हिमालय के दक्षिण में बढ़ता चीन का प्रभाव : बाबुराम पौड्याल

चीन कुुछ सालों से एक वृहत योजना पर काम कर रहा है । वह ‘वन वेल्ट वन रोड’ और प्राचीन ‘सिल्क रोड’ को अधुनिक रूप में संचालन की अवधारणा पर इस समय तेजी से काम कर रहा है । इन दो योजनाओं का मकसद जल और स्थल मार्गो के जरिये यूरोप और उससे आगे तक चीनी प्रभाव को विस्तार करना है और दुनिया में अपना एक जबरदस्त लबी तैयार करना है । इसी मकसद से वह दुनिया में अपने नेतृत्व में एक प्रभावकारी संजाल को अंजाम देने में लगा है । उसके इन योजनाओं पर दक्षिण एशिया के श्रीलंका, पाकिस्तान, मालद्वीप, बांगलादेश ने किसी न किसी रूप में सम्मिलित होने का मन बना लिया है । और तो और, नेपाल भी हाल ही में चीन के इन महत्त्वाकांक्षी योजनाओं में रणनीतिक हिस्सेदार बनने को मंजूर हो गया है । भारत और पश्चिमी ताकतों को चीन की इस योजना के प्रति गम्भीर आशंकाएं हैं । उन्हें लग रहा है कि चीन इन्हीं योजनाओं के तहत अपनी सामरिक प्रभाव विस्तार का आकांक्षी है । भारत इस समय यूरोप और अमरीका के साथ सम्बन्धों को सुधारने में लगा है । इसी फिराक में उसने अपने ही पासपड़ोस को नजरअन्दाज करता दिखाई दे रहा है । ऐसी स्थिति से भारत और उसके साथ पारम्परिक सम्बन्धों से जुड़ते आ रहे देशों पर किस तरह का असर पड़ेगा, सवाल खडेÞ हो गए है ।Tibet China

भारत ने चीन के साथ संबन्ध न रखने के लिए मालद्वीप और श्रीलंका पर दबाव दिया था परन्तु दोनों ने दबाव को अस्वीकार कर दिया । अब भारत पर इन देशों मेेंं आन्तरिक अस्थिरता उत्पन्न करने की शंकाएं की जा रही है । नेपाल में चीन के साथ नई समझदारी के पक्षधरों को सत्ता के बाहर रखते हुये दिल्ली की मनपसन्द सरकार को काठमाण्डो की सत्ता पर बिठाकर चीन के साथ हुये सम्झौतों को व्यवहारिक रूप से निष्क्रिय करने के मकसद से परदे के पीछे खेल जारी है । क्योंकि भारत की यही पड़ोस नीति है जो दशकों से आज तक चलरहा है । इससे शंकाओं को बल मिल रहा है ।

