हिन्दी साहित्य में हास्यरस

हंसी जीवन का एक महान वरदान है। दुःखों का सबसे बडÞा इलाज। हँसी विनोद स्वस्थ शरीर का ही नहीं, स्वस्थ चरित्र का भी लक्षण है। नागची नामक किसी जापानी कवि ने कहा था- ‘जब जीवन के किनारे की हरियाली सूख गई हो, चिडियों की चहक मूक हो गई हो, र्सर्ूय को ग्रहण लग गया हो, मेरे मित्र और साथी मुझे काँटो में अकेला छोडÞकर कतरा गए हों और आकाश का सारा क्रोध मेरे भाग्य पर बरसने वाला हो, तब हे भगवान्, तुम मुझ पर इतनी कृपा करना कि मेरे होठों पर हँसी की एक उजली लकीर खिंच जाय।’

विश्वप्रसिद्ध प|mेंच लेखक वाल्तेयर ने प|mान्स की राजधानी में साहित्यकारों की एक सभा में कहा था कि जो हँसता नहीं, वह आदमी नहीं और जो आदमी नहीं, वह लेखक नहीं हो सकता। इसी सर्न्दर्भ में संस्कृत के किसी कवि की यह पर््रार्थना प्रसिद्ध है, जिसमें उसने कहा था कि हे भगवान् और चाहे जो हो, मेरे भाग्य मंे यह न लिखना कि मुझे किसी अरसिक के सामने कविता पढÞनी पडÞे। हिन्दी साहित्य में हास्यरस की प्राचीन और सुदर्ीघ परंपरा विद्यमान है। कुछ आलोचकों की यह धारणा है कि पाश्चात्य साहित्य के हास् य-पात्र क्लाउन और बफून संस्कृत नाटकों के विदूषकों की सन्तान हैं। इसलिए भार तीय आख्यायिकाएं, नाटक, गीत, महाकाव्य, वृहत्कथा, पंचतंत्र, जातक, अविमारक, शाकुंतल आदि इस बात के प्रमाण हैं कि हिन्दी साहित्य में करुणा और हास्य धूप छाँह की तरह खेलते रहते हैं।

हालांकि हिन्दी साहित्य के आरंभकाल वीरगाथाकाल में जो रचनाएं प्रस्तुत हर्ुइं, उनमें हास्य के लिए प्रायः आवकाश नहीं है। फिर भी इन्हें र्सवथा हास्यशून्य नहीं कहा जा सकता, बल्कि इनके कुछ हास्यस्थल तो बडÞे मनोहार ी हैं। पृथ्वीराज रासों में चन्द्र वरदाई और जय चन्द की वार्ता में प्रत्युत्पन्नमतित्व पर आश्रति हास्य-व्यंग्य का अच्छा उदाहरण है। वीरगाथाकाल के बाद हिन्दी साहित्य में संतो की वाणी गूँजी। वैसे तो जगत् की निस्सार ता दिखलाकर आध्यात्मिक रहस्य के चितेरे संतो की बाणी में भी हास्य के लिए उतना अवकाश न था। लेकिन कुछ स्पष्टवादी संतों ने जब ढोंगी पंडितों-मुल्लाओं की चारित्रिक असंगतियों का खुलासा किया, तब अनायास ही चरित्रगत व्रि्रूपता से उत्पन्न हास्य जो शास्त्रीय दृष्टि से हसित के उपवर्ग अपहसित और कहीं-कहीं विहसित को उदाहृत करता है, आ गया। यहाँ प्रसंगवश स्मरणीय है, आधुनिक विवेचन के अनुसार हास्य के तीन प्रकार होते हैं- हास्य, विनोद और व्यंग्य। हास्य में हार्दिकता, विनोद में प्रत्युत्पन्नमतित्व -हाजिर जवावीपन) और व्यंग्य में आक्रमण के भाव होते हैं। हिन्दी में शुद्ध हास्य का एक अत्यन्त ही कोमल उदाहर ण संत सूरदास ने कृष्ण-बाललीला में उपस् िथत किया और खूबी यह है कि उसका आधार मनोवैज्ञानिक है। इसी प्रकार विनोद एवं व्यंग्य से पूरित उपालंभ-काव्य के रूप में इनके भ्रमर गीत की जितनी प्रशंसा की जाए, थोडÞी है।

इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिभा यहाँ अप्रतिहत है। इनके रामचरित्र मानस के अर्न्तर्गत दुष्ट-बन्दना, पर्वती-परीक्षा, शिव- विवाह, नारद-मोह, कपटीमुनि, धनुषयज्ञ, पर शुराम-लक्ष्मण-संवाद, केवट-प्रसंग, हनुमान- प्रसंग, कैकेयी-मंथरा-संवाद, अंगद-रावण- संवाद, कलिर्-धर्म-वर्ण्र्ााआदि में हास्य का जीवनव्यापी रूप देखने को मिलता है। और इसके बाद का रीतिकाल प्रायः हास्यशून्य र हा। फिर भी रीतिकालीन और वीरगाथा-कालीन कवियों की अतिशयोक्तियां भी कहीं-कहीं काफी शिल्पपर्ूण्ा हास्य की वानगी पेश करती हंै। भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी के प्रथम हास् यावतार हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य में सबसे प्रथम उन्होंनें ‘अँधेर नगरी’ और ‘ताजीराते शौहर’ नामक प्रसिद्ध हास्यव्यंग्य ग्रंथ लिखे। उनके साथियों में प्रतापनारायण मिश्र ने सर ल और ललित हास्य की अवतारणा की और बालमुकुन्द गुप्त ने अत्यन्त पैने व्यंग्य लिखे। बालकृष्ण भट्ट, शिवपूजन सहाय, विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक इत्यादिने हिन्दी को श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं दी। बाबू गुलाब राय ने इस क्षेत्र में नई शैली और शिल्प को जन्म दिया। जीपी श्रीवास् तव ने अनेक हास्य उपन्यास लिखे, हालांकि शिल्प एवं कथा की दृष्टि से वे ज्यादा अच्छे नहीं माने जाते। हरिशंकर शर्मा भी एक सुरुचिपर्ूण्ा हास्यलेखक के रूप में पहचाने जाते थे। इसके बाद की पीढÞी में अनेकों हास् यकार आए। जिनमें अन्नपूर्ण्ाानंद वर्मा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हास्य को गंभीर ता से लेने वाले सम्भवतः वे पहले लेखक थे। मंुशी प्रेमचन्द ने भी अपने उपन्यास और कहानियों में हास्यव्यंग्य की मात्रा भरपूर दी है।

भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, बेढÞब बनारसी, श्रीनारायण चतर्ुर्वेदी और राधाकृष्ण ने अत्यंत सुन्दर एवं कलात्मक हास्य-व्यंग्य लिखा। अन्नपूर्ण्ाानंद के बाद राधाकृष्ण अगले महान व्यंग्यकार हैं। अमृतराय ने हास्य-व्यंग्य को एक नयी शालीनता प्रदान की। प्रभाकर माचवे और अज्ञेय ने भी हास्य-व्यंग्य में अपनी कुशलता दिखाई। भारत भूषण अग्रवाल की रचनाएं भी स्मरणीय हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क ने अच्छे प्रहसन और व्यंग्य दिए हैं। उसी प्रकार इन्द्रनाथ मान ने भी विनोदपर्ूण्ा निबंध लिखे हैं। रामनारायण उपाध्याय ने भी इस क्षेत्र में अच्छा काम किया है। काका हाथरसी ने तो देश-विदेश में अपनी हास्य टोली के साथ हास्य को सफलता पर्ूवक मंचित किया। इस पंक्तिकार को भी वीरगंज के टाउन हल में काका हाथरसी की टोली के साथ हास्यकवि सम्मेलन में सहभागी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यह अजीब इत्तफाक र जब कोई कार्य प्रेभभाव के साथ किया जाता है तो उसमें तत्काल सफलता मिलती है। हिन्दी साहित्य में हास्यरस काका हाथरसी श्रीलाल शुक्ल सहादत हसन मन्टो हिमालिनी l

