होश में आने का क्षण ही जीवन का प्रारम्भ है
-सत्यनारायण भटनागर

मानव जीवन क्या है – इसकी व्याख्या अलग-अलग विद्वानों, चिन्तकों ने की है । एक बात पर सब सहमत है कि जीवन में संर्घष्ा है, इसलिए कतिपय विद्वान मानते हैं कि जीवन एक घमासान युद्ध है । बिना युद्ध के जीवन नीरस हो जाता है । इसलिए संस्कृति में तो कहते भी है- ‘वीर भोग्या बसुन्धरा’ जीवन का आनंद साहस से ही मिलता है । कायरों के लिए आनंद का कोई कारण नहीं । युद्ध मरण का गान है जो यह गान गा चुका, वह जीवन जीने का भरपूर आनंद ले सका । व्यापार, व्यवसाय और उद्योग जगत में तो साहस सफलता के लिए एक प्रमुख कारक है ।
उपरोक्त वर्ण्र्ाासही है तो हम यह भी जानते हैं कि युद्ध के अंत में शान्ति नहीं मिलती । युद्ध का अंत हमेशा हाहाकार और अशान्ति में ही होता है । युद्ध में अपना पराया होता है तो राग, द्वेष, घृणा, हिंसा, लोभ लालच, धोखा, झूठ, पाखण्ड सभी कुछ आ जाते हैं । जहाँ कोई पराया हुआ कि अशान्ति प्रारम्भ । महाभारत का युद्ध इसका एक अच्छा उदाहरण है । महाभारत के युद्ध में पाण्डव पक्ष को भी जीत के बाद क्या मिला । सब हाथ मलते रह गए । जीवन यदि संर्घष्ा है, युद्ध है तो अंतिम परिणाम बर्बादी है । वास्तव में हम इसे अनुभव भी करते हैं । दुनिया के सफलतम व्यक्तियों को क्या मिला । वृद्धावस्था प्राप्त होते ही उन्हें महसुस हुआ कि जो कुछ हुआ भूल है । माया मोह है । इसका सबसे अच्छा उदाहरण सिकन्दर महान है ।
सिकन्दर संदेशः- सिकन्दर दुनियाँ के सफलतम विजेताओं में से एक है । उसने दुनियाँ जीती है, जब वह मृत्यु के समीप आया तो उसने कहा- ‘मेरे जनाजे में मेरे हाथ कफन से बाहर रखें जाए’ किसी ने पूछा- ‘ऐसा कयों -‘ उसका जवाब था कि संसार के लोग देख ले कि विश्व विजेता भी खाली हाथ ही गया । वह कुछ साथ नहीं ले गया । हम कुछ भी कर लें अंत में तो यही होता है और जब यह अंत दिखाई देता है और स्वार्थो कें लिए अपनों में ही हक मारा मारी देखते है तो युद्ध का परिणाम दिखाई देता है ।
एक सिनेमा का गाना इस स्थिति को इस प्रकार उच्चारित करता है- ‘सब कुछ लूटा के होश में आए तो क्या हुआ -‘ बडÞा निराशमय चित्र बनता है । हम देखते हैं कि इस क्षण की हताशा में कई लोग आत्महत्या कर लेते हैं लेकिन भारतीय चिन्तक और दार्शनिक इस क्षण को सबसे महत्वपर्ूण्ा मानते हैं । भारत की मान्यता है कि अंत में जब हमें होश आए जागरण हो तभी से वास्तविक जीवन प्रारम्भ होता है । जब हम सब दूर से लूट कर संसार की र्व्यर्थता, भाग दौडÞ की निस्सारता जान लेते है तब हमें ज्ञान होता है कि हम क्या हैं । हमारे आडम्बर, अहंकार नष्ट हो जाते हैं । हमें पता चलता है कि वास्तविक जीवन क्या है ।
इसलिए भारत में संसार से लुटा, पीटा, हारा व्यक्ति आत्महत्या नहीं करता, वह दुनियँ छोडÞकस् सन्यास ग्रहण कर लेता है । दुनियाँ की वास्तविकता समझ लेने पर ही मानव जीवन का मूल उद्देश्य, अपने कल्याण का विचार आता है । हमर् इश्वर के प्रति धन्यवाद से भरते हैं ।
जीवन का प्रारम्भ कब से ः- हमारी वास्तविक उम्र क्या है – जीवन का प्रारम्भ कब से है – यह प्रश्न है । जब तक हम अपने पराए के राग द्वेष में स्नान कर रहे हैं । हम बेहोशी में हैं । बेहोशी में हमने जो कुछ किया, उसके जिम्मेदार हम हो ही नहीं सकते । वास्तव में हमारा जीवन प्रारम्भ ही तब से होता है जब हम सब कुछ लूटा के होश में आते है ।
एक कहानी याद आती है । एक साधु महाराज एक नगर में गए । उन्होंने कहा- ‘मैंने ऐसा व्रत लिया है कि जो गृहस्थ सत्य बोलता है, उसी के घर का भोजन करुँगा ।’ नगर में ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है क्यों कि आजकल सभी कुछ न कुछ झूठ का सहारा लेते है । अंत में एक व्यापारी मिला जो सच ही बोलता था । साधु महाराज वहाँ ले जाए गए । साधु ने व्यापारी से पुछा- ‘अपाकी उम्र क्या है – सेठ ने जवाब दिया- ‘दस वर्ष साधु हक्का बक्का रह गया । सेठ साफ झूठ बोल रहा है । यह कैसा सत्यवादी, साधु ने कहा- ‘सेठ साहब आपकी उम्र तो पचास वर्षसे कम नहीं लगती, आप दस वर्षकैसे कह रहे है -‘
सेठ ने जवाब दिया- ‘आप सच कहते है पर मैंने अपनी उम्र दस वर्षइसलिए बतायी कि दस वर्षसे ही में सत्य व्रत का कठोरता से पालन कर रहा हूँ । उसके पहले की उम्र तो र्व्यर्थ गई । जिस क्षण होश आया, उसी क्षण से जीवन का वास्तविक प्रारम्भ है ।’
होश में आने का क्षण ः- श्रीमद् भागवद् गीता कहती है कि मृत्यु के अन्तिम क्षण में भी यदि हम जाग जाए तो मुक्ति मिल सकती है । जीवन भर जो संस्कार हमने पाए उसी का परिणाम है यह अन्तिम क्षण । श्रीमद् भागवद् गीता कहती है- ‘और जीवन के अन्त में जो केवल मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह तुरन्त मेरे स्वभाव को प्राप्त करता है, इसमें तनिक मात्र भी सन्देह नहीं है ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि होश में आने का क्षण ही महत्वपर्ूण्ा है । गीता में भगवान कृष्ण घोषणा करते है- ‘मेरे भक्त का पतन नहीं होता, भगवान के लिए ब्राम्हण, गाय, कुत्ता, हाथी सब समान है । गीता के पन्द्रहवें अध्याय में वे स्पष्ट घोषणा करते हैं कि प्राणी मात्र उनका अंश है । यह संसार भगवान का ही साकार रूप है, जो भक्त इसमेर्ंर् इश्वर को देखता है, वही वास्तव में देखता है । प्रकृति और प्राणी में वे ही है, दूसरा कोई है ही नहीं, इसलिए जिसे यह होश आ जाता है उसका पर्ूव का जीवन कैसा ही गया हो, उस क्षण से वह भक्त बन जाता है । इस तथ्य की घोषणा भी गीता में इन शब्दों में की है- ‘यदि कोई जघन्यतम कर्म भी करता है किन्तु यदि वह भक्ति में रत है तो उसे साधु समझना चाहिए, क्योंकि वह संकल्प में अडिग रहता है ।’ वह तुरुन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थाई शान्ति को प्राप्त होता है । हे कुन्ती पुत्र ! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता ।’
भगवान कृष्ण घोषणा करते हैं कि कैसा ही जीवन हो किन्तु यदि कोई होश में आकर भगवान की शरण में पहुंच गया तो भगवान उसकी रक्षा करते हैं । उसको फिर कोई डर नहीं, होश में आने का महत्व है । यह क्षण महत्वपर्ूण्ा है, जीवन में शुभ कल्याण संकल्प लेने की देर है फिर जीवन बदल जाएगा, रास्ते दिखने लगेंगे । भगवान की मदद मिलना प्रारम्भ हो जाएगी । जीवन में बेहोशी खत्म होने की देर है । होश में आने का क्षण ही जीवन का वास्तविक क्षण है, देर कभी नहीं होती ।
– २ एम.आई.जी. देवरा देव
नारायण नगर, रतलाम -म.प्र.) ४५७००१)

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