हिमाल–पहाड़–तराईः एक शरीर है, अलग करेंगे तो कोई भी अंग काम नहीं करेगा

नेकपा एमाले के नेता तथा पूर्व सामान्य प्रशासनमन्त्री लालबाबु पण्डित, सरल जीवन जीते हैं और उच्च विचार रखते हैं । पण्डित की निजी जीवनशैली और विचार से निकट रहनेवाले हर कोई मानते हैं– नेता हों तो ऐसा ! जीवन में जब पण्डित दो साल पहले, पहली बार सामान्य प्रशासन मन्त्री बने और कर्मचारी संयन्त्र के अन्दर उन्होंने जो काम किया, तो नागरिकस्तर में उसका बड़ा स्वागत किया गया । अब भी हर नागरिक कहते हैं– मन्त्री हों तो लालबाबु पण्डित जैसा । उन्हीं नेता पण्डित के साथ संविधान संशोधन विधेयक और उसके आसपास रहकर हिमालिनी सम्वाददाता लिलानाथ गौतम ने बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–

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पूर्व सामान्य प्रशासनमन्त्री लालबाबु पण्डित

० संविधान संशोधन प्रस्ताव के विरुद्ध नेकपा एमाले ने सड़क और सदन, दोनों जगह आन्दोलन शुरु किया है । एमाले का मानना है कि विधेयक राष्ट्रघाती है और उस को वापस करना चाहिए । विधेयक में ऐसा क्या है, जिसके कारण वह राष्ट्रघाती बन गया ?
– एमाले संविधान संशोधन का विरोधी नहीं हैं । लेकिन अभी जिसतरह संशोधन किया जा रहा है, हम सिर्फ उसका विरोध कर रहे हैं । यह संशोधन कालान्तर में देश–हित के विरुद्ध हो सकता है, इसीलिए हम लोगों ने इस को राष्ट्रघाती करार दिया हैं । दूसरी बात, आज की आवश्यकता संविधान संशोधन की नहीं, उसके कार्यान्वयन की है । लम्बे समय से स्थानीय निकाय जनप्रतिनिधि विहीन है । संवैधानिक रूप में भी वि.सं. २०७४ माघ के अन्दर तीन तह का निर्वाचन सम्पन्न करवाना है । आज की प्राथमिकता उस काम को अन्जाम देना है । संविधान संशोधन कैसे करना है, वह तो संविधान में ही स्पष्ट रूप में लिखा गया है । संविधान के भाग ३१, धारा २७४ में सीमांकन संशोधन सम्बन्धि व्यवस्था की गई है । उसके लिए संघीय सदन सम्बन्धी प्रावधान है । अगर उसके अनुसार सीमांकन को अदला–बदली किया जाता है तो उसको कैसे अस्वीकार कर सकते है ? इसीलिए संवैधानिक रूप में भी अभी सीमांकन पुनरावलोकन जटिल दिखाई देता है । राजनीतिक तथा व्यवहारिक रूप में भी कठिन नजर आता है । ऐसी अवस्था में अनावश्यक विवाद करना, संविधान कार्यान्वयन के विरुद्ध हो जाता है,इस स्थिति में क्या यह राष्ट्रघात नहीं है ?
तीसरी बात, अंगीकृत नागरिकता और हिन्दी भाषा सम्बन्धी विवाद भी जबरजस्ती सामने लाया गया है, जो विल्कुल अनावश्यक है । कुछ सीमित व्यक्तियों के स्वार्थ की पुर्ति के लिए यह विवाद खड़ा किया गया है । एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ– हमारे देश में नागरिकता प्राप्ति सम्बन्धी प्रावधान काफी सहज है, विश्व के किसी भी देश में वैसा नहीं है । नागरिता–प्राप्ति सम्बन्धि मापदण्ड कुछ अलग भी है, लेकिन अंगीकृत नागरिक को महत्वपूर्ण संवैधानिक पद देने का प्रावधान किसी भी देश में नहीं है । इस में बहस करने की कोई भी जरूरत नहीं थी । लेकिन हमारे यहाँ बहस हो रही है । यह हमारे लिए घातक हो सकता है ।
० मुख्य विवाद सीमांकन का है, विवाद रहित होकर कैसे संघीय राज्य का सीमांकन कर सकते है ?
– शतप्रतिशत विवाद रहित तो कहीं भी नहीं हो सकता । बहुसंख्यक जनमत, सभी को स्वीकार करना होगा । हिमाल, पहाड़ और तराई नेपाल की पहचान है, जो पूर्व से लेकर पश्चिम तक समान रूप में हैं । अर्थात् हिमाल, पहाड़ और तराई एक पूर्ण शरीर है । सबका अपना–अपना महत्व और विशिष्टता है । इसमें से एक अंग को अलग किया जाता है तो कोई भी अंग सही ढंग से काम नहीं कर पाएगा । इसीलिए नेपाल और नेपाली की समृद्धि चाहते हैं तो सभी प्रदेश में हिमाल, पहाड़ और तराई होना चाहिए, ये बेहतर होगा ।
० ऐसा करते हैं तो मधेशी और थारु समुदाय अल्पमत में पड़ जाएंगे और शासन–सत्ता में उन लोगों की पहु“च नहीं हो सकती, ऐसा भी तो माना जाता हैं ?