जनवरी/२०१४ द्दघ हा कि काका हाथरसी के दामाद प्रसिद्ध हास् यव्यंग्यकार अशोक चक्रधर की हास्य टोली के साथ भी उसी वीरगंज के टाउन हाँल में मुझे हास्य कविता वाचन करेन का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ । इसके बाद हिन्दी में हास्य-व्यंग्य की जोर् नई पीढÞी आई, उसकी शुरुवात केशवचन्द्र वर्मा से हर्ुइ। फिर हास्य-व्यंग्य में प्रचण्ड मार्तण्ड की तरह उदित हुए श्रीलाल शुक्ल। इनके उपन्यास ‘रागदरवारी’ ने तो कमाल ही कर दिया। मेर ी अपनी राय में तो नेपाली साहित्य के हास्य- व्यंग विधा में जो उच्चतम स्थान स्वर्गीय भैरव अर्याल को प्राप्त है, वही स्थान हिन्दी साहित्य के हास्य-व्यंग्य क्षेत्र में श्रीलाल शुक्ल को प्राप्त होना चाहिए। व्यंग्य और हास्य का अनूठा संगम श्रीलाल शुक्ल ने पेश किया है। उनकी जितनी तारीफ की जाय कम ही है। फिर आए हरिशंकर परर्साई, शरद जोशी और रवीन्द्रनाथ त्यागी। हरिशंकर परर्साई ने हास्य-व्यंग्य को उसका अपना स्थान दिलवाया। हरिशंकर परर्साई ने अपने लेखन का क्षेत्र खास कर राजनीति को बनाया। उसी तरह शरद जोशी ने अपना जोश शिल्प के नए-नए जल्वे दिखाने में लगाए।

र वीन्द्रनाथ त्यागी ने सरकारी दफ्तरों का सौ दिन चले र्ढाई कोस वाला रवैये और रिश्वतखोर ी पर लालित्यपर्ूण्ा ढंग से कटाक्ष किया। शान्ति मेहरोत्रा और मुद्राराक्षस को भी इस सर्न्दर्भ में याद करना ही होगा। हास्य-व्यंग्यकारों की नई जमात फिर नए जोश के साथ सामने आई। इस अगली पीढÞी में नरेन्द्र कोहली, लक्ष्मीकांत वैष्णव, आविद सुरती, केपी सक्सेना तथा लतीफ घोंघीने धूम मचाई। अजातशत्रु, ज्ञान चतर्ुर्वेदी, शंकर पुणतांवेकर, सुवोधकुमार श्रीवास्तव और्रर् इश्वर शर्मा ने भी अपने-अपने करतब दिखाए। इस तरह हिन्दी साहित्य में हास्य-रस की परंपरा फलती-फूलती रही। और भी बहुत सारे लेखक हैं, जो पेशेवर हास्यव्यंग्यकार न होते हुए भी कभी-कभार अपना योगदान करते रहे। इनके नाम और इनकी प्रसिद्ध रचनाओं का संक्षिप्त उल्लेख सान्दर्भिक रहेगा। वृन्दावनलाल बर्मा -मेंढकी का व्याह), सीताराम चतर्ुर्वेदी -माननीय शिक्षामन्त्री) आप जितना प्रेम देंगे, उतना प्रेम पायेंगे। आपके पास प्रेम जितना अधिक होगा, इसे दान करना उतना ही सहज हो जायेगा। शरद जोशी अशोक चक्रधर हरिशंकर परर्साई हिन्दी साहित्य के कुछ स्वनामधन्य व्यंग्याचार्यों का ऐसा अभिमत है कि हास्य-व्यंग्य लेखन की वास्तविक शुरुवात भारतेन्दु युग में ही हर्ुइ, सोद्देश्य हास्य एवं पैने व्यंग्य, कविता लेख तथा प्रहसनो के माध्यम से इसी युग में लिखे गए। पहले पत्रकार कितने प्रतिवद्ध, निर्भीक तथा आदर्शवादी थे इसका अनुमान भारतेन्दु की फाइलों का अवलोकन करने पर लग सकता है। इसका प्रथम अंक सन् १८८३ में निकला था। इसके सम्पादक राधाचरण गोस्वामी वृन्दावन से इसे निकालते थे।

