हिमालिनी की सोलहवषर्य-यात्रा

नेपाल से प्रकाशित ‘हिमालिनी’ हिन्दी मासिक पत्रिका विभिन्न उतार-चढावों को पार करती आज सत्रहवें वर्षमें प्रवेश कर चुकी है। अपनी यात्रा के इस लम्बे अन्तराल में यह विपरीत परिस्थितियों में भी हिन्दी का अलख जगाती रही है। निश्चय ही सन् १९९र्८र् इ. में जब इसका प्रकाशन आरम्भ हुआ उस समय देश की राजनैतिक परिस्थिति बहुत कुछ हिन्दी के अनुकूल नहीं थी, इसके बावजूद भी भेद- विभेद, अपेक्षा-उपेक्षा को झेलती यह निरन्तर अपने पथ पर अग्रसर रही और अपने प्रकाश को मन्द नहीं होने दिया। यद्यपि प्रारम्भ में इसका स् वरूप साहित्यिक-पत्रिका का था और त्रैमासिक रूप में इसका प्रकाशन होता था। कदाचित् यही कारण था कि आरोप-प्रत्यारोप तो इसे झेलने ही पडÞे लेकिन शासन की वाम दृष्टि से भी यह बची रही। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि एक समसामयिक राजनैतिक पत्रिका के रूप में इसका पर्ुनर्जन्म हुआ और समवेत रूप में यह सोलह वर्षपूरा कर चुकी है।

‘हिमालिनी’ का जन्म महज एक भावुक्ता में लिया गया निर्ण्र्ााथा। हम सब जानते हैं कि डाँ. कृष्णचन्द्र मिश्र त्रिभुवन विश्वविद्यालय के केन्द्रीय हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष थे।

विद्वान के साथ-साथ नेपाल में हिन्दी के प्रखर प्रवक्ता भी वे थे। सेवावधि में ही हृदयाघात के कारण उनका निधन हुआ था। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर ने के निमित्त ‘कृष्णचन्द्र मिश्र एकेडमी’ की स्थापना की गई जिसमें तत्कालीन समय के हिन्दी और नेपाली के साहित्यकार ों की सहभागिता थी और इसी एकेडमी के द्वारा इस पत्रिका का प्रकाशन किया गया, जिसका संस् थापक संपादक डाँ. संजीता वर्मा थीं।

कुछ दिनों के लिए इसके प्रधान संपादक का दायित्व डाँ. ऊषा ठाकुर ने भी संभाला था। इस तरह लोग इससे जुडÞते गए कारवाँ बढÞता गया। अपने साहित्यिक रूप में ‘ हिमालिनी’ छोटी बजट और अल्प पाठकवर्ग की पत्रिका थी। किसी व्यावसायिक हितों का संरक्षण भी इसका उद्देश्य नहीं था। इस रूप में इसकी विक्री तथा इसका वितर ण व्यापक क्षेत्र में तो था लेकिन संख्यात्मक दृष्टि से बहुत अधिक नहीं था।

लेकिन नेपाल के हिन्दी प्रेमियों ने इसे हाथोंहाथ लिया। तत्कालीन समय में सक्रिय हिन्दी भाषा के साधकों की रचनाएँ इसमें प्रकाशित हर्ुइं और हिन्दी प्रेमियों के पुस् तकालय का श्रृंगार यह बनी। यद्यपि नेपाली के कतिपय स्थापित रचनाकारों की रचनाएँ भी इसमें प्रकाशित हर्ुर्इं लेकिन अधिकांश अनुवादित रूप में। कुछ मौलिक रचनाएँ भी प्रकाशित हर्ुइं मगर आम नेपाली के साहित्यकार ों में यह न तो अत्यधिक लोकप्रिय हो पाई और न ही सम्मानजनक स्थान ही ले पायी। इसका मूल कारण यह था कि हिन्दी भाषा में प्रकाशित होने के कार ण इसे एक विशेष वर्ग की प्रतिनिधि पत्रिका मानीर् गई। सद्भावना तथा भार त समर्थित पत्रिका होने का आरोप भी इसे लगा। इसके बावजूद केदारमान व्यथित, धुस्वाँ सायमी, उत्तम नेपाली जैसे कवि साहित्यकारों की सहृदयता, सहयोग और सहानुभूति इस पत्रिका को मिली। इस स् वरूप में इसका सबसे विधायी पक्ष यह रहा कि अपने लघु कलेवर में भी इसने हिन्दी के प्रति जनमनास की रागात्मिका वृत्ति को सुषुप्त नहीं होने दिया।

