हे नाथ ! आप को भूलूं नहीं

भगवान का आशय है- हर समय, हर स्थान पर, हर परिस्थिति में, मृत्यु के क्षण में भी भगवान की सही रुप में सजीव स्मृति बने रहना। भगवान की स्मृति मात्र से भीषणतम दुःख तत्काल मिट जाता है और भगवान मिल जाते हैं। इसी स्मृति का नाम है- सादर सुमिरन। श्रीरामचरित मानस में इसकी महिमा का वर्ण्र्ााहै-
सादर सुमिरन जो नर कर ही। भव बारिध, गोपद इव तरही।।।
इसका अर्थ है- जो मनुष्य आदरपर्ूवक उनका -भगवानका) स्मरण करते हैं, वे तो संसाररुपी -दुस्तर) समुद्रको गायके खुर से बने हुए गढ्ढेके समान अर्थात् बिना किसी परिश्रम के पार कर जाते हैं।
क्या नहीं भूलूँ — आप को नहीं भूँलू। इसका गहरा भाव इस प्रकार हैः
१. आप मालिक हैं- हे नाथ ! मैं यह नहीं भुलूँ कि इस जगत के मालिक आप हैं। आपने इस जगत की केवल तीन चीजें मुझे सौपी हैं- शरीर, सम्बन्धी -पति, पत्नी, सन्तान, माता-पिता, भाइ-बहन आदि -परिवारजन) सम्पत्ति, इन तीनों के मालिक भी आप हैं। मुझे इन चीजों को आपकी चीजें मानकर आपकी प्रसन्नता के लिए रखनी है। श्रीरामचरित मानस में भगवान् श्रीराम की वाणी है-
जननी जनक बंधु सुत दार। तनु धनु भवन सहृदय परिवार।
सब के ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध वरिडोरी।
इसका अर्थ है- माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार इन सबके ममत्वरुपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों मे बांध देता है, ऐसा व्यक्ति मेरे हृदय में रहता है।
२. संभाल तथा सदुपयोग- हे नाथ ! मैं यह नहीं भूलँू कि मुझे आप के सामान और सम्पति को संभालकर रखना है और इनका सदुपयोग करना है। श्रीरामचरित मानस में भरतलालजी की वाणी है-
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलों तजि ताही।
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि र्साई दोहाई।
इसका अर्थ है- सारी संपति श्री रघुनाथजी की है। यदि उसकी व्यवस्था -रक्षा) किए बिना उसे ऐसे ही छोडÞकर चल दूँ तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है, क्योंकि स्वामी का दोह सब पापों में शिरोमणि है।
३. शरीर की सेवा- हे नाथ ! मैं यह नहीं भूँलू कि स्थलू शरीर को आपने बनाया है, आप ही इसके मालिक हैं। आप ही इसके लिए श्वास, हवा, जल, भोजन, वस्त्र, आवास आदि की व्यवस्था करते है। मेरे लिए यह शरीर आप का मेहमान है। मुझे आपकी प्रसन्नता के लिए इस शरीर की भरपूर सेवा करनी है, इसको संयम-नियम से रखना है।
४. सूक्ष्म तथा कारण शरीर- हे नाथ ! मैं यह नहीं भुलूँ कि सूक्ष्म तथा कारण शरीर भी आप के मेहमान है। मुझे इनकी भी सेवा करनी है। सूक्ष्म शरीर को ममता, कामना, राग-द्वेष से मुक्त निर्मल रखना है। कारण शरीर को कर्तापन से मुक्त एवं अहंकृतिरहित रखना है। इसके अस्तित्व को मिटा देना है। श्रीराम चरितमानस में भगवान् श्री रामकी वाणी है-
निर्मल मन जन सो मोही पाव। मोहि कपटछल छ्रि्र नभावा।।
अर्थात् जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छ्रि्र नहीं सुहाते।
५. परिवारजन- हे नाथ ! मैं यह नहीं भुलूँ कि परिवारजन आप के साक्षात् स्वरुप हैं और मुझे इनकी खूब सेवा करनी है, इनको भरपूर प्रेम देना है। श्रीरामचरित मानस में भगवान श्रीरामकी वाणी है-
सो अनन्य जा के असि मति न र्टर्रइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामी भगवंत।
इसका अर्थ है- हे हनुमान ! वही मेरा अनन्य भक्त है, जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मै सेवक हूँ और यह चराचर -जडÞ-चेतन) जगत मेरे स्वामी भगवान का स्वरुप है।
६. लौटाना- हे नाथ ! यह नहीं भुलूँ कि आप अपनी दी हर्ुइ तीनों चीजे -शरीर, सम्बन्धी और समान) मुझसे वापस अवश्य लेगें, कब, कहाँ और कैसे लेंगे- इसका पता नहीं है। जब भी आप अपनी कोई भी चीज मुझसे वापस लें तो मुझे आप को आपकी चीज प्रसन्नतापर्ूवक वापस लौटानी है। दुःख किस बात का –
७. कार्य- हे नाथ ! मैं यह नहीं भुलँू कि प्रात काल उठने से लेकर रात्रि में सोने तक शरीर, घर, परिवार, व्यापार, नौकरी, कार्यालय आदि के जितने भी कार्य करता हूँ, आप के कार्य है। मुझे आपके सभी कार्य आपकी प्रसन्नता के लिए पूरी सावधानी और निष्काम भावना से करने है।
-सेवक सुख चाहे मान भिखारी)।

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