१८५७ की क्रान्ति का सैन्य दृष्टिकोण से अध्ययन

डाँ. राम तिवारी:१८५७ की सैन्य क्रान्ति सैन्य जगत के इतिहास में एक आर्श्चर्यजनक घटना है यह भारतीय इतिहास में उत्तर से दक्षिण तक विदेशी सत्ता को समाप्त करने का संयुक्त प्रयास रहा है । ‘युद्ध’ हो अथवा ‘शान्ति’ दोनों स्थितियों में भारतीय ने मर्यादाओं का एवं नैतिक मूल्यों का पर्ूण्ा ध्यान रखा है परन्तु कतिपय असावधानी एवं उदारता में हम शत्रु की कूटनीतिक चालों को नहीं समझ सके । परिणामस्वरूप हमलावरों ने न केवल हमारी सम्प्रभुता को चुनौती दी अपितु हमें सदियों की दासता भुगतने के लिए विवश कर दिया । ‘बांटो और राज्य करो’ की फिरंगी कूटनीति ने गुलामी से मुक्ति के उपरान्त स्वाधीनता प्राप्ति को राष्ट्र विभाजन की घिनौनी शर्त से जोडÞ दिया । क्योंकि वह स्वाधीन भारतीय व्यवस्था को शान्तिपर्ूण्ा एवं व्यवस्थित नहीं देखना चाहते थे ।
१८५७ का पर्ूण्ा स्वाधीनता संग्राम सुनियोजित युद्ध का बिखरा परिदृश्य था । जिस कारण यह प्रथम सैन्य क्रान्ति पर्ूण्ा सफल नहीं हो सकी । ‘नाना साहब’ ने जिस क्रान्ति की ज्वाला को कानपुर से सभी स्थानों पर भेजा था और सभी स्थानों पर एक साथ संग्राम की घोषणा की थी, वह समय से पर्ूव बिखरे हुए स्वरूप में दिखायी दी इसी कारण अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे व्रि्रोह एवं गदर का नाम देकर इस सैन्य क्रान्ति को विश्व पटल पर संकुचित करने का प्रयास किया । आजादी के इतने वषार्ंे बाद भी इस घटना पर बहुत प्रकार के मतभेद दिखाई देते हैं । परन्तु वस्तुतः यह पर्ूण्ा स्वाधीनता संग्राम था एवं १८५७ की क्रान्ति सैन्य क्रान्ति थी जिस में जाग्रत सेनानियों ने ‘नाना साहब’ द्वारा भेजे गये ‘कमल’ संदेश को स्वीकार किया तो जनसामान्य ने ‘रोटी’ के संदेश पर क्रान्ति में सहभाग की स्वीकार्यतः बिना किसी चर्चा के स्वीकार की । कानपुर से निकला यह ‘कमल’ एवं ‘रोटी’ का संदेश सैनिकों की छावनी से होकर जनसामान्य को उद्देलित कर गया ।
क्रान्ति वस्तुतः मानव मस्तिष्क की उपज है जो शोषण, स्वतंत्रता के हनन व असन्तोष आदि कारणों से प्रस्फुटित होती है तथा समाज में उत्पन्न हो रही नूतन विचारधारायें इसके उत्प्रेरक का कार्य करती हैं । इस में जनसमूह की गतिविधियां पहले प्रारम्भ हो जाती हैं, नेतृत्वकर्ता बाद में प्रकट होते है । जब किसी राष्ट्र के नागरिकों द्वारा तत्कालीन शासकों को हटाने के लिए सःशस्त्र विधियां अपनायी जाती हंै तो उसे क्रान्तिकारी युद्ध, गुरिल्ला युद्ध कर्म अथवा इमरजेन्सी आदि विभिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है ।
इसी तरह की घटनाओं के फलस्वरूप सैनिकों द्वारा १८५७ में तत्कालीन अंग्रेज शासकों के विरूद्ध की गयी क्रान्ति, सैन्य क्रान्ति की अमिट मिसाल है । अंग्रेजी दमन चक्र से मुक्ति पाने के लिए किये गये इस आन्दोलन के सम्बन्ध में विद्वान एवं इतिहासकार एक मत नहीं हैं । अधिकांश अंग्रेजी इतिहासकार जहां इसे शुद्ध एवं सरल व्रि्रोह मानते हैं वहीं आधुनिक इतिहासकार सन् १८५७ की इस महान क्रान्ति को भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की संज्ञा देते हैं । इस महत्त्वपर्ूण्ा मुक्ति आंदोलन के कारणों एवम प्रभावों को गहनता से दृष्टिगत किया जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि यह मात्र सैनिक व्रि्रोह नहीं था, अपितु कम्पनी की दासता से मुक्ति पाने के लिए की गई महान सैन्य क्रान्ति थी ।