‘मथुरा प्रेस’ के मालिक पं. रामनारायण द्वारा इसे प्रकाशित किया जाता था। राधाचर ण गोस्वामी भारतेन्दु मण्डल के प्रमुख लेखकों में से थे। ‘श्रीमद् अंग्रेजदेव महापुराण’ भारतेन्दु के कई अंकों में क्रमशः निकला, यह गद्य तथा पद्य दोनों में है। सूतजी और ऋषियों में वार्तालाप हो रहा है। ऋषियों ने कहा- ‘हे सूतजी, आपने अंग्रेजों के ऐर्श्वर्य का वर्ण्र्ाातो किया अब कुछ माहात्म्य का वर्ण्र्ााकीजिए।’ सूतजी वर्ण्र्ााकरते हैं- प्रातः नाम अंग्रेज उचारे, इच्छा भोजन तुरतहि पावै। जो अंग्रेज मुख दर्शन करे, विविध पाप ताके हरि हरै। जो अंग्रेज कर्राई सम्वादा, ताके बेगहि मिटहिं विषादा। जो अंग्रेज पद धूलि परे, तुरतहि भवसागर को तरै। जो अंग्रेज प्रसादहि पावै, सो बैकुण्ठ धाम को जावै। जो अंग्रेज को डÞाली देवे, सो ट्रैजरी की ताली लेवे। जो अंग्रेज की गाली खाय, कभी न किस्मत खाली जाये। जो अंग्रेज की लात साहारे, बाकौं काल कबहु नहीं मारे। जो नर क्रोधाविष्ट, अंग्रेज हाथ मरि जाए। कल्प-कल्प शातकल्प लो, र्स्वर्गलोक सुख्याय। उपरोक्त व्यंग्य राधाचरण गोस्वामी की निर्भीकता का ज्वलंत उदाहरण है।

ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों के विरोध में लक्षणा में दो टूक लिखना तत्कालीन सम्पादकों की राष्ट्रीय भावना का ही द्योतक है। ‘स्रोत-शैली’ में हास्य-व्यंग्य लिखना उस समय बहुत प्रचलित था। ‘रलेवे स्रोत’ का एक अंश देखें- ‘हे अगतिक गाडÞी। तुम्हारी गति कोई नहीं जानता। कभी तुम लम्बे मैदान में वेग में भर कर हिलती डुलती हाथी की तरह चलती, कभी स्टेशन निकट जान हंस की तरह मन्थर गमन कर, तो कभी बडेÞ-बडÞे पुलों पर घोडों की तरह दौडÞती, कभी इंजिन गरम करने या गाडÞी काटने के समय गधे की तरह दुलत्ती फेंकती, कभी स्टेशन के भीतर चिउंटी की चाची बन जाती, कभी बहुत सी सडÞकें देख कर तवाइफों से भी अधिक नखरे करती, विशेषतः कभी तीर सी सीधी, कभी नदी सी बांकी, कभी इन्द्र धनुष के समान झुकी, कभी र्सर्पिणी के समान ललित त्रिभंगी बलखाये हुए गमन करतीं, इसी से बोध होता है कि तुमने वाजिद अली शाह के परियों के अखाडÞे में तालीम पाई है या प्रिन्स विस् मार से कुटिल राजनीति सीखी है।

