हे भगवान ?

क्हते हैं मर्द को दर्द नहीं होता । यह बात सोर्ह आना सही है । ईसी लिए तो मर्द को औरत का दर्द कभी समझ में नहीं आता । मर्द का स्वभाव हमेशा ही सर्द रहता है जो औरत के लिए सर दर्द बनता है । यदि कोई भी मर्द सच में पुरुष है या वह औरत का सम्मान करना चाहता होता तो वह कभी किसी औरता की आबरु लु्ने कि चेष्टा न करता ।


व्यग्ँय…
जरा ईधर गौर फर्माईए तो । सत्य युग में ही नहीं ईस कलियुग मे भी महिलाओं के साथ नाईंसाफी हो रहा है फिर भी महिला धिक्कारवादी चूप है । वह भी साधारण महिला नहीं असाधारण और प्रतिष्ठित देवियों के साथ सदियों से यह हो रहा है फिर भी सभी मौन ब्रत रखे हुए हैं । शिवरात्री भगवान शिव का उत्पति दिवस छुट्टी पर देवी पार्वती के जनम दिन छुट्टी तो दूर की बात किसी को मालुम भी नहीं होगा वश कब पैदा हुई ? कृष्ण जन्माष्टमी भगवान कृष्ण का जनम दिन ईस दिन भी छुट्टी, पर राधाष्टमी न मनायी जाती है न छु्ट्टी ही देतें हैं । ईसी तरह राम नवमी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जनम दिन ईस दिन भी छुट्टी पर सीता नवमी न किसी को मालुम है, न मनायी जाती है न छुट्टी ही होती है तो देखा आप ने भगवान के समय से ही देवियों के साथ भेदभाव होता आया है ।

किस मर्द ने औरतों का माहवारी के समय होने वाला पेट दर्द और बच्चा पैदा करते समय का कष्ट को थोडा सा भी महसुस कर ले तो वह कभी किसी औरत का अपमान करने की नहीं सोचेगा ।
बेचारी महिला पति को खुश रखने के लिए अपना खुन जलाती है पर पति न परिवार ही खुश हो पाता है । ईष्र्या के चूल्हे पर पढा खुन जल कर खाक हो जाता है पर पति को पत्नी का प्रेम एक आंख नहीं दिखता । पत्नी पति के लिए तीज का ब्रत करती है, जीतिया करती है और करवा चौथ भी करती है पर पति उसी पत्नी के लिए मरतिया का ब्रत करता है अर्थात उसे मारता, पिटता है और दहेज कम लाने पर पानी कि तरह मट्टितेल छिडक कर पत्नी को माचिस का साबुन रगड कर मृत्यु से नहला देता है । फिर परिवार, समान और देश तमाशाई बन कर सब कुछ देखता रहता है पर विरोध नहीं करता । वह विरोध क्यों करे भई ? उसे तो मूफ्त मे सिनेमा जो देखने को मिल रहा है ।

