होशियार ! कलाकार ही कहीं मधेश में सरकार न बना लें : कैलाश महतो


कैलाश महतो,परासी| न कला का कोई धर्म होता है, न कलाकारों का । न सेवकों का कोई धर्म होता है, न पीडितों का । कलाकारों के लिए कला ही उसका धर्म होता है । सेवकों के लिए सेवा ही उसका धर्म होता है । पीडितों का धर्म भी सिर्फ सेवा पाना होता है । वह जात पात, धर्म व मजहब नहीं, सहयोग का मोहताज होता है ।
नेपाली टेलिश्रृंखला का एक चर्चित कलाकार धुर्मुस आजकल मधेश क्षेत्र में सेवाभाव से समर्पित दिख रहे हैं । वे बर्दिबास के मुसहर बस्ती के पूनर्वास कार्यक्रम योजना को सफल बनाने से लेकर मधेश के बाढ पीडितों की सेवा में जो सक्रिय भूमिका दिखायी है, वह वाकई तारीफयोग्य है । ऐसे सेवा करने बाले लोग सिर्फ किसी देश के ही नागरिक नहीं, अपितु वह विश्व नागरिक कहलाने का हक रखता है ।
सामाजिक विद्वानों का यह मानना कतई असमञ्जस की बात नहीं हो सकता कि राजनीति में साम, दाम, दण्ड और भेद सारा मौजुद रहता है । राजनीति का टिकने स्थान ही किसान, मजदुर, गरीब, दुःखी, असहाय, दलित, यूवा, विद्यार्थी, बेरोजगार और बहष्किृत समुदाय के लोग होते हैं । वे लोग राजनीति नहीं करते, मगर राजनीति करने बालों को प्राण देते हैं । वे न हो तो राजनीतिकर्मी अपने में ही मरकट कर नष्ट जायेंगे ।
प्राकृतिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, रोजगारीक, सामुदायिक आदि हर मुसिबतों का सैलाब उन्हीं लोगों को झेलने पडते हैं । उन्हीं मुसिबतों को दिखा दिखाकर, नयें नयें नारे बनाकर, उनके हितों की बातें करके उनके गलियारें में राजनीतिकर्मी तथा सरकारी व गैरसरकारी संस्थायें घुस जाते हैं । उन्हें भावुक बनाकर, उनमें नयें सपने जगाकर उनके मतों को अपने पक्ष में कर लेते हैं । यूँ कहें तो राजनीत का केन्द्र ही वे लोग होते हैं । लेकिन राजनीतिक फायदों से हमेशा उन्हें दूर रखा जाता है ।
साम, दाम, दण्ड और भेद नीति अन्तर्गत ही धुर्मुस मधेश में सेवा नीति के खोल ओढकर राजनीति का खेती करने चला है । जो सरकार मधेश का सारा आय उठाकर नेपाल ले जाता है, उसका एक कलाकार प्रतिनिधी मधेश के मुसहर बस्ती से लेकर बाढ पीडितों के सहयोग के लिए हाजिर होता है । अगर कलाकार ही पीडितों को सेवा और सहयोग करने लगे तो फिर सरकार किस काम के ? क्यूँ चाहिए सरकार ? जिस सरकार को मूक और अमूक पार्टी तथा नेता चला रहे हैं, वह सरकार कलाकार क्यूँ नहीं चलाता जब वे ही पीडितोंतक पहुँचते हों ? जो सरकार किसी व्यक्ति या संघ–सस्था को पीडितों को प्रत्यक्ष सहयोग करने से रोकती हो, धुर्मुस को खुला छुट देने की रहस्य क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि नेपाल सरकार मधेश में धुर्मुस को भेंजकर कोई नयाँ पैंतरा खडा कर रही है ? कलाकार के प्रति मधेश का ध्यान आकर्षित कर मधेश को नेपाल के अंग बनाने की उपाय निकाला जा रहा है ? मधेश को होश में रहना बेहद जरुरी है । ऐसा न हो कि कलाकार ही मधेश में कहीं कोई सरकार बना लें !
बाढ पीडितों कोे जो और जितने सहयोग सामग्रियाँ दी जा रही है, क्या वे किसी भी मायने में पूरा है ? क्या एक प्याकेट भुजा‐मुढी), एक प्याकेट दालमोठ, चाउचाउ, एक प्याकेट सर्वोत्तम आँटा, एक सेट टूथ ब्रश, पेष्ट, एक बाल्टी, एक मग, एक दो चादर, एक बोतल पानी, एक प्लाष्टिक का पाल बगैरह एक परिवार के लिए पर्याप्त है ? समाचार यह भी है कि जो कपडे मधेशियों को बाँटा गया है, उनमें ज्यादातर पूराने और कटेफटे हैं । क्या मधेश किसी के फेके हुए कटेफटे कपडों के ही काबिल है ? क्या मधेश सिर्फ राजनीति करने के लिए ही है ?
मधेश को सरकारी नाटकों को समझना होगा । एक तरफ वह मधेश के सारे प्राकृतिक श्रोत व साधनों को नष्ट कर मधेशियों को तबाह करने का योजना बनाता है, उसे प्राकृतिक और कृतिम दोनों आपदाओं का शिकार बनाता है तो दूसरी तरफ उसके घावों पर मलहम लगाने का नाटक करता है । चोर भी वही और पुिलस भी वही । डायन और धामी दोनों वही । प्राकृतिक आपदायें एक तरफ किसी को कष्टकर जीवन जिने को बाध्य करती हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार, उसके कैयन अधिकारी और सरकारी÷गैर–सरकारी संघ–संस्थाओं के लिए कमाई करने का खुश्नुमा माहौल बना देती हैं ।
अगर मधेशियों से वाकई राज्य को किसी तरह का प्रेम है या उसे नेपाली मानता है या मधेश को नेपाल का कृषि क्षेत्र मानता है, तो जंगल कटान रोककर नये ढंग से जंगलीकरण करें । मधेश से अनावश्यक जनसंख्या की चाप को हटाये और बसाई सराई को तुरन्त रोकें ।
भूकम्पों को छोड प्राकृतिक आपदाओं के रुप में पहाडों पर बस् एक समस्या है ः भूस्खलन – जिसे नेपाल सरकार, उसकी सारी मीडिया तथा नागरिक समाज प्रचार प्रसार करने में हर पल तल्लीन रहती है । वहीं मधेश में प्राकृतिक और कृतिम दोनों आपदायें ः सलाना बाढों का कहर, भूक्षय, आगलगी, सुक्खापन, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अत्ति ठण्ड, कोहरा, आदि जैसे समस्याओं को सरकार जानबुझकर नजरअन्दाज करती है । पहाडों के आपदाओं में भारत से लेकर चीनतक, और पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक अगर प्रत्यक्ष सहयोगों के लिए पहुँचे तो नेपाल सरकार की तबियत खुश होती है । वहीं मधेश के किसी विपद में कोई व्यतिm, समूह या राष्ट्र पहुँचने की चेष्टा करे तो नेपाल को बुखार लग जाती है । उसके लिए उसे नेपाल सरकार की अनुमति लेनी पडती है ।
एक आम हिसाब अगर हम करें तो मधेश में हो रहे प्राकृतिक एवं कृतिम आपदाओं से सालाना धनजन की जितनी क्षति होती है, उसे रोकने की उपाय अगर निकाली जाय तो मधेश आज भी सम्पन्न होने का हैसियत रखता है । मगर नेपाल सरकार जानकर यह होने देने की योजना बनाती है कभी मधेश का जंगल विनाश करके तो कभी चुरे क्षेत्र से गैरप्राकृतिक रुप में बालु और गिट्टी खोदकर अन्तर्राष्ट्रिय बाजारों में बेचकर । मधेश में अनावश्यक बस्ती विकास एवं पूनर्वास कम्पनी तथा सुकुम्बासी समस्या समाधान के नामपर पहाडों से सुनियोजित तरीकों से नेपालियों को मधेश में आकर घर संसार बसाने का प्रलोभन देकर । कभी भूमाफियाओं को खडा करके विकास और सेवा के नामपर खोले गये बैंकों से भूमि दलालों में अनैतिक पैसे लगानी करके मधेश के जमीनों को महँगाई के पराकाष्ठा पर चढाकर ता कि मधेशी द्वारा बेचे जाने बाले जमीन फिरसे कोई दूसरा तीसरा मधेशी ही खरीद न पाये ।
मधेशी बाढ, आग, भूस्खलन, भूक्षति, सुक्खापन, भूख, रोग, कष्ट, शादी–विवाह, शिक्षा, धर्म–कर्म, पूजा–पाठ, पर्व–त्यौहार, व्रतबन्ध, तीर्थ आदि में मजबूरन अपने बचेखुचे सम्पत्ति और खेतबारी बेच डाले और शनैः शनैः सारे या बहुसंख्यक मधेशी भूमिहीन हो जाये, नेपालियों का गुलाम बन जाये, और या तो वे नेपालियों के दास बन जायें या मधेश से पलायन हो जायें ।

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