है ” निर्भया ” ये पूछती ….

गंगेश मिश्र,nk

मनुजता को तार-तार,
कर रहा जो बार-बार,
कुकृत्य कर रहा है जो,
नहीं है वो, मनुष्य जो।
दशों दिशाएँ रो रहीं,
प्रकृति धैर्य खो रही,
ये क्या हुआ;
ये क्या किया ?
मनुष्यता को, खो दिया।
किया है जो, ये पाप है,
जला रहा, ये ताप है।
तड़प-तड़प के, रह गया;
ज़मीर घूट के, रह गया;
ये जो हुआ,
ये क्यूँ हुआ ?
है ” निर्भया ” ये पूछती।

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