– ऐसी बात करनेवाले व्यक्ति विकसित सद्भाव को भड़काना चाहते है, उनकी नीयत सही नहीं है । क्योंकि शासन–सत्ता में पहुँच होने से गरीबी नहीं मिट जाती, आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं हो सकती । हाँ, इतिहास में मधेशी के ऊपर विभेद हुआ है, जनजाति के ऊपर भी ऐसा ही हुआ है । कोई शासक के द्वारा इतिहास में हुई गलती के कारण वर्तमान में हमलोग क्यों आपसी सद्भाव बिगाड़ना चाहते है ? इतिहास की गलती को अन्त करने के लिए ही हम लोगों ने समावेशी और समानुपातिक मुद्दा को स्थापित किया है ।
सामाजिक सद्भाव का कुछ उदाहरण पेश करता हूँ– हृदयेश त्रिपाठी मधेशी हैं, लेकिन उनकी धर्मपत्नी पहाड़ी हैं । उन दोनों के बालबच्चे पहाड़ी हैं या मधेशी ? इसीतरह विजय गच्छदार थारु हैं और उनकी धर्मपत्नी नेवार हैं । उन दोनों की संतान थारु हैं या नेवार ? उन सभी का संयुक्त परिचय ‘नेपाली’ है कि नहीं ? लेकिन दुःख की बात, आज अपने को नेपाली में शर्मिन्दगी महसूस होती है, विखण्डनकारी बात करनेवाले भी ऐसे ही हैं । पहले नेपाल है, उसके बाद मधेश । मैं भी मधेशी हूँ । लेकिन मधेशी होने से पहले मैं नेपाली हूँ । डा. रामवरण यादव राष्ट्रपति होते हैं तो वह मधेशियों के राष्ट्रपति, विद्या भण्डारी राष्ट्रपति होती हैं तो वह पहाड़ियों की राष्ट्रपति, यह नहीं हो सकता । लेकिन मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले व्यक्ति ऐसी ही भावना को बढ़ोत्तरी दे रहे हैं ।
इतिहास और वर्तमान को न समझ पानेवाले व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ और दूसरों का निर्देशन लेकर राजनीति करते हैं । ऐसी ही राजनीतिज्ञ के कारण देश समस्या भुगत रही है । अमेरिका ऐसा देश है, जहाँ कोई भी जात नहीं है, सब समान है । लेकिन हमारे यहाँ एक जाति के लोग, दूसरे जाति से बनाया हुआ खाना नहीं खाते हैं । क्यों ? क्योंकि हमारे जातीय चेतना बहुत संकीर्ण है । इसीतरह मधेशी और पहाड़ियों के बीच रहे सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध को संकीर्ण बनानेवाले भी हैं । ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए । इतिहास को देखें– नेपाल का शासन काठमांडू से शुरु हुआ है । काठमांडू में शासन करनेवाले व्यक्ति गोपाल वंशी थे, जिनका वंशज आज यादव के जाति के रूप में जाने जाते हैं । समय क्रम में कुछ गोपाल वंशी काठमांडू में ही रहने लगे हैं तो कुछ मधेश की ओर चले गये, अन्य जातियों के साथ उन लोगों का सम्बन्ध विस्तार होने लगा, रूप–रंग और भाषा में भी परिवर्तन हो गया । काठमांडू में आज हम जिस को नेवार कहते है, वह वैशाली से आए है । इसी तरह का इतिहास यहाँ के खस–ब्राह्म्ण का भी है । जो जहाँ से आएँ है, हम सब नेपाली हैं । आज आकर एक–दूसरे को क्यों कहते हैं– तुम अपनी पुर्खाें की जमीन की ओर चले जाओ ? कल तक एक–दूसरो का हमसफर रहनेवाले जात–जाति को आज आकर क्यों ‘तुम्हारी पहचान यह नहीं है और वह नहीं है’ कहकर भड़काया जाता है ? नेपाल का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सम्बन्ध एक–आपस में मिला हुआ है । एक सम्प्रदाय, दूसरों का सम्मान करते हैं, मिलकर पर्व–त्योहार मनाते हैं । लेकिन अभी आकर उस में विष डालनेवाले आप कौन है ?
जिस तरह हमारे यहाँ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भाव है, उसीतरह राजनीतिक सद्भाव की आवश्यकता भी है । तराई से पहाड़ को और पहाड़ से तराई को अलग करने की जो नीयत है, वह साफ नहीं है । इसीतरह जाएंगे तो कल पहाड़ से हिमाल को भी अलग करने की बात हो सकती है । नेपाल के अस्तित्व और पहचान को खत्म करनेवाली बात स्वीकार्य नहीं हो सकती ।
० इससे पहले कांग्रेस–एमाले ने संयुक्त रूप में जो सात प्रदेश का नक्सांकन किया था, संशोधित स्वरूप में आज वही नक्सांकन है । पहले एमाले ने जो किया वह राष्ट्रवादी और अभी माओवादी ने जो किया, वह राष्ट्रघाती ! कैसे हो सकता है ?
