होली ! अब तूं किसकी हो ली –

मुकुन्द आचार्य:वसंत बहार । रंगों का उत्सव । बदलते हुए रंगों का महीना मार्च । र्सर्दी का जाना और वसंत का आगमन । यही वक्त है जब बाघ फूल, पेडÞ-पौधों एवं तितलियों से खिलखिलाने लगते हैं । लगता है, प्रकृति हौले-हौले सजधज कर चल रही है ।
ऐसे में लोग होली के बुखार से पीडिÞत हैं । खास कर किशोर होते हुए बच्चे, युवक होते हुए किशोर, प्रौढÞ होते हुए युवक और फूल बन कर खिलती हर्ुइ कली । सबों में शबाब बन कर रंगारंग होली खेलने का सैलाब ठाठें मारने लगता है । ऐसे ही खुशनुमा मौसम में कवि जी की मुलाकात होती है- सिनियर होली और उस की कमसीन बेटी जुनियर होलीholi से-
कविः- -सिनियर होली को घूरते हुए) मोहतरमा ! लगता है मैंने कहीं आप को देखा है ! बुढÞापे में याददाश्त साथ नहीं दे रही, वह भी बेवफा हो गई है ।
सि. होली- मैं भी कहूँ, हम पहले भी कहीं मिल चुके हैं । मगर कहाँ … – -जुनियर होली दोनो की बातचीत गौर से सुन रही है । उसका पहनावा इतना भडÞकदार और टाइट है, लगता है गुब्बारे की तरह पोशाक फट जाएंगे ।)
कवि- -दिमाग पर जो डालते हुए) अरे हां …. तुम तो होली हो न –
सि. होली- -उसी लहजे में) अरे आप तो कवि जी हैं न – वाह री किस्मत बुढापे में भी आप का दीदार हो गया । मैं तो निहाल हो गई !
कवि- होली ! तूं भी तो अब बूढÞी हो चली ! और तुम्हारे साथ यह कमसीन, नाजुक कली कौन है । यह किस गुलिस्तां की रौनक है – मास्साअल्लाह लगता है बनाने वाले ने खूबसूरती के नब्बे फीसदी इसी पे खर्च कर दिए । इस कली की तारीफ – जरा हमारा दिल भी बाग-बाग हो जाए !
सि. होली- हाय हाय कवि जी ! कम-से-कम मेरी बेटी पर तो बुरी नजर मत डालो ! बेचारी अभी तो गुंचा है, इसे गुल बन कर खिलने में सालों लगेंगे ।
जु. होली- अम्मी जान ! तुम भी किस खूसट बुढ्ढे से बात कर रही हो । इनके दिन तो अब लद गए । पके आम हैं, न मालूम कब ढÞब से गिर पडेंÞ । -इतना कह कर वह खुद की हंसी को अपने नाजुक लबों से छुपाने लगी ।)
कवि- -कुछ झेंपते हुए से) वो भी क्या दिन थे ! तुम्हारी अम्मी जान से मिल कर हम लोग भरपूर होली खेलते थे । यारों का अच्छा जमाबडÞा होता था । भंग छनती थी । ठर्ंर्डइ बनती थी । ‘बम भ्ोले ।’ बोलते हुए कई गिलास भंग हम यार लोग पी जाते थे । उसके बाद हुडÞदंग होता था ।
सि. होली- हां हां कवि जी, मुझे खूब याद है । मैं कैसे भूल सकती हूं, फगनुहट बयार और होली क विो रंगीन महफिल । भंग जब आप के सर चढÞ जाती थी तो आप गाने लगते थे- गंग से ऊंची तरंग उठे जब अंग में आवत भंग भवानी ! वे भी क्या दिन थे । भूलाए न भूलते !