इस स्वतंत्रता संग्राम के अनेक राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक एवम सैनिक कारण थे । सैनिक कारणों में भेदभाव की नीति उच्च पदों के लिए भारतीय सैनिकों को अयोग्य मानना, अफगान एवं वर्मा युद्ध में भारतीय सैनिको को जबरदस्ती समुद्र पार भेजना, सेना में पगडÞी प्रतिबंधित करना, सेना में गाय एवं सूअर की चर्बी लगी कारतूसों का प्रयोग करना, सैनिकों के लिए अप्रत्याशित रूप से नागवार गुजरा जिसके कारण निश्चित तिथि ३१ मई १८५७ से पर्ूव १० मई १८५७ से ही सैन्य क्रान्ति के रूप में ज्वाला भडÞक उठी । बैरकपुर छावनी, बिठूर, फतेहगढÞ, लखनऊ, पटना, झांसी, अजमेर, नजीराबाद, अलीगंज, लाहौर, जालंधर, कांगडÞा, पेशावर और फिरोजपुर में इस ज्वाला का असर दिखायी पडÞा । क्रान्ति का प्रमुख सूत्रधार एवं केन्द्र बिन्दु कानपुर रहा ।
समुचित संगठन, कुशल नेतृत्च की पकडÞ, जन सहयोग का व्यवस्थित स्वरूप, गतिशीलता, समुचित साधन एवं शस्त्रास्त्र, अनुकूल समय और स्पष्ट लक्ष्य के अभाव में भारत का यह प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन लक्ष्य को तत्काल प्राप्त नहीं कर पाया । परन्तु यह आन्दोलन कम्पनी के शासन को समाप्त करने में सफल रहा । अंग्रेजी सेना का पर्ुनंगठन किया गया, तथा अंग्रेजो ने अपनी नीति अवसर के अनुरूप बदली ।
सैनिक क्रान्ति की इतनी व्यापक पुनरावृत्ति को रोकने के लिए १ नवम्बर १८५८ को अंग्रेजी सरकार ने व्यापक परिवर्तन किये । बंगाल प्रेसीडेन्सी सेनाओं में १८ बटालियन को छोडÞकर शेष सम्पर्ूण्ा सेना भंग कर दी गयी । भारतीय तोपखाने को भंग कर ब्रिटिश तोपखाने की एक ब्रिगेड को भारत भेजा गया । प्रेसीडेन्सी सेनाओं में अंग्रेज-भारतीय सैनिकों की संख्या १ः२ के स्थान पर १ः३ हो गयी । अश्वारोही रेजीमेंटो के स्थान पर सम्पर्ूण्ा अश्वारोही सेना को पुरानी सिल्हदरी पद्धति पर संगठित किया गया । भारतीय सैनिकों एवं अश्व टुकडियाँ कम कर दी गई तथा कुछ को आपस में मिला दिया गया । किलो और महत्वपर्ूण्ा स्थानों की सुरक्षा में अंग्रेज अफसरों को रखा गया । सभी भारतीय सेनाओं को खाकी वर्दी प्रदान की गयी और उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य की सेनाओं की संज्ञा दी गई ।
सैन्य क्रान्ति में सैनिकों को जिस ढंग से आम जनमानस से सहयोग मिला उसको देखते हुए सन् १८६१ में भारत की सेनाओं का पर्ुनर्गठन किया गया जो ४ वषर्ाे में पूरा हो गया । १ अप्रैल १८९५ को तीनों प्रेसीडेन्सी सेनाओं का अस्तित्व समाप्त कर प्रशासनिक सुविधा हेतु भौगोलिक आधार पर चार कमांड में पुनः संगठित किया गया है । -१) पंजाब कमांड -२) बंगाल कमांड -३) मद्रास कमांड -बर्मा सहित) -४) बर्म्बई कमांड -सिन्ध, क्वेटा तथा बर्मा, अदन सहित) प्रत्येक कमांड का कमांडर एक लेफि्टीनेन्ट जनरल पद के अफसर को नियुक्त किया गया ।
१८५७ से १९१र्४र् इ. यानि प्रथम विश्वयुद्ध तक ब्रिटिश शासकों द्वारा बहुत से प्रयोग किये गये जिससे कि सैनिको में असन्तोष कम करके स्वामिभक्ति का भाव जाग्रत किया जाये । क्योंकि सैनिक असन्तोष का परिणाम १८५७ की सैन्य क्रान्ति के रूप में अंग्रेजो ने देखा था । जिसमें इतनी क्षति हर्ुइ जिसका परिणाम यह रहा कि कम्पनी को अपना शासन समाप्त करना पडÞा । व्यावसायिक लक्ष्यों के स्थान पर ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीय जनता के हित में कार्य करने को विवश होना पडÞा ।
१८५७ की सैन्य क्रान्ति में सेना के मानसिक व्रि्रोह ने अंग्रेजों को अधिक नुकसान पहुंचाया था, इस कारण अंग्रेजो का प्रथम उद्देश्य सेना में मेधावी बेरोजगार भारतीयों को उच्च पदों में रखकर उनके कंधे से अपनी सत्ता की गोली भारतीय जनमानस पर चलवाना था, और वह अपने इस उद्देश्य में सफल भी रहे । कई बडÞे हत्याकांड इसके उदाहरण है । सन् १८५७-१८५९ के बीच में ३ लाख भारतीय मारे गये वही सन् १९४७ की आजादी तक ६ लाख भारतीय शहीद हुये ।