बेमिसाल बताये जानेवाले सम्बन्धों में दरार आने के बाद भारत द्वारा नेपाल पर की गर्ई अघोषित नाकाबन्दी के दौरान नेपाल के उपप्रधान तथा परराष्ट्रमंत्री कमल थापा एक नेपाली प्रतिनिधि मण्डल का नेतृत्व करते हुये चीन के दौरे पर थे । बताया जाता है, वहां चीनी अधिकारियों ने एक शानदार दफ्तर में उन्हें दुनिया का एक मानचित्र दिखाया जिसमें पाकिस्तान, मालद्वीप, श्रीलंका, बंगलादेश से लेकर अफ्रीका और ल्याटिन अमेरीका तक कई देशों के कई स्थानों पर लाल धब्बों के निशान अंकित थे । निशान भारत पर भी थे परन्तु बहुत कम और नेपाल पर भी लगभग वही फीकापन था । इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता की चीनी अधिकारियों को उनके नेताओं ने ही नेपाली मेहमान को यह मानचित्र दिखाने को कहा होगा । नहीं तो पड़ोसी देश नेपाल के उपप्रधानमंत्री जैसे उच्चस्तरीय मेहमान को बेवजह यह सब दिखाने का सवाल ही पैदा नहीं होता । असल में मानचित्र पर अंकित ये लाल धब्बे दुनिया के उन जगहों पर पूजी निवेश, व्यापार और विभिन्न रूप में चीन की उपस्थिति के संकेत थे ।images (4)
पिछले दशक तक तिब्बत से सटे हिमालय के दक्षिण में चीन का फैलाव आज के मुकाबले बहुत कम था । यह सच है, किसी जमाने में पाकिस्तान को छोड़कर लगभग सारे दक्षिण एशिया में भारत की तूती बोला करती थी । परन्तु अब वहां चीन की उपस्थिति में भारी बढ़त के आसार दिखाई दे रहे हंै । माओ के बाद चीनी नेता देङ शियाओ पेन ने कम्यूनिष्ट पार्टी के ही नेतृत्व में बन्द चीन के दरवाजों को बाकी दुनिया के लिए खोलते हुए एक मौलिक आर्थिक उदारीकरण शुरु किया था । उसके बाद के तकरीबन तीन दशक में चीन ने सफलता की लम्बी छलाङ लगायी है ।
मानचित्र के आड़े में चीन, नेपाली उपप्रधानमंत्री को दिखाना चाहता था कि हमारी तरक्की से दुनिया के बहुत देश फायदा उठा रहे है,ं परन्तु भौगोलिक रूप से करीब होते हुये भी नेपाल हम से अब भी बिराना ही नही, पिछड़ भी गया हैै । मतलब, नेपाल चीन की तरक्की से जुड़ने से चूक गया है । भारत के साथ तनावपूर्ण सम्बन्ध को झेल रहे नेपाली मंत्री को तब जरुर लगा होगा कि भारत पर विश्वास कर वाकई में नेपाल ने बड़ी गलती कर ली है । जो भी हो अपनी बात समझाने का चीनी कूटनीति का यह एक प्रभावकारी तरीका है । मानचित्र की इसबात पर कुछ नेपाली मीडिया ने कुछ हल्की सी टिप्पणियां जरुर की परन्तु इसके भीतर की कूटनीतिक गम्भीरता पर कोई खास चरचे नहीं हुए । वाकई में यह चीन की अपनी नेपाल नीति के सहारे दक्षिण एशिया में पूजी, व्यापार और सेवा के जरिये प्रभाव विस्तार की इच्छा का एक सांकेतिक प्रक्षेपण था ।
चीन अपनी बात समझाने के लिए विभिन्न देशों से राजनीतिक से प्राविधिक तक हर दरजे के लोगों को दौरे पर बुलाता है । हर समय वहां सैकड़ों इसतरह के विदेशी मेहमानोंं का तांता लगा रहता है ।

इस पर वह सालाना बड़ी धन राशि खर्च करता है । ऐसे मेहमानाें के माध्यम से वह अपने विचारों को प्रसारण करता है और विदेशो में अपने पक्ष में जनमत तैयार करता है । आजकल चीन में सभा, सेमिनारों की भारी तादाद में आयोजित किये जा रहे हैं । ऐसे मंचों का भी वह अपनी ख्याति के लिए इस्तेमाल कर रहा है ।

आगन्तुक दो बात बड़े शालीन अन्दाज में कहना नहीं भूलते । पहला, बडेÞ देशों को विपन्न और छोटे देशों पर नाजायज दवाव नहीं लादना चाहिए और दूसरा, अपने आसपास के देशों के विकास के वगैर चीन का सम्पूर्ण विकास असंभव है इसलिए आइए मिलकर आगे बढें । चीन की इन चिकनी चुपड़ी बातों के आवरण के अन्दर कोई भयानक त्रासदी छुपी तो नहीं,ंं सोचने को विवश होना पड़ता है । इन मीठी बातों के पीछे चीन का एक दूरगामी स्वार्थ है । शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ तीसरे विश्व के गरीब और नवस्वतन्त्र देशों का गुटनिरपेक्ष आन्दोलन भी असान्दर्भिक सा हो गया । अतः छोटे और अविकसित देशों के हित में बोलनेवालों संगठित अन्तररष्ट्रीय मंच की कमी हो गई है । कभी प्रजातन्त्र और विपन्न तीसरी दुनिया के देशों के पक्ष में वकालत करने का यश भारत को था । पर अब चीन दुनिया के ऐसे देशों के पक्ष में बोलने और अपने दीर्घकालिक योजनाओं पर शामिल करने में लगा है ।