कवि- वाह ! वाह !! कर्ुवान जाऊ तेरी याददाश्त पर । वो होली कुछ और ही होती थी । तूं भी तो गाती थी- भसूर लागे देवर, भर फागुन ! भंग के नशे में ।
जु. होली- गुस्ताफी माफ कवि जी, क्या बाबा आदम के जमाने की बात केलर बैठ गए । अब भंग का जमाना गया । अब तो शराब और कबाब के दिन हैं । अब तो दिलजले, मनचले लोग मेरी आँखों के जाम पीते हैं । आपकी उमर के अंकल लोग भी लोगों से आँख बचा कर मुझे आँख मारते हैं । सिटी बजाते हैं । बुरे इशारे करते हैं ।
कवि- तुम्हे देख कर कौन पागल न होगा, ए हसीना – किसी शायर ने शायद तुम्हारे लिए ही कहा है-
नजर मासूम, लब हंसते हुए, खिलता हुआ चेहरा,
वो कातिल है, मगर दिल से लगालेने के काबिल !
सि. होली-  ओ जनाब शायर ! आप लोग अपने समय में जो ठर्ंर्डइ बनाते थे, उसे याद कर अब भी मुंह में पानी भर आता है । खालिस दूध, किस्म किस्म के सूखे मेवे, उस में थोडÞी सी भंग । क्या जाएकेदार ठर्ंर्डइ बनती थी । और आप लोग यार दोस्तों के साथ रात भर हंसते-गाते-झूमते मस्ती करते थे । सच कहूं कवि जी, उन दिनों की जब याद आती है तो दिल में एक हक सी उठती है । कितनी हसीन यादें उन दिनों की, जेहन में अभी भी तरोताजा हैं ।
अब उन दिनों की मस्त होली की बात चलती है तो मेरी बेटी कहती है- अम्मी जान ! आप झूठ बोल रही हैं । क्या उस तरह होली मनाना भी मुमकिन है – लगता है कोई अफसाना सुन रही हूँ । आज की होली को देखते हुए उस जमाने की होली तो ‘भेज डिस !’ बेस्वाद !
कवि- जाने दो सिनियर होली । उन दिनों की, उन मस्तियों की याद न दिलाओ । खुशनसीबी से इस होली पे तुमसे मुलाकात हो गई । यह तो कुछ ऐसी बात हो गई-
उन्नतीसवीं को रुख के तेरे दीद हो गई,
अब चाहे चांद हो कि न होर् इद हो गई ।
सि. होली- जनाब शायर ! दुनिया बहुत बदल गई । लोगों की पसन्द भी घटिया हो गई । अब बैलून में रंग नहीं, नाली के गंदे पानी डÞाले जाते हैं, आज के लौंडे-लफाडेÞ । बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद । इनकी कलाइयों में वो दम-खम कहां जो घंटो भंग घोटें । बोतल ली और खडÞे-खडÞे गट-गट पी गए । न जीने का सलीका न पीने का । मुहब्बत के नाम को बदनाम करते हुए नयनमटक्का किया, फिर शादी की, फिर तलाक ! क्या इसी को मुहब्बत कहते हैं – ये भी कोई जिन्दगी है –
जु. कवि- अम्मी जान, आप भी क्या पुराने जमाने की घिसीपिटी बात ले कर बैठ गईं । लोग चांद पर तफरीह कर के आ गए । अब अगर कोई आशिक अपनी मेहबूबा को कहे- तुम्हारे लिए मैं चाँद तारे तोडÞ कर लाऊंगा ! तो वह उस आशिक को बेवकूफ और सिरफिरा कहेगी । आजकी मेहबूबा कहेगी- छोडÞ-छोडÞ मुझे चांद तारे न दिखा, चल एक अच्छी सी फिल्म दिखा । बडेÞ आए चाँद तारे तोडÞने वाले ! बाप न मारे पेडÞकी, बेटा तीरन्दाज !
-इतने में अम्मी जान ! मैं अभी आई’ …. कहते हुए वह कहीं चली गई ।)
सि. होली- जरा जल्दी आना बेटा ! अपना खयाल रखना । -कुछ रुक कर) क्या जमाना आ गया कवि जी । आजकल के ये बच्चे शैतान से कुछ भी कम नहीं । क्या शालीनता के साथ उस वक्त होली खेली जाती थी । अनेक रंग के गुलाल, गुलाल में मिलाई गई खुश्बू, बुजुगोर्ं के चरणों में थोडÞा सा गुलाल डÞाल कर उनकी बन्दगी करना, आशर्ीवाद लेना-देना, दुश्मन को भी गले लगाना- अब तो इन बातों पर कोई यकीन ही नहीं करता । आजकल के नालायक तो कहते हैं- यह भी कोई होली हर्ुइ । भेज होली ।  ये तो कहते हैं, खाओ तो ननभेज । खेलो तो ननभेज । कौन इनके मुंह लगे !