– जो किसी के द्वारा भी प्रस्तुत किया गया हो, राष्ट्रघाती प्रस्ताव सफल नहीं होना चाहिए । राजनीतिक विचार–विमर्श के क्रम में उस वक्त उक्त प्रस्ताव सम्बन्धी बहस आया था । अभी संविधान संशोधन के मार्फत उसको कार्यान्वयन करने का प्रयास हो रहा है । इसीलए स्वीकार नहीं हो रहा है । बहस में आया सभी विषय अन्तिम सत्य नहीं बन सकता और राजनीतिक भागबण्डा के कारण जबरदस्ती पारित प्रस्ताव भी अन्तिम सत्य नहीं हो सकता । अभी पाँच नम्बर प्रदेश सम्बन्धी जो बहस हो रही है, वह भी अन्तिम सत्य नहीं हो सकता । लेकिन एक बात अन्तिम सत्य है– पहाड़ और तराई को अलग करके निर्माण होनेवाला संघीय राज्य, देश और प्रदेश दोनों के हित में नहीं हो पाएगा । देश और प्रदेश को समृद्ध बनाना है तो हर प्रदेश की पहुँच प्राकृतिक स्रोत–साधन से निकट होनी चाहिए ।
० अभी जो दो नम्बर प्रदेश है, मधेशवादी दलों की मांग के अनुसार ही उस को पहाड़ से अलग कर बनाया गया है, इसके बारे में क्या कहते है ?
– मैं शतप्रतिशत दावे के साथ कह सकता हूँ– अभी जो दो नम्बर की प्रदेश संरचना है, उसको पहाड़ से नहीं जोड़Þा गया तो उस प्रदेश की आर्थिक हैसियत सबसे कमजोर हो जाएगी । आर्थिक रूप में उक्त प्रदेश को समृद्ध बनाना चाहते हैं तो उसको पहाड़ी भू–भाग से जोड़ना ही होगा । नहीं तो यह प्रदेश ‘गजड़ी’ प्रदेश हो सकता है । क्योंकि जब आर्थिक रूप में कमजोर होते हैं तो लोग तनाव में आते हैं । तनाव के कारण वह गाजा और मदीरा पीने लगते हैं । दो नम्बर प्रदेश की हालत भी ऐसी ही हो सकती है । क्योंकि वहाँ घर बनाने के लिए आवश्यक गिट्टी और बालू भी नहीं मिल सकता, गिट्टी–बालू के लिए उस प्रदेश को चुरे की ओर जाना पड़ता है । मन्त्री रहते वक्त मैंने यह बात कांग्रेस नेता अमरेशकुमार सिंह को अपनी मन्त्रालय में बुलाकर कहा था । उन्होेंने खास मतलव नहीं दिया । क्यों ? यह तो वही जानते हैं । लेकिन सिंह जैसे नेताओं को यह बात समझ में आनी चाहिए । इसलिए दों नम्बर प्रदेश का कल्याण चाहते हैं तो उसको झापा, मोरङ और सुनसरी से नहीं, कम से कम उक्त प्रदेश को उदयपुर, सिन्धुली और मकवानपुर से जोड़ना चाहिए । ऐसा करने से उक्त प्रदेश जलस्रोत से जुड़ जाता है, जिसके चलते हमारे खेतों की सिचाई हो सकती है और खुद विद्युत उत्पादन भी कर सकते हैं । इसीतरह हम जंगल से जुड़ जाते हैं, जहाँ से लकड़ी प्राप्त हो सकती है । हम चुरे पर्वत से जुड़ते है, जहाँ से गिट्टी–बालू प्राप्त हो सकता है । उसके बाद दो नम्बर प्रदेश ही आर्थिक रूप से सबसे मजबूत प्रदेश बन सकता है ।
तराई में जहाँ सिचाई सम्भव है, वहाँ धान उत्पादन होता है । अन्य दृष्टिकोण से यहाँ आर्थिक उपार्जन का मजबूत माध्यम नहीं है । एक बात सामने आयी है कि बञ्जर भूमि माना जानेवाला इलाम के एक किसान ने इसी साल ४० लाख का तरकारी ‘स्कुस’ बिक्री किया है । तराई में कितने ऐसे किसान हैं, जो इस मूल्य के बराबर धान बिक्री करते सकते हैं ? इसीतरह बोधिचित्त को ले सकते हैं । उसकी एक ही वृक्ष करोड़ों आम्दानी दे सकती है । कुछ काम की नहीं है, ऐसा कहलाने वाला ‘खोंच’ आज इलायची उत्पादन कर लाखों कमाई कर रहे है । चाय पहाड़ी भू–भाग में ही उत्पादन होता है । अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में नेपाली जड़ीबुटियों की मांग उच्च है । यह सब तो पहाड़ में ही होता है । इसीलिए सिर्फ समथर भू–भाग होने से आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं हो सकती । आत्मनिर्भरता और सबलता प्राप्त नहीं हो सकती ?