सन् २००५ इस पत्रिका के लिए विशेष महइभ्वपर्ूण्ा र हा क्योंकि इस वर्षकिसी न किसी रूप में इस पत्रिका को व्यावसायिक और समसामयिक पत्रिका का स्वरूप देने की योजना पर भीतर ही भीतर काम हो रहा था। यद्यपि देश की राजनैतिक परि स्थितियाँ सुधरी नहीं थी। प्रजातंत्र का व्रि्रूप रूप जनता ने देख लिया था। दलों के सिद्धान्तविहीन समझौते भी उसने देखे थे। पर्ूव महाराज ज्ञानेन्द्र के निरंकुश तंत्र को भी उसने देखा था। जनन्दोलन(२ का सफल समापन हो चुका था। माओवादी व्रि्रोही मुख्यधारा में आ गए थे। देश में नयी चेतना प्रवाहित हो रही थी।

तर्राई भी वैचारिक रूप से आन्दोलित थी और विभेद के प्रति आक्रामक रूख अख्तियार करने की मनःस्थिति में थी। तर्राई के सशस्त्र आन्दोलनकारी समूह इसके लिए अपनी ओर से जमीन तैयार कर रहे थे। जयकृष्ण गोईत के स् वरों में मधेश अपनी आवाज ढूँढ रहा था। इसके बावजूद हिन्दी पत्रिका के प्रति आम लोगों के दृष्टिकोण में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ था और वे पर्ूवाग्रह ग्रसित थे। समसामयिक पत्रिका के प्रकाशन की अपनी सीमाएँ होती हैं। परिस् िथतियों के मद्देनजर इसके प्रबंधन में इस निर्ण्र्ााके प्रति एक ऊहापोह की स्थिति थी। अन्ततः नए रूप-रंग और नए कलेवर में इसके प्रकाशन का नीतिगत निर्ण्र्ाालिया गया। इस रूप में इसके संपादक के रूप में डाँ. संजीता वर्मा की भूमिका निर्धारित की गई और कार्यकार ी संपादक का दायित्व प्रवीण कुमार मिश्र को सौंपा गया। २००६ की जनवरी में यह नए कलेवर में बाजार में आयी। इस रूप में यह प्रवेशांक था और इसे भी हिन्दी प्रेमी पाठकों ने गंभीरता से लिया। इस रूप में हिमालिनी की द्वैमासिक यात्रा प्रार म्भ हर्ुइ। इसके पीछे एक मात्र आर्थिक सुरक्षा कारण था। यह देखा जा रहा था कि पत्रिका हिमालिनी हिमालिनी डेस्क की सोलहवषर्ीय-यात्रा हिमालिनी l

जनवरी/२०१४ ठ अपनी ही कथा-व्यथा मधुमक्खी की तरह गुण रूपी मिठास एकत्र करते रहें। व्यावसायिक रूप में कितना प्रभावी हो सकती है। इसका द्वितीय अंक अधिक चर्चा में आई क्योंकि पहली बार इसने सशस्त्र आन्दोलन चला रहे जयकृष्ण गोईत का पहला इंटरव्यू छापा था। जिसमें उन्होंने नेपाली न होने की बात कही थी। यह अंक विशेषतः तर्राई में इतना चर्चित हुआ कि बाजार में लोग इसे ढँूढते फिर रहे थे और इसकी प्रतियाँ मिल नहीं पा रही थी। अपने वक्तव्यों में राष्ट्रीय नेताओं ने भी इस पत्रिका और गोईत के विवादास्पद बयान की चर्चा की। इस अंक के साथ ही मधेश संवेदना के वाहक के रूप में इसने स्वयं को प्रस्तुत किया। इसके बाद तर्राई आन्दोलन शुरू हुआ और इस आन्दोलन के आईने के रूप में इसकी लोकप्रियता दिनानुदिन बढÞती गई।

यहाँ तक कि लोग तर्राई आन्दोलन का लिखित दस्तावेज भी इसे कहने लगे। अपने इस रूप में यात्रा करते हुए हिमालिनी को आन्तरिक और वाह्य दोनों ही स् तरों पर संर्घष्ा करना पडÞा और यह संर्घष्ा किसी न किसी रूप में अब भी जार ी है। व्यावसायिक रूप मे यह इसमें कार्यरत जनशक्ति की आर्थिक अपेक्षाओं को पूर ा नहीं कर सकी जिसके कार ण वैचारिक मतभेद भी उत्पन्न हुए और क्रमशः लोग इससे टूटते गए। लेकिन यह टूटना भी कुछ हद तक हिन्दी के लिए रचनात्मक र हा क्योंकि विविध कारणों से इससे निकली जनशक्तियों के द्वारा नई पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ जिनमें ‘पालिटिक्स’ और ‘द पब्लिक’ का नाम उल्लेखनीय है। सबने अपनी ओर से हिन्दी का पाठक वर्ग तैयार करने और इसकी स् वीकार्यता बढÞाने में महइभ्वपर्ूण्ा भूमिका अदा की। एक बात निश्चित है कि जिस समय इस पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, हिन्दी के प्रति एक वर्जना का माहौल था। र्सार्वजनिक तौर पर हिन्दी लिखने की बात तो दूर, लोग हिन्दी बोलने में भी डर ते थे। ऐसे समय में इस पत्रिका का प्रकाशन और इसमें लेखकीय- संपादकीय सहयोग हिन्दी के पक्ष में एक रेखांकनीय बात थी।

व्यावसायिक रूप में इसके प्रकाशन के समय भी माहौल में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ था। एक सकारात्मक पक्ष यह था कि जनान्दोलन(२ में तर्राई मधेश का सक्रिय योगदान रहा था। यह अपेक्षा की जा रही थी आगामी व्यवस्था में सरकार की नीतियाँ इसके पक्ष में विभेदकारी नहीं रहेंगी और वातावरण में थोडÞी सहजता महसूस की जा रही थी। इन सारी बातों ने इस रूप में पत्रिका के प्रकाशन की जमीन तैयार की। इसके प्रकाशन के बाद पाठकों में इसे लोकप्रियता तो मिली, लेकिन यहाँ का उद्योग-व्यवसाय क्षेत्र ने इसे गंभीर ता से नहीं लिया। परिणामतः पत्रिकाओं के प्रकाशन और संचालन के लिए विज्ञापनदाता के रूप में व्यावसायिक जगत के जिस सहयोग की अपेक्षा की जाती है, उसके लिए यह पत्रिका मोहताज रही और यह अवस्था अब भी बदस्तूर जारी है। इसके बावजूद इसमें सहयोग दे रहे अनेक ऐसे लोग हैं जो सेवाभाव के कारण इसमें अपना योगदान दे रहे हैं, हिन्दी भाषा साधना और विकास की दृष्टि से इस योगदान को स्तुत्य कहा जा सकता है।

मधेश चेतना की दृष्टि से इस पत्रिका को अति महत्वपर्ूण्ा इसलिए कहा जा सकता है कि नेपाल की राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय घटनाओं का इस पत्रिका ने मधेश की दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण किया। इसलिए मधेश आधारि त राजनैतिक दलों और इसके नेताओं ने इसे प्रार म्भ से ही गंभीरता से लिया। लेकिन यह इस पत्रिका की विशेषता रही कि किसी पार्टर्ीीा मुखपत्र बन कर यह नहीं रही। समय-समय पर इन दलों की ऐसी राजनैतिक गतिविधियों की जो मधेश संवेदना के खिलाफ में जाती थीं, उसकी आलोचना की गई। आज मधेश आधारित दलों को विगत संविधानसभा के चुनाव में जो परिणाम झेलने पडÞे और जिस अवस् था में वे हैं उससे स्पष्ट होता है कि इसका दृष्टिकोण सही था। जिस तरह की राजनैतिक संचेतना यह पत्रिका प्रवाहित कर रही थी, अगर उस दिशा में इन दलों की राजनैतिक चेतना प्रवाहित होती तो शायद उन्हें यह दुरावस्था नहीं झेलनी होती। ऐसा नहीं है कि इस पत्रिका ने सिर्फमधेश की संवेदना का वहन किया।

नेपाल की राष्ट्रीय घटनाओं पर भी इसने टिप्पणियाँ की लेकिन लघु संचार माध्यम होने के कारण इसकी अपनी सीमाएँ थीं। इसका सबसे विधायी पक्ष यह रहा कि इसमें अहिन्दीभाषी लेखकों का भी योगदान र हा और ऐसे लेखकों को भी इसने प्रोत्साहित किया जिसकी हिन्दी लेखन की चेतना सुषुप्त पडÞी थी। इस पत्रिका ने उन्हें मंच दिया और इसके कार्यकारी संपादन का दायित्व वर्तमान समय में एक अहिन्दीभाषी लेखक मुकुन्द आचार्य के हाथों में है और संपादक रमेश झा हैं। इस तरह यह सहिष्णुता के भाव की वाहिका भी है। नेपाल और मधेश(दोनों को एक संतुलित दृष्टि से देखने और समझने का नजरिया यह प्रस्तुत करती है। वेब के माध्यम से विदेशों में भी इसका पाठक वर्ग है। आज हिन्दी विश्व भाषा बनने की दिशा में अग्रसर है और विश्व की अधिक बोली जाने वाली दो भाषाओं अंग्रेजी तथा चीनी के साथ तीसरी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। राजनैतिक पर्ूवाग्रहों की बात अगर छोड दें तो कहा जा सकता है कि नेपाल की भी यह महइभ्वपर्ूण्ा भाषा है और हिन्दी के क्रमशः विकास में यह पत्रिका अपनी महइभ्वपर्ूण्ा भूमिका निभा रही है। इस तथ्य को भारत की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ ने भी स्वीकार किया है और अपने दो अंकों में विश्व में हिन्दी प्रचार- प्रसार की महइभ्वपर्ूण्ा पत्रिका के रूप में इसे चिहृनित किया है। इस रूप में इसकी यात्रा निर न्तर जारी है। J

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