अफीम युद्ध के जमाने में अंग्रेज चीन को सोया हुआ शेर से तुलना करते थे । इसीलिए वे चीन को अफीम के नशे में सुलाये रखना चाहते थे । बीते तीन दशक में चीन की द्रुततर आर्थिक विकास ने अब उसें दुनिया में अपना प्रभाव विस्तार करने की आकांक्षा को स्वभाविक रूप से जगा दिया है । उनकी ही बात माने तो चीन अब सोया नहीं, जाग गया है । माओकालीन और देङकालीन दोनों रूप में चीन दक्षिण एशिया में अपनी पहुंच बनाने के लिए नेपाल और पाकिस्तान से विशेष सम्बन्ध चाहता रहा है । यह इसलिये कि नेपाल और पाकिस्तान उस की सुरक्षा के लिये भी रणनीतिक महत्व रखते थे ।

दोनों में से नेपाल ही चीन के लिए और अधिक रणनीतिक महत्व रखता था । फिर भी उसने नेपाल पर कभी भी अनुचित दबाव नही डाला । नेपाली कूटनीतिज्ञ चीन और भारत के बारे में अक्सर कहते हैं कि भारत अपनी बात दवाब के जरिये स्वीकार करने को बाध्य करता है तो चीन सब्र और सहयोग रास्ता अपनाता है । चीन और भारत की नेपाल नीति में यह मौलिक भिन्नता है । लम्बे समय बाद नेपाल में व्यवहारिक अड़चने नहीं आई तो चीन की इच्छा पूरी होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं ।fkixrKIndia-China-Wa_India-China-Wa%bcgh_India-China-Wa_India-China-Wa-_India-China-Wa_India-China-War
सन् १९६२ में सीमा विवाद के चलते भारत और चीन के बीच युद्ध तक हो गया था । पंचशील और भाई भाई की प्रचारबाजी का तिलस्मी शीशमहल बुरी तरह ढह गया था । दोनों की आपसी दुश्मनी और अन्तरराष्ट्रीय हिसाब से चल रहे शीतयुद्ध का प्रभाव भी यहां के शक्ति सन्तुलन पर पड़ा । तिब्बत कब्जे के बाद चीन के प्रति चारों ओर सशंकित माहोल बना । परन्तु उसने नेपाल को उसकी सुरक्षित सार्वभौमिकता के लिए विश्वास दिलाया । तिब्बत के विलय के पश्चात स्वतन्त्र तिब्बत के पक्षधरों ने दलाईलामा के नेतृत्व में भारत में शरण लिया । सन् १९७४ में लामा के समर्थक तिब्बती खाम्पाओं ने नेपाल के मुस्ताङ जिले को प्रयोग करते हुये स्वतन्त्र तिब्बत के पक्ष में चीन के खिलाफ हथियारबन्द वगावत करने लगे । इस बगावत में कुछ अन्तरराष्ट्रीय खुफिया एजेन्सियां भी सक्रिय थी । चीन का सशंकित होना स्वभाविक था । नेपाल ने खाम्पा विद्रोह को दमन कर एक चीन नीति को व्यवहारिक तौर पर समर्थन किया । चीन की चाह के बावजूद भी नेपाल ने भारत और चीन के बीच समदूरी रखने की कोशिश की । नेपाल के इस रवैये ने भारत को असंतोष कर दिया था । सन् १९९० में नेपाल में राजतन्त्र के अन्त होने में भारत का यह असंतोष भी प्रमुख कारणों में एक था ।