० अगर ऐसा है तो मधेशवादी दल, क्यों तराई और पहाड़ को अलग करना चाहते हैैं ?
– तराई–मधेश केन्द्रित राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं में एक रोग है, वे लोग कहते है कि तराई से ही नेपाल को ७५ प्रतिशत राजश्व प्राप्त होता है । अगर अलग मधेश प्रदेश निर्माण करेंगे तो सभी भन्सार कार्यालय हमारे हो जाते हंै । वह लोग सोचते हैं– सभी भन्सार कब्जा करेंगे और वहीं भन्सार से हम लोग को मालामाल करेगा । ऐसे लोग इसी तरह से जनता में भ्रम भी सिर्जना कर रहे हैं । यह उनके दिमाग की सृजित कपटपूर्ण सोच है । क्योंकि संघीय राज्य में कोई भी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा–भन्सार प्रदेश का नहीं होता है, केन्द्रीय राज्य का होता है । यह अन्तर्राष्ट्रीय नियम और अभ्यास भी है । विश्व में एक भी ऐसा देश नहीं है, जहाँ अन्तर्राष्ट्रीय–भन्सार, प्रदेश उपयोग कर सकता है । लेकिन हमारे मधेशवादी नेता जनता में ऐसा गलत भ्रम क्यों फैला रहे हैं ? ं
० भाषा, जाति और ऐतिहासिक पहचान के आधार में संघीय राज्य निर्माण होना चाहिए, ऐसा भी कहते है न ?
– नेपाल बहुजातीय और बहुभाषिक राज्य है और यहाँ रहनेवाले सभी जातजातियों की ऐतिहासिक पहचान है । किसी भी क्षेत्र में एकल भाषी और जाति का बहुमत नहीं है । इसीलिए यहाँ कोई भी भाषा और जात के आधार में राज्य नहीं बन सकता । इतिहास का दावा करनेवाले लोग बताते हैं कि लिम्बुवान का अपना अलग ही राष्ट्र था । यह सच है– इतिहास में लिम्बुओं का अपना ही अलग राष्ट्र था । नेवार, मगर, खस और मधेशी, सभी की ऐतिहासिक पहचान भी थी । ऐसा कहते हुए क्या अब लिम्बुवान राज्य बनाया जाए ? क्या अब बाइसे–चौबीसे राज्य निर्माण किया जाए ? यह सम्भव नहीं है । भाषा के सवाल में भी यह बात लागू होती है । नेपाल में १२३ भाषा की पहचान हुई है । क्या इन सभी भाषाओं को सरकारी कामकाज का भाषा बनाए जाए ? सम्बन्धित भाषी को लक्षित कर इसमें उत्तेजनापूर्ण भाषण कर सकते हैं, लेकिन यह व्यावहारिक नहीं हो सकता ।
० वर्तमान सीमांकन को मधेशी मोर्चा ने अस्वीकार किया हैं और आप लोग उनके अनुसार दूसरा सीमांकन होने नहीं देते हैं, तब कैसे हो सकता है समस्या का समाधान ?
– नेपाल को संघीय राज्य में ले जाना है और समृद्ध राष्ट्र बनाना है तो अपनी गलत मांग के बारे में आत्मसमीक्षा होनी चाहिए । इसीलिए मधेशी मोर्चा में आवद्ध नेता सच में ही अपने को संघीयता के पक्षधर मानते हैं तो उससे पहले ‘मैं नेपाली हूँ’ यह बात को स्वीकार करना होगा । उसके बाद ही समृद्ध देश और प्रदेश का नक्सांकन दिमाग में बन सकता है । क्योंकि संघीयता के कारण ही मुलुक का अस्तित्व समाप्त होने से रोकना होगा, यह हमारा कर्तव्य है । हमारी पहली प्राथमिकता देश का संरक्षण करना है, उसके बाद ही संघीयता सम्भव है ।
० मधेश में कुछ समस्या तो होगा, जिसके चलते विभिन्न आन्दोलन हुआ है । नहीं है तो सिर्फ मधेशी मोर्चा के कहने से सर्वसाधारण क्यों आन्दोलन में सहभागी हो जाते है ?