हिन्दी मासिक भारतेन्दु में १३१ वर्षपहले छपे व्यंग्य के दो नमूने द्दद्ध हिमालिनी l जनवरी/२०१४ हम जिससे प्रेम करते हैं, हमारा स्वरूप व व्यक्तित्व वैसा ही बन जाता है। , धर्मवीर भारती -गुलीवर की तीसरी यात्राः एक समुद्री कहानी), भीष्म साहनी -लेनिन का साथी, चीफ की दावत), मोहन राकेश -पर मात्मा का कुत्ता), फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ -अतिथि- सत्कार, राशिफल, अगिनखोर), निरंकुश -साले के घर एक दिन), संतोषनारायण नौटियाल – नबाब साहब ने मोटर खरीदी), कमलेश्वर – लाश), विद्यानिवास मिश्र -मैंने सिल पहुँचाई , रामकुमार भ्रमर -जातक कथाएँ , रोशनलाल सुरीरवाल -एक मन्त्री का भौगोलिक विवरण) , मनोहर श्याम जोशी -दिल्लीः एक और तस् वीर), ज्ञानरंजन -रचना-प्रक्रिया), जहुर बख्श – दवाई , मोहनलला गुप्त -आर्य समाजी श्वसुर) , बदी उज्नमां -एक चूहे की मौत), यशपार – चक्कर क्लब), विजयदेव नारायण साही -समय का व्यापार), शारदाप्रसाद श्रीवास्तव -चिमिरखी ने कहा था) और मदन वात्स्यायन -ग्रीष्मवर्ण्र्ाा इस सर्ैदर्भ में स्मरणीय हैं। पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, कुँवर सुरेश सिंह, बलराज साहनी और हजारी प्रसाद द्विवेदी की रचनाएं भी उल्लेखनीय रही हैं। इसी सर्न्दर्भ में हमें जरूर स्मरण रखना होगा, निराला की कृति ‘बिललेसुर बकरिहा’ और महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘दंडदेव का आत्म निवेदन’ को भी। हालांकि ये पेशेवर हास्यव्यंग्य लेखक नहीं हैं। पंडित पदम सिंह शर्मा के खतूत व्यक्तिगत होते हुए भी नितांत ललित और विनोदपर्ूण्ा होते थे। इसी प्रकार गोविन्द मिश्र का उपन्यास -वह अपना चेहरा) भी व्यंग्य की दृष्टि से बेजोडÞ है।

हिन्दी पत्रकारिता ने भी हास्य-व्यंग्य विधा को भरपूर मदद की है। भारतेंदु की पत्रिका ‘कविवचन सुधा’, प्रतापनारायण मिश्र का ‘ब्राहृमण’ हास्यव्यंग्य से पर्ूण्ा रहता था। कलकत्ता के ‘सार सुधानिधि’, कालाकांकार का हिन्दुस्थान और काशी का ‘भारत जीवन’ व्यंग्य-विनोद के लिए काफी लोकप्रिय थे। ‘भार त-मित्र’ का तो संपादन ही प्रख्यात हास्यकार जगन्नाथ प्रसाद चतर्ुर्वेदी ने किया था। ‘प्रयाग समाचार’ में गोपाल राम गहमरी हास्य-व्यंग्य का नियमित काँलम लिखते थे। ‘धर्ूत पंच’ एक विशुद्ध हास्यपत्र था, जो १८९१ में कलकत्ता से निकलता था। मतवाला, चाँद, माधुरी, सुधा, आज, वीर अर्जुन, तरंगिणी, विश्ववंधु, सार थी, लोकमान्य सभी पत्रों ने हिन्दी हास्य- व्यंग्य को समृद्ध बनाया। आधुनिक काल मेंर् धर्मयुग, कल्पना, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारि का शर्ंकर्स वीकली, का सहयोग भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी सिसिले में एक स्मरणीय बात- हिन्दी हास्य-व्यंग्य पर अब तक लगभग दो सौ विद्वान डाँक्टरेट ले चुके हैं। हिन्दी की अनेक श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं का अनुवाद अन्य देशी और विदेशी भाषाओं में हुआ है। उर्दू के लोकप्रिय लेखकों को भी हिन्दी ने अपने हास्य-व्यंग्य की बगिया में महकने का मौका दिया है, जैसे- शौकत थानवी, शफीकर्ुरहमान, फिक्र तौंसवी, कन्हैयालाल कपूर, कृश्न चंदर, सलमा सिद्दीकी, राजेन्द्र सिंह बेदी, मुज्तवा हुसेन और सहादत हसन मंटो को कौन भुला सकता है। मार्क ट्वेन के शब्दों में कहें तो- समाज की सही और ‘कन्सट्रक्टिव’ तस्वीर उतारने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा व्यंग्यकार पर ही र ही। वाकईर् इस जिम्मेवारी को हिन्दी के हास्य- व्यंग्यकारों ने बखूबी निभाई है। J प्रस्तुतिः मुकुन्द आचार्य सर्न्दर्भ ग्रन्थ १. रवीन्द्रनाथ त्यागी, -उर्दू-हिन्दी हांस्य व्यंग्य) २. डा. बरसानेलाल चतर्ुर्वेदी -‘प’ से पगडÞी)

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