बदलते समय के साथ चीन ने सीमा विवाद को यथास्थिति में रखते हुये भी भारत के साथ आर्थिक और व्यापारिक सम्बन्ध को आगे बढ़ाने की सोच को आगे ले आया । दोनों ने नये सिरे से आर्थिक सम्बन्धों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी किया । बरसों से बन्द नथुला पास को व्यवसायिक प्रयोजन के लिए खोल दिया गया । अब इसके जरिये दोनों देशों के बीच खरबों में व्यापार हो रहा है । तब लगा था कि आनेवाले समय में चीन, भारत और जापान जैसे देशों की समझदारी के चलते दुनिया का अर्थिक नेतृत्व एशिया के हाथों में होगा । इस समझदारी से संभावित विकास से यहां के अन्य देश भी फायदे में रहेंगे । लेकिन सोच भले ही रही है परन्तु दोनों के बीच की पुरानी सशंकित मानसिकता अब भी कमोबेस बरकरार लगती है । इस समय दुनिया में पारम्परिक सामरिक राष्ट्रवाद के बदले आर्थिक सोच का जरुर विकास हो गया है । परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि पुराने रणनीतिक और सामारिक आवश्यकता का अन्त हो गया । उनके अवयवों का प्रभाव अब भी बरकरार है । भारत और चीन के हालिया सम्बन्ध इसका उदाहरण है ।
विगत में कईवार चीन नेपाल में विभिन्न योजनाओं परं काम करने का प्रस्ताव कर चुका है परन्तु नेपाल में चली लम्बी राजनीतिक अस्थिरता, संक्रमण और भारत पर नेपाल की पारम्परिक निर्भरता के कारण चीन रुको और देखो की स्थिति में था । आखिर में चीन का सब्र रंंग लाया और नेपाल अपनी ही आवश्यकता के कारण चीन के समीप हो गया । दुनिया के बडेÞ ताकतों का चीन पर चल रही निगरानी और तिब्बत की संवेदनशीलता के मध्येनजर नेपाल के प्रति चीन की ‘वटर डिप्लोमेसी’ का मकसद सिद्धान्तः पूरा हो रहा है । परन्तु अभी भी इसकी व्यवहारिक निश्चितता पर संदेह है । चीन भी जानता है कि नेपाल में राजनीतिक उठापटक के कारण समझदारियों पर अमल न होने की संभावना ज्यादा है । अतः वह हरएक सम्झौतों पर और उच्चस्तरीय प्रत्याभूति चाहने लगा है ।
सन् १९९० के परिवर्तन के बाद नेपाल के सरकारों ने भी बाध्यात्मक व सहज दोनों परिस्थितियों में चीन की अपेक्षा भारत की ओर नजदीक रहना ही उचित समझा । नेपाल में एक प्रचलित कहावत है कि दिल्ली की इच्छा के बगैर नेपाली राजनीतिक वृक्ष के पत्ते तक नहीं हिलते हैं । इतनी मजबूत पकड़ के बावजूद नेपाल को मैनेज करने में भारत विफल हो गया लगता है । वह इन दिनों अमरीका, यूरोपियन यूनियन और बेलायत जैसे देशों को साथ लेकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपने प्रभाव बढ़ाने का प्रयास करने लगा है नेपाल के मसले पर उनके साथ समान सोच विकास कर रहा है । अबतक हर एक मसले को आपसी माननेवाले भारत की नेपाल नीति मे आया यह महत्वपूर्ण बदलाव है । भारत, अमरीका, ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन की चौकड़ी का एक मात्र उदेश्य चीन के उपर निगरानी और उसके योजनाओं को विफल करना है । नेपाल मे इस चौकड़ी का प्रभाव किस रूप में प्रकट होगा शीघ्र ही देखने को मिलेगा ।

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