– हाँ, कुछ समस्या तो जरूर है । वह समस्या गरीब, असुरक्षा और अवसर के साथ जुड़ा हुआ है । मधेशवासी की यहीं असन्तुष्टि को गलत रूप में प्रयोग किया गया है । इसीतरह संकुचित समझ रखनेवाले और आपराधिक क्रियाकलाप करनेवाले भी है । जैसे कि आपराधिक क्रियाकलाप में संलग्न मधेशी मुल के एक युवा को पुलिस गिरफ्तार करती है तो प्रचार किया जाता है– ‘वह मधेशी होने के कारण पहाड़ी पुलिस के द्वारा गिरफ्तार हो गया है ।’ अपराधी तो अपराधी ही है, मधेश का हो अथवा पहाड़ का । लेकिन यहाँ अपराधी–गिरफ्तार को लेकर भी ‘रंगों’ की राजनीति करनेवाले है । ऐसी गलत मानसिकता लेकर चलनेवालों को मुझे कुछ कहना नहीं है ।
दूसरी बात, मियाँ–बीबी, भाई–भाई, बहन–बहन के बीच भी शतप्रतिशत एकरूपता नहीं हो सकता । यह तो देश है, जहाँ पहाड़ी, मधेशी, मुस्लिम और जनजाति सब है । इन सभी में शत–प्रतिशत एक ही तरह की क्षमता और समानता तलाश करना मुर्खता है । तराई–मधेश में रहनेवालों के बीच भी सभी प्रकार की समानता नहीं है । किसी में एक गुण है तो किसी में दूसरा । यह विविधता है, इसको स्वीकार करना होगा । एक उदाहरण देता हूँ– हिमाल, पहाड और तराई में से कोई एक भू–भाग में रहनेवाले नेपाली युवा अमेरिकन युवती से शादी करता है तो क्या हम उसकी जात पूछते है ? नहीं । चालीस लाख नेपाली युवा अरब दशों की मरुभूमि में श्रम कर रहे हैं, क्या वह लोग वहाँ पहचान ढूढ़ने के लिए गए है ? नहीं । इसीलए हमारी हरेक असन्तुष्टि आर्थिक समृद्धि के साथ जुड़ी हुई है । अगर हम आर्थिक रूप में समृद्ध बनते हैं तो इस तरह का विभेद और असन्तुष्टि समाप्त हो सकती है । यह उस वक्त मात्र सम्भव है, जब हिमाल, पहाड और तराई की एकता मजबुत हो ।
अरब मुलुकों में जानेवालों में से बहुत लोग तो तराई मूल के नागरिक है । वह भी वहाँ पहचान तलाशने के लिए नहीं गए हैं । लेकिन तराई–मधेश के नाम में राजनीति करने वाले जितने भी लोगों ने व्यक्तिगत धन–दौलत अर्जित की है, क्या वह तराई में हैं ? राजेन्द्र महतो को पूछिए– आप का काठमांडू में कितना घर है ? हृदयेश त्रिपाठी से पूछिए– आप का कितना है ? इसीतरह विजय गच्छदार को पूछिए– काठमांडू में आप की धन–दौलत कितनी है ? उपेन्द्र यादव और सर्वेन्द्रनाथ शुक्ला की जीवनशैली कैसी है, इस में अनुसन्धान कीजिए । इन लोगों द्वारा अर्जित धन–दौलत का स्रोत क्या है ? इस में भी अनुसन्धान कीजिए । ये लोग कमाकर काठमांडू में रखते हैं, उसके बाद तराई–मधेश की जनता में जाकर पहचान की राजनीति करते हैं । यह ईमानदार राजनीति नहीं है । हाँ, मधेशी नेताओं में से महन्थ ठाकुर आर्थिक लालच में नहीं दिखाई पड़े है, इस मामले में उन की छवि स्वच्छ मानी जाती है । व्यक्तिगत रूप में महन्थजी स्वच्छ हो सकते है लेकिन उनके कंधे पर बन्दुक रखकर चलानेवाले बहुत हैं, चाहे वह आनन्दीदेवी के नाम में हो वा गजेन्द्रनारायण सिंहजी के नाम में ।
० तराई को नेपाल से अलग देश बनाना चाहिए, ऐसा कहनेवाले भी है । क्यों हो रहा है यह सब ?
– नेपाल को खण्डित करना चाहिए, ऐसा कहनेवाले सिर्फ भूमिगत और अर्धभूमिगत समूह नहीं है । तराई–मधेश का बैनर उठाकर खुला राजनीति करनेवालें भी है । जो कालान्तर में तराई को नेपाल से अलग कर सकते हैं, इस तरह की मानसिकता लेकर काम कर रहे है । भूमिगत, अर्धभूमिगत अथवा खुला जैसी भी राजनीति हो, उन लोगाें का अन्तिम उद्देश्य एक ही है तो ऐसे समूह को प्रतिबन्ध करना चाहिए । वे लोग अस्थिर राजनीति का फायदा उठा रहे हैं । अंगीकृत नागरिकता लेकर आने वाले हो अथवा वंशज, नेपाल की सार्वभौम सत्ता और अखण्डता के विरुद्ध अगर कोई काम करता है तो उसको छूट नहीं मिलनी चाहिए ।
० राज्य के द्वारा मधेश के ऊपर विभेद हो रहा है । मधेश, नेपाल का उपनिवेश बन रहा है । अब मधेश अलग होना चाहिए, कहकर क्रियाशील लोग को कहाँ से सपोर्ट मिल रहा है ? तराई–मधेश में रहनेवाले असन्तुष्ट जनता से अथवा बाहर से ?
