ही पूरा हो, आप के जोश में कमी न आए, और ज्यादा से ज्यादा गरिमामय पुरस्कार आप के हाथ लगे, आप के बच्चे उन्नति करे और आप ही की तरह वें भी हिन्दी जगत के लिए कुछ अलग करे, सभी तरह के सुख–समृद्धि आप को प्राप्त हो तथा आप के स्वस्थ दीर्घायुर एवं प्रगति की कामना हम सभी उत्तर बंगाल के छात्र एवं साहित्य प्रेमी करते हैं ।

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