-इतने में जुनियर होली, हंसते-कूदते, बेहद गर्म जोशी के साथ नमूदार हर्ुइ और अपनी अम्मी से बोली-)
जु होली- अम्मी जान, लो ये दश हजार रख लो, खूब जमेगी होली ! -मां को हजार के ताजातरीन दश नोट देते हुए ।)
सि. होली- -जरा अचरजके साथ) बेटे ये कैसे पैसे हैं –
जु. होली- -कटिली मुस्कान के साथ) अम्मी जान, आम खाओं न, पेडÞ मत गिनो । खुद चल के आई लक्ष्मी को अपनी अंटी में कैद कर लो । खुदा भी कभी कभार छप्पर फाडÞ के देता है, अम्मा !
सि. होली- वो कैसे बेटा –
जु. होली- देखो ना । अभी एक बारात जा रही थी । बैण्ड बाजा की तर्ज पे मैंने एक ‘आइटम डान्स’ पेश कर दिया । घोडÞी पर सवार दूल्हे राजा ने दरियादिली दिखाते हुए मेरे डान्स से खुश हो कर दश हजार के नोट मुझे थमा दिए । बाराती भी मेरे संग खूब झूमे थे । दूल्हे ने रुपये देते हुए कहा था- ये लो मेरी जान, तुमने दिल खुश कर दिया । तुम भी क्या याद करोगी, किसी र्रइस से पाला पडÞा था । मैंने भी लपक लिए खुशी-खुशी दस हजार ! पाँच मिनट कूल्हे मटकाए, दस हजार नगद पाए ! सौदा बुरा नहीं है, अम्मी जान !
-अम्मी जान ने भी अपने झूलते सीने के पास गरमा गरम नोंटो को और गरम करने के लिए वास्ते डÞाल दिए । सूखे हुए स्तन ताजातरीन नोटों को नजदीक पा कर कुछ हरियाली महसूस करने लगे । अम्मी जान के चेहरे में भी नायाब चमक आ गई ।)
सि. होली- -मुझे कुहनी मारते हुए) कवि जी ! देखा न जुनियर होली का कमाल ! आखिर बेटी किसकी है । आप लोग बच्चियों को घूर-घूर कर समय के पहले जवान बना देते हैं । ये अच्छी बात नहीं है, कवि जी, पाप लगेगा !
कवि- फूल शाखों के हों कि आंखो के, हम तो खूबसूरती पर जान छिडÞकते हैं । हम जैसे दिल वालों के लिए किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
फिरते हैं कब से सर को हथेली पे रख के हम
क्या शहर-भर में अब कोई कातिल नहीं रहा –
सि. होली- हाय हाय कवि जी ! ये गजब मत करो । होली खेलने के लिए आप को मेरी ही बच्ची मिली है – बेचारी पर रहम करो । होली हमसे खेलो ना । पुरानी होली की याद ताजा कर लें, उस पे वक्त की धूल जम गई होगी ।  मसहूर शायर आरजू लखनवी ने फरमाया है-
फैल गई बालों में सफेदी, चौंक जरा करवट तो बदल
शाम से गाफिल सोने वाले, देख तो कितनी रात रही ।
कवि- सिनियर होली, जरा इस बात को भी पल्लू में गांठ बांध लेना । ‘जिगर’ मुरादवादी ने क्या खूब फरमाया है-
हमीं जब न होंगे, तो क्या रंगे-महफिल
किसे देख कर आप शर्माईएगा ।
-जुनियर होली ने अपनी अम्मी जान के पुराने यार को देख कर ओठ बिचका दिए !)
-पटाक्षेप

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