– थोड़Þा सा आन्तरिक असन्तुष्टि भी है । उस को गलत रूप में प्रचार करके जनता को दिग्भ्रमित करने का प्रयास वे लोग कर रहे हैं । लेकिन मूलतः यह लोग बाहर से परिचालित समूह हैं ।
०  (मंसिर १७ गते) एक दैनिक में तमलोपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुर ने कहा है– ‘मधेशी मोर्चा अपना एजेण्डा नहीं छोड़ सकते हैं । अगर छोडेÞगे तो मधेश में अतिवादी (देश अलग बनाने की धमकी देनेवाला) शक्ति मोर्चा का एजेण्डा ले लेगा ।’ अगर ऐसा हो गया तो अवस्था अधिक जटिल बन सकती है । है न ?
– महन्थजी को चिन्ता है कि उनका एजेण्डा कोई अतिवादी ले लेगा । लेकिन उनके लिए एक बात स्पष्ट करने के लिए कहता हूँ– तमलोपा ने जो महाधिवेशन सम्पन्न किया, उसके मूल वैनर में क्या लिखा था ? इसके बारे में महन्थजी को पता है कि नहीं ? बैनर का एक वाक्यांश है– ‘मधेश राष्ट्र के लिए’ अर्थात् स्वतन्त्र मधेश । ‘मधेश राष्ट्र’ और ‘स्वतन्त्र मधेश’ कहने का मतलब क्या है ? एक देश के अन्दर दूसरा स्वतन्त्र भू–गोल, अर्थात् स्वतन्त्र मधेश हो सकता है ? क्यों मधेश को ‘राष्ट्र’ लिखा गया ? जानकर लिखा है या अनजाने पर, मुझे पता नहीं । लेकिन उक्त लेखनी से भूमिगत और अर्धमूभिगत रूप से परिचालित विखण्डनकारी को बढ़ावा देता है ।
० हिन्दी को सरकारी कामकाजी भाषा बनाया जाए अथवा नहीं ? इस सवाल को लेकर भी लोग बहस करते हैं, आप इस को किस तरह लेते हैं ?
– संविधान ने स्पष्ट किया है कि नेपाल में बोले जानेवाला सभी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता मिल सकती है । उसके लिए भाषा आयोग बनाने की बात भी हो रही है । आयोग में जो भाषा परिचित होगा, वह संविधान की अनुसूची में सूचिकृत हो सकता है । अनेकों भाषा होने के बावजूद भी भारत के संविधान में सिर्फ ८ भाषा सूचिकृत हैं । लेकिन नेपाल में उससे कहीं ज्यादा भाषा संविधान में सूचिकृत होने जा रहा है । इसमें से कुछ भाषा तों ऐसी है, जिस भाषा को बोलने वाला सौ के आसपास भी नहीं है । बोलेजाने के कारण उसको भी सूचिकृत किया जाएगा । लेकिन सरकारी कामकाज के लिए सभी भाषा मान्य नहीं हो सकता । क्योंकि यह व्यवहारिक नहीं है । लेकिन संविधान ने कहा है कि कोई प्रदेश, नेपाली भाषा के अलावा अपनी प्रदेश में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा को भी कामकाजी भाषा बना सकता है । इसमें हिन्दी भाषा को विवाद में लाना उचित नहीं है ।
० ऐसा है तो कल दो नम्बर प्रदेश अपनी कामकाजी भाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार कर सकता है ?
– ज्यादा से ज्यादा भाषाओं पर पकड़ होना, अच्छा है, उससे व्यक्तियों की क्षमता अभिवृद्धि होती है । ऐसा कहने से हिन्दी को ही दो नम्बर प्रदेश मेें अपनी कामकाजी भाषा बनाया जाए, ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि दो नम्बर प्रदेशों की मातृ भाषा मैथिली और भोजपुरी है । उस प्रदेश में नेपाली के अलावा सबसे ज्यादा यही भाषा बोली जाती है । कल्पना करें– समान भाषा अधिकार के नाम में सरकारी कार्यालयों में सभी भाषा का रेकर्ड रखना चाहते हैं तो क्या वह सम्भव है ? एक सरकारी कार्यालय का नाम सभी भाषा में रखना चाहते हैं तो वहाँ कितनी साइनबोर्ड लगवाना पड़ता है ? इसीतरह विद्यालयों की किताब को हर भाषा में छपवाना चाहते हैं तो क्या वह सम्भव है ? नहीं । यह सब राष्ट्र को अग्रगमन में ले जाने से रोकता है ।
० नेपाली, भोजपुरी और मैथिली भाषी के बीच हिन्दी सम्पर्क भाषा हो सकती है, ऐसा भी कहा जाता है न ?
