हिन्दी है- जन जन की भाषा

प्रो. नवीन मिश्रा:नेपाल में हिन्दी जन जन की भाषा है। आपको यह सुनने में भले ही अतिशयोक्ति लगे लेकिन अगर आप गम्भीर तापर्ूवक विचार करें तो पता चलेगा कि यह वास्तविकता है। नेपाल में हिन्दी न सिर्फ भोजपुरी, मैथिली या अन्य स्थानीय भाषा बोलने वाले मधेशियों के द्वारा समझी और बोली जाती है बल्कि काठमांडू और नेपाल पहाडÞ के अधिकांश भागों के निवासियों द्वार ा भी बोली जाती है, विशेष कर जब वे गैर पहाडÞी लोगों से बात करते हैं।hindi dibas-himalini hindi magazine

एक घटना मुझे याद आ रही है। मैं काठमांडू के फुटपाथ पर घूम रहा था। फुटपाथ के किनारे एक १०, १२ वर्षकी पहाड लडकी कपड के थान बिछा कर उसे बेच रही थी। इतनी र्सर्दी में यह छोटी लडकी दूकान चला रही है, सोच कर मैंने उससे उसकी दूकान में रखी कपडÞे की एक थान की तरफ इशारा करते हुए पूछा कि ‘कति पर्छ -‘ उसने ऊपर मेरे चेहरे पर देखते हुए बोली कि ‘एक मीटर का पचास रूपया है।’ मैने उससे कहा कि तीस रूपए मीटर हुँदैन – उसने फिर जवाब दिया- ‘इतना कम नहीं होगा, कुछ और बढना पडगा।’ स्पष्ट है कि मैं उसे नेपाली में बात कर रहा था लेकिन वह हिन्दी में जबाव दे रही थी। मुझे आवश्यकता नहीं थी, लेकिन वात्सल्यभाव से मैने उससे दो मीटर कपडÞे खरीद लिए। ऐसी घटना अकेली नहीं है। आप किसी टैक्सी या दूकान वाले से नेपाली में बात कीजिए, वह आप को हिन्दी में जवाब देगा।

प्रजातान्त्रिक नेपाल में यह एक बहुत बडÞा बदलाव है, जिसमें कल तक का ‘ मरसिया’ आज हिन्दीभाषी के रूप में पहचाना जा रहा है। इतना ही नहीं नेवारी भाषी भी जब अपने पितरों का पिण्डदान करने गया जाते हैं तो टूटी-फूटी हिन्दी में ही बात करते हैं। यही वास्तविकता है। नेपाल में हिन्दी की कहानी बहुत बार लिखी, कही जा चुकी है, जिसे दुहराना बेनामी होगा। संक्षेप में बस इतना ही कि राणा शासन काल तक स्कुलों और काँलेजों में भी हिन्दी माध्यम से पढर्Þाई होती थी और बच्चे कक्षा में हिन्दी किताबें ही पढÞते थे, जिसमें लिखा होता था कि हमारे देश के प्रधानमन्त्री का नाम जवाहर लाल नेहरु है। तानाशाह महेन्द्र के शासन काल में उनके गुगोर्ं के द्वारा शुरु किया गया हिन्दी का उन्मूलन। हिन्दी और हिन्दी बोलने वालों को राष्ट्र विरोधी की संज्ञा दी जाने लगी।

हिन्दी के लिए यह काल किसी काले दिवस से कम नहीं था। लेकिन इस काल में भी प्रा.डा. कृष्णचन्द्र मिश्र जैसे कुछ हिन्दी प्रेमी लोग थे, जिन्होंने पञ्चायती आँधी में भी हिन्दी रूपी दीपक को बुझने नहीं दिया। बहुदलीय प्रजातान्त्र की घोषणा के बाद परिस् िथतियाँ बदली और धीर-धीरे हिन्दी को अपनी खोई हर्ुइ प्रतिष्ठा वापस मिलने लगी। हालांकि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाँकी है। कुछ दूसरी भाषा के पृष्ठपोषक भी नेपाल में हिन्दी के प्रति दर्ुभावना रखते हैं, जो गलत है। मैं तो कहता हूँ कि भाषा तो दीपक के समान है। आप अंधेरे घर में दीपक जलाएंगे, उजाला होगा, दूसरा दीपक जलाएंगे उजाला दुगुना हो जाएगा, तो फिर दर्ुभावाना कैसी – मैं अपने खुद का उदारहण आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। मेरी नियुक्ति स्नातकोत्तर कक्षा में राजनीति शास्त्र पढÞाने के लिए कीर् गई थी। उस समय मुझे नेपाली बिल्कुल भी नहीं आती थी। एम.ए. कक्षा में माध्यम अंग्रेजी होने के कारण मुझे कोई असुविधा नहीं हर्ुइ। एक वर्षके अन्दर ही बी.ए. के छात्रों की मांग पर मुझे बी.ए. का क्लास लेना पडÞा, जिसका माध्यम नेपाली था। मुझे बिल्कुल ही नेपाली नहीं आती थी लेकिन मैं घबराया नहीं और

इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। मैंने पहले ही दिन बच्चों को एक कहानी सुनाई- हिन्दी के प्रसिद्ध कवि निराला जी को एक बंगाली वाला से प्यार हो गया, जिससे उन्होंने शादी कर ली। सुहागरात के दिन यह समस्या उठ खडÞी हर्ुइ कि पति-पत्नी के बीच में बात कैसे हो। क्योंकि निराला जी को बंगाली नहीं हाती थी और उनकी पत्नी को हिन्दी। रात दोनों में समझौता हुआ कि निराला जी अपनी पत्नी को हिन्दी सिखाएंगे और उनकी पत्नी उनको बंगाली।

मैंने भी छात्रों से कहा कि मैं तुम लोगों को राजनीति शास्त्र सिखाउँगा और तुम लोग मुझे नेपाली। और यही हुआ। आज मैं अपने को ज्यादा धनी मानता हूं कि मुझे अंग्रेजी, हिन्दी के साथ साथ नेपाली भी आती है। मैंने कभी भी किसी भाषा के प्रति दर्ुभावना नहीं रखी और यही कारण है कि आज मैं र ाजनीति शास्त्र के साथ साथ मैथिली केन्द्रीय शिक्षण समिति का भी सदस्य हूँ। नेपाल में हिन्दी की अनेक समस्याएं है। लेकिन जितनी नहीं समस्याएं है, उतनी गढÞ ली गई हैं। सबसे पहली समस्या इसके प्रचार- प्रसार की है। एक समय पूरे देश में हिन्दी स् िथापित थी। लेकिन आज समस्या यह है कि जहां से हिन्दी का उद्भव और विकास हुआ है, वहीं से कुछ ऐसी समस्याएं है, जिसके कार ण यह पूरे देश की एक मात्र सर्म्पर्क भाषा के पद पर समासीन होने पर भी अपेक्षित रूप में विकसित और समृद्ध नहीं हो पा र ही है।

प्रजातन्त्र की स्थापना के इतने दिनों बाद भी वैसा नहीं हो रहा है, जैसा होना चाहिए था। इसका मूल कारण आपसी भाषा के प्रति गौरव और गरिमा का अभाव लक्षित होता है। सरकार की दुहरी नीति के कार ण भी हिन्दी नेपाल में उपेक्षिता की तरह प्रतिभाषित हो रही है। यदि नेपाल के हिन्दी प्रेमी विद्वान, मनीषी तथा सरकारी कर्मचारी हिन्दी के समुन्नयन की ओर अग्रसर होते तो आज हिन्दी तर्राई में ही नहीं पहाडÞ में भी प्रचार पाती। नेपाल में हिन्दी की दर्ुदशा और उपेक्षित भावना लज्जा का विषय है। हिन्दी की आन्तरिक समस्याओं में पारि भाषिक शब्दावली समस्या, अनुवाद की समस् या, व्याकरण की समस्या तथा लिपि की समस् या भी उर्ठाई जाती है। एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। लेकिन जब वह पारिभाषिक बनता है, तब उसके सारे अर्थ छोडÞ दिए जाते हैं और केवल एक अर्थ ही शेष बच जाता है। एक सुनिश्चित शब्द का बोध कराने वाला ही पारि भाषिक शब्द है, जिसे टेक्निकल या प्राविधिक कहते हैं। नेपाल में पञ्चायती व्यवस्था पर्ूव सरकारी कामकाज और दफ्तरों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार था लेकिन पञ्चायती काल में हिन्दी के पारिभाषिक शब्दों की उपेक्षा हर्ुइ। दूसरी सबसे बडÞी समस्या अनुवाद की है। अनुवाद शब्द का अर्थ है- ज्ञातार्थ का पुनः कथन। किसी भाषा से किसी भाषा में अनुवाद करना अत्यन्त कठिन है।

उसी तरह से किसी काव्य या साहित्य का दूसरी भाषा में हूबहू अनुवाद का होना कठिन है। फिर भी वैज्ञानिक युग की मांग के कारण विभिन्न भाषाओं के अनुवाद वैज्ञानिकों और प्राविधिकों द्वारा किए जा रहे हैं। अनुवाद कई ढंÞग से होते हैं, जैसे शब्दानुवाद, अर्थानुवाद, रूपानुवाद, भावानुवाद आदि। फिर भी आज के युग में अनुवाद का होना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि दूसरे देशों में जो वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं, काव्य लिखे जा रहे हैं। उनका तब तक प्रचार नहीं हो सकता, जब तक अनुवाद की प्रणाली काम में न लायी जाए। यदि अनुवाद में ही एक रूपता हो जाए तो अनुवाद की समस्या का सहज हल निकल सकता है। यान्त्रिक युग में वैज्ञानिक शब्दावली, औषधी शब्दावली, तथा अन्य विभिन्न विषय की शब्दावली के अनुवाद के बिना या उसके हिन्दीकरण के बिना उन विषयों की विशिष्टताओं से अवगत होनार् र्सवथा अकल्पनीय है। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान के द्वारा अनुवाद के क्षेत्र में कुछ सराहनीय प्रयास किए गए है लेकिन अभी तक हिन्दी की किसी पुस्तक का प्रकाशन नहीं हुआ है। नेपाल में हिन्दी की जो उपर्युक्त समस्याएं उर्ठाई गई है, वे केवल हिन्दी की नहीं बल्कि सभी भाषाओं की हैं। इनका समाधान कुछ लेने और कुछ छोडÞने में है। तभी हिन्दी नेपाल में मेची से महाकाली तक सर्म्पर्क भाषा बनने में र्समर्थ होगी। J

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