हे अनशन प्रभु ! तेरी सदा ही जय हो

मालिनी मिश्र, काठमाण्डू, ३१ जुलाई ।
अनशन न हो गया सभी ताले की चाभी हो गयी है । मधेसी दलों से लेकर डा. के सी तक सभी को सिर्फ अनशन का सहारा है । डा. के सी की मांग तो लगभग पूरी हो गयी । इनके अनशन में क्वालिटी थी जो मधेशी नेताओं में नही है वो है लगनशीलता, आपस में ही झगड़ कर १ से ४ गठबंधन न करने की क्षमता व ईमानदारिता । जानकारी के अनुसार महतो का भी कहना है कि १२ घण्टे के अनशन से कुछ नही होगा , करना है तो आमरण अनशन करों ।
 वैसे आमरण अनशन के लिए १ महीने बाद का समय ठीक रहेगा जब, महिलाएं  तीज में निर्जला व्रत करेंगी जिससे उनकी मनोकामनाएं पूरी हो और इधर साधारण जन जिसकी कोई नहीं सुन रहा नेताओं की बात में आकर आमरण अनशन करेंगें शायद अनशन देवता ही सुन लें । करें, मगर ये बात ध्यान में रखें कि जो लोग शहीद हुए हैं उनके घर अभी भी मातम का माहोल है और लोग क्यों मरने को तैयार हैं ? अपने परिवारों से क्या विक्षोभ rela ansan suru? मरना झूठी राष्ट्रीयता के लिए, जो कि हर २० घरों के बाद बदल जाती है क्योकि वहां फिर अलग सम्प्रदाय व जाति के लोग रहते हैं  ।
जहां नई सरकार बनाने में सभी दलों की सहमती चाहिए, वहां रोज एक नया टिटिम्भा हो रहा है । अभी तो प्रचण्ड जी ने भी मधेस की समस्या का समाधान करने की हामी भरी है । देखें आगे क्या होता है ।
पर प्रश्न सिर्फ मधेश का नही है । प्रश्न है कि सम्पूर्ण नेपाल की समस्या के समाधान के लिए समय समय पर अनशन पर कब तक बैठा जाएगा ? व कब तक इस अनशन का सहारा लिया जाएगा । सिर्फ अनशन से ही समस्याएं सामने आती हैं तो हर वर्ग हर समूह अनशन पर बैठ जाता ।
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