– ऐसा कहने से भी वह सम्भव नहीं है । इन सभी भाषाओं की मूल भाषा संस्कृत है । क्या अब संस्कृत को सरकारी कामकाजी और सम्पर्क भाषा बना सकते हैं ? नहीं । इसीलए नेपाली भाषा के अलवा सम्बन्धित प्रदेश तथा स्थानीय निकायों में सबसे ज्यादा कौन–सी भाषा बोली जाती है, उस भाषा को स्वीकार कर सकते हैं । वह तो मैथिली और भोजपुरी ही हो सकता है । हिन्दी की जगह नेपाली अथवा अंग्रेजी क्यों नहीं हो सकता ? क्योंकि नेपाली राष्ट्रीय भाषा है, सब जानते है और अंग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा होने के कारण हिन्दी से अंग्रेजी को समझनेवाले बहुत हैं । संख्यात्मक तथ्यांक को देखें तो नेपाल में जितने लोग अपनी मातृभाषा के रुप में हिन्दी को लिखते हैं, उससे ज्यादा अंग्रेजी लिखते हैं । ऐसा कहकर मैं हिन्दी का विरोध नहीं कर रहा हूँ, यथार्थ और व्यवहारिकता बोल रहा हूँ । सरकारी कामकाज की भाषा और देश में बोले जानेवाले भाषा, दो अलग–अलग विषय है ।
० ऐसा है तो भाषा सम्बन्धी विवाद क्यों होता है ?
– आपस में मिलकर रहनेवालों के बीच झगड़ा और युद्ध करवाना है तो ऐसी ही बात हो जाती है । सिर्फ नेपाल में ही नहीं, विश्व के इतिहास में ऐसा हो रहा है । तीन चीज– धर्म, जाति और भाषा ऐसी भावना होता है, जिसके लिए लोग युद्ध करने के लिए तैयार हो जाते हैं । आपसी वैमनस्यता करवाना है तो स्वार्थभरे लोग धर्म, जाति और भाषा के नाम में राजनीति करते है, और वह ब्रह्मास्त्र का काम करता है । जब इसके नाम में राजनीति किया जाता है तो समाज और देश खण्डित हो जाता है । नेपाल में भी जाति के नाम में राजनीतिक युद्ध किया गया । अभी भाषा और धर्म के नाम में युद्ध करने का माहौल बना रहे हैं । यथार्थ में ऐसे लोग देश और जनता के लिए नहीं लड़ते हैं, उन लोगों में व्यक्तिगत स्वार्थ ज्यादा होता है । वे लोग किसी दूसरे लोगों का स्वार्थपुर्ति के लिए भी काम करते हैं । ऐसे लोगों के कारण ही शान्ति समाप्त हो जाता है, सामाजिक सद्भाव बिगड़ जाता है, विकास अवरुद्ध हो जाता है, गरीबी और अस्थिरता बढ़ जाती है । इन मुद्दों को लेकर हम आपस में इस तरह लड़ते हैं कि हमारे झगड़ा अन्त करने के लिए विदेशियों सहयोग लेना पड़ता है । उसके बाद सिर्फ राष्ट्र का विखण्डन ही नहीं, उसका अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है ।
० नेपाल में नागरिकता को लेकर भी विवाद किया जाता है, यह क्या है ?
– भारत के साथ हमारी खुली सीमा है, इसीलए यह विवाद ज्यादा दिखाई देता हैं । खुली सीमा होने के कारण हर किसी को भी सहज नागरिकता मिलनी चाहिए, ऐसी मानसिकता लेकर राजनीति करनेवाले भी है । मुझे एक बात याद आती है– एक बार संसद् की एक समिति में राजेन्द्र महतो जी ने कहा था– ‘अगर कोई भारतीय १५ मिनट के लिए कुछ सामान बेचने के लिए नेपाल आते हैं तो उन को भी वंशज का नागरिकता मिलनी चाहिए ।’ महतोजी ने यह बात नेपालियों के लिए कहा है या विदेशियों की स्वार्थ के लिए ? महतोजी ही जानते हैं । ऐसी मानसिकता लेकर चलते हैं तो क्यों विवाद नहीं होगा ?
० मधेशी मोर्चा, विशेषतः उपेन्द्र यादवजी ने कहा है– ‘शादी करके आनेवाली बहू को वैवाहिक वंशज की नागरिता मिलनी चाहिए और उनको कहीं भी बन्देज नहीं होना चाहिए ।’ हमारे घर मेें जो बहू आती है, वह तो हमारे ही परिवार की सदस्य है, उनको बन्देज लगाना ठीक नहीं है । एक दृष्टिकोण से तो यह भी ठीक है । है न ?
– बहू बनकर आनेवाली महिला को क्या आप उसी दिन घरका सम्पूर्ण ताला–चाबी दे सकते हैं, जिस दिन वह आई है ? उनकी रहन–सहन, विचार और मानसिकता जानना नहीं चाहते है आप ? यह जानने लिए आप को दो–चार साल लग जाता है । उसके बाद ही आप बहू को घर की सम्पूर्ण जिम्मेदारी दे देते है । घर के अन्दर तो ऐसा होता है, यहाँ तो देश की बात है । दो अलग देशों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं तो नागरिक–नागरिक बीच का अन्तर और उनकी मानसिकता को भी स्वीकार करना पड़ेगा । एक उदाहरण देता हूँ– अमेरिका में राष्ट्रपति बनने के लिए वहीं देश में जन्म होना पड़ता है, यह अनिवार्य है । इसीलए अमेरिका में रहनेवाले उच्च पदस्थ नेपाली में से कुछ लोग अपनी बेटी तथा बहू को प्रसुति के लिए अमेरिका ले जाते हैं । क्यों ? क्योंकि कल वहाँ की नागरिकता मिल सकती है और राजनीतिक अवसर प्राप्त हो सकता है, यह उनकी अपेक्षा रहती है । यह तो गलत मानसिकता है, कपटपूर्ण विचार है । संवैधानिक प्रावधान को गलत रूप में प्रयोग करनेवाले लोग इसी तरह सोचते हैं । ऐसी ही गलत मानिसकता वाले अंगीकृत नागरिक कल कोई गलत महत्वांकाक्षा के साथ राजनीति में आते हैं तो क्या होगा ? दूसरी बात, बहू होकर आनेवाली को क्या उच्च राजनीतिक पद प्राप्त होना ही अधिकार प्राप्त करना है ? ऐसा तो नहीं है । हमारे यहाँ अंगीकृत नागरिकों की सन्तान को वंशज का नागरिकता प्राप्त हो सकता है । क्या हमारी बहू अपनी सन्तान के लिए उक्त अवसर की प्रतिक्षा नहीं कर सकती ? अंगीकृत नागरिक के लिए संविधान में जो प्रावधान है, वही सही है । उससे लचीला नहीं हो सकते हैं । यह प्रावधान कुछ महिलाओं के लिए विभेदकारी लग सकता है । लेकिन हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सकारात्मक है ।
० अन्तरिम संविधान में नागरिकता सम्बन्धी जो प्रावधान है, उसी को कायम रखना चाहिए, ऐसा कहनेवाले भी तो हैं ?
– अगर अन्तरिम संविधान ही सबकुछ है और वही ठीक है तो क्यों अरबों का खर्च कर संविधानसभा बनाया गया ? संविधानसभा का औचित्य क्या रह गया ? अन्तरिम संविधान में हम लोगों ने गलती की थी । इसीलए संविधानसभा ने उसको सुधार किया है ।
० अन्त में, आप जिस वक्त सामान्य प्रशासन मन्त्री थे, उसके बारे कुछ बात करें । उस समय नागरिकस्तर से आप की बहुत प्रशंसा हुई थी । अब अगर आप को मन्त्री होने का अवसर प्राप्त हो गया तो किस मन्त्रालय की ओर आप की नजर है और वहाँ जाकर आप क्या कर सकते है ?
– फिर मन्त्री होने का अवसर मुझे प्राप्त होता है या नहीं, यह तो मुझे पता नहीं है । लेकिन हो जाता है तो अपनी जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निर्वाह करुंगा, मन्त्रालय जो भी हो । पहली बार जब मैं मन्त्री बन गया, जनता में सकारात्मक सन्देश प्रवाह करने में मैं सफल रहा । अब फिर ऐसा अवसर प्राप्त हो जाता है तो मेरा सम्पूर्ण प्रयास देश और जनता के लिए ही होता है ।
० आपके खयाल में प्रायः हमारे मन्त्री लोग क्यों सकारात्मक सन्देश नहीं दे पाते हैं ?
– जो लोग, जीवन का अन्तिम लक्ष्य मन्त्री पद को बनाता है और व्यक्तिगत स्वार्थ से भरे रहते है, ऐसे लोग सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाते हैं । राजनीति करने का मतलब मन्त्री होना है और अपना संगे–संम्बन्धियों को नौकरी दिलाना है, इस तरह का व्यक्ति परिणाम नहीं दे सकता है । इसी तरह राजनीति करने का मतलब व्यापारियों कि तरह पैसा कमाना है, कुछ लोग ऐसा भी समझते हैं । ऐसे व्यक्तियों से दैनिक प्रशासन तो चल सकता है, लेकिन जनता की नजर में परिणाम शून्य ही रहता है । व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता न देकर अपना काम–कर्तव्य, देश और जनता के लिए समर्पित करनेवालें कोई भी व्यक्ति मन्त्री बनता है तो हर कोई मन्त्रालय से सकारात्मक परिणाम निकाल सकते हैं ।
० अन्त में कुछ कहेंगे ?
– अभी हमारे देश में सामाजिक सद्भाव बिगड़ रहा है, सांस्कृतिक अतिक्रमण बढ़ रहा है, भौगोलिक और प्राकृतिक रूप में सम्पन्न देश को खण्डित करने का प्रयास हो रहा है, राजनीतिक रूप में मतभेद बढ़ रहा है । इन सभी नकारात्मक पक्षों को खत्म करना हम सभी का कर्तव्य है । व्

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