१८५७ की सैन्य क्रान्ति में जहां अंग्रेजो को भारतीय सैनिकों के कारण इतना अप्रत्याशित नुकसान हुआ । वहीं सेना के भारतीयकरण होने पर अर्थात् सेना में भारतीयों की सहभागिता उच्च स्तर पर होने पर सन् १८५७ के उपरान्त कभी नहीं हुआ । जब भारत आजाद हुआ उस दिन तक सेना पर उनका प्रभाव दिखाई दिया । यह रणनीति सेना के भारतीयकरण के नाम पर अंग्रेजी मानसिकता के विस्तार के काम आयी जिसमें वे सफल रहे । अंग्रेजो ने ऐसी चाले, चली जिसके अर्न्तर्गत भारतीय सैनिकों से भारतीयों को मरवाया गया । यह मानसिक गुलामी का जीवन्त उदाहरण हमारे इतिहास में काला अध्याय बनकर जुडÞा । अंग्रेज ‘गांधी’ जी का अहिंसा आन्दोलन भारतीय सैनिकों से दबवाते थे तो ‘सुभाषचन्द्र बोस’ की सेना का विरोध भी भारतीय सैनिकों एवं भारतीय अधिकारियों से करवाते रहे । परन्तु यह तय हो गया था कि सैन्य क्रान्ति का सन् १८५७ का अध्याय अंग्रेजी सरकार की चूलें हिला गया ।
१८५७ की क्रान्ति में जब सेनानायकों का सैन्य दृष्टि से अध्ययन करें तो पाते है कि सेनानायकों में सबसे अधिक कुशलतम और अप्रत्याशित नेतृत्व का कार्य ‘तात्याटोपे’ ने किया । ‘तात्याटोपे’ ने आने वाले पीढिÞयों के लिए अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया हैं । ‘तात्याटोपे’ ने ही र्सवप्रथम १८५७ के युद्ध में छापामार युद्ध पद्धति का सहारा लिया । यह पद्धति इतनी कुशलता पर्ूवक संचालित की जाती थी कि अंग्रेज सरकार भयभीत रहती थी । तात्याटोपे के कुशलतम युद्धकला के सर्ंदर्भ में लंदन टाइम्स के युद्ध संवाददाता विलियम रसेल ने माई डायरी इन इंडिया में लिखा है कि- ‘हमारे योग्य मित्र तात्याटोपे इतना परेशान करने वाला तथा चालाक है कि उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती गत जून मास से उसने मध्यभारत को आंदोलित कर रखा है । उसकी गति दुधारी बिजली की तरह थी । उसने दोनों ओर से नर्मदा पार की । वह हमारी सेनाओं के बीच से गुजरता था । रास्ते में चाहे पहाडÞ हो, नदिया हो, बडÞे गड्ढÞे हो, घाटियाँ हो, दलदल हो, वह कभी पीछे, कभी आगे और कभी टेढÞे-मेढÞे मार्ग से आगे बढÞता ही चला जाता था । चाहे आगे सेना हो, चाहे वह घेर लिया गया हो, वह कभी पकडÞा नहीं जा सकता था ।’
तात्याटोपे की छापामार युद्ध शैली से प्रभावित होकर ‘संसार के छापामार नेता’ नामक ग्रन्थ के लेखक पर्सर्ीीाउन स्टर्ैर्डिग ने छापामार सैन्य नेताओं की तालिका में तात्याटोपे को सम्मानपर्ूण्ा स्थान प्रदान किया है ।
तात्याटोपे १८५७ की क्रान्ति के अंतिम ऐसे सेना नायक थे जिनकी मृत्यु के बाद क्रान्ति पर्ूण्ा रूप से बिखर गयी । परन्तु १८५७ की सैन्य क्रान्ति की अर्द्धसफलता भारतीयों के लिए आजाद भारत का सपना दे गयी । इस सैन्य क्रान्ति ने अर्न्तर्मन में दबी चिंगारी को हवा प्रदान कर दी ।
भारतीय जनमानस के सभी जागरूक मनीषियों, क्रान्तिकारियों ने इस सैन्य क्रान्ति को अपने-अपने प्रकार से देखा और अग्रिम तैयारी प्रारम्भ की । उदाहरणतः गांधी जी ने जब इस सैन्य क्रान्ति का अवलोकन किया तो पाया कि यूरोप में इससे बडÞी क्रान्ति हर्ुइ ही नहीं फिर भी मुल्क पर्ूण्ा स्वाधीनता को प्राप्त नहीं कर सका इस कारण उन्होंने भारत की स्वतंत्रता हेतु सविनय अवज्ञा आन्दोलन, असहयोग आन्दोलन, स्वदेशी आंदोलन सभी को अहिंसात्मक रूप से संचालित करने का संकल्प किया । क्योंकि उन्होंने अनुभवों से सीखा हिंसा सफलता की अन्तिम सुखद समाप्ति नहीं हो सकती । बडÞी हिंसा बडÞे प्रतिकार को जन्म देती है । इस कारण गांधी जी ने संयम और धर्ैय को