मर्द औरतों का दर्द समझ कर पुरुष बने तब न ? मर्द को तो सिर्फ अपनी ताकत का ही घमंड है । ईसी लिए तो औरत का ख्याल रखने के बहाने से उस पर जोर आजमाईश ही करता है ।
बच्चा पैदा करती है मां, पालती, पोसती और बडा भी करती है मां पर बच्चा पहचाना जाता है पिता के नाम से । अपने पेट के जायों को मा अपना खून और दूध दे सकती है पर नागरिकता नहीं दे सकती । अगर मां नागरकता देगी तो पिता और पुरुषों का समाज और देश से वर्चस्व खत्म हो जाएगा । देश ननिहाल बन जाएगा पिता बेचारा हासिए पर चला जाएगा । बच्चा मां के नाम से पहचाना जाए यह बात कोई भी पुरुष हजम नहीं क सकता । हमारा समाज पुरुष प्रधान जो है । महिलाओं के लिए नीति, नियम पुरुष बनाते है । उनको कितना पर्दा करना है और कितना सर दिखाना है यह औरत नहीं मर्द तय करेगा । और सबसे बडी दुख कि बात यही है कि औरत की आबरु भी मर्द ही लुट्ते हैं ।
ईसी लिए यहां पूजा भी देवियों से देवों की होती है और छुट्टी भी ईन देवों के जनम दिन या उत्पति पर ईसी लिए देते हैं कि सारे मठ, मन्दिर और मस्जिद में जोगी, महंत या मौलाना पुरुष ही होता है । वह ही तय करता है कितना, किसको क्या भोग लगेगा । बहुत सारे मंदिर में महंत किसी भी औरतों को खुद नहीं छूते न भगवान को ही छुने देते है । कितने ही मन्दिरों में औरतों का प्रवेश या पूजा वर्जित होता है पर रात के स्याह अंधेरों में ईन्ही महंत या मठाधीश को किसी कन्या को भोगने से कोई आपत्ति नहीं । ईन महंतो और मठाधिशों को देख कर लगता है यह पैदा भी किसी पुरुष के ही पेट से हुए हैं । ईसी लिए औरतों के प्रति ईतनी नकारात्मक भावना रखते हैं । बहुत से देवियों के मन्दिर में भी पूजारी या महंत मर्द ही होता है । देवों के पूजा भी मर्द ही करते हैं और देवियों के पूजा भी मर्द ही करेगें । औरत का काम पूजा के वर्तन माझ्ना और मन्दिर में झाडु, बुहारु करना । वाह भइ वाह चीट भी मर्द का और पट भी मर्द के ही खाते में जाता है । आखिर नियम कानून का निर्माण कर्ता और रखवाला वही तो है । कडाही या तसला के भीतर चलनेवाला कलछुल या चम्मच पर खुद का ही अधिकार है तो खाना जिता मरजी और जब चाहे खा लो ।
क्हते हैं मर्द को दर्द नहीं होता । यह बात सोर्ह आना सही है । ईसी लिए तो मर्द को औरत का दर्द कभी समझ में नहीं आता । मर्द का स्वभाव हमेशा ही सर्द रहता है जो औरत के लिए सर दर्द बनता है । यदि कोई भी मर्द सच में पुरुष है या वह औरत का सम्मान करना चाहता होता तो वह कभी किसी औरता की आबरु लु्ने कि चेष्टा न करता । किस मर्द ने औरतों का माहवारी के समय होने वाला पेट दर्द और बच्चा पैदा करते समय का कष्ट को थोडा सा भी महसुस कर ले तो वह कभी किसी औरत का अपमान करने की नहीं सोचेगा । मर्द में अपने आप ही पुरुषोचित गूण निखर कर आ जाएगा जो सिर्फ मां को ही नही मानेगा सभी औरतों को भालिभांति सम्मान देगा जिनकी वह हकदार है । पर मर्द औरतों का दर्द समझ कर पुरुष बने तब न ? मर्द को तो सिर्फ अपनी ताकत का ही घमंड है । ईसी लिए तो औरत का ख्याल रखने के बहाने से उस पर जोर आजमाईश ही करता है ।
म्र्द मा का सम्मान करता है, देवी की पूजा करता है पर बांकी महिलाओं (पत्नी, बेटी, बहन आदि) के साथ सही व्यवहार नहीं करता । देवीं की पूजा भले ही कर ले पर कोई भी मर्द ईन देवियों के जनम दिन पर छुट्टी के लिए आवाज नहीं उठाता । मर्द, समाज और देश औरतों को आधा आकाश कहते है पर धरति पर राज खुद करते हैं । क्यों कि आकाश पर तो बादल और बिजली का राज है । आकाश में कुछ फलने, फूलने या खिलने की संभावना नहीं हैं । धरती पर तो हरेक वस्तु का उत्पादन और निर्माण संभव है पर आकाश तो खोखला और बंजर है । जहां कुछ भी बनने या सृजन होने कि उम्मिद न हो, जहां पर सिर्फ त्रिशंकू कि तरह लट्का ही जा सकता है । उस जगह को महिलाओं को दे कर आधा आकाश कह कर उसका मखौल उडाना और पूरी धरति पर खुद मस्ति करना । आदि काल से होता आ रहा है महिलाओं के साथ और आगे भी यही होता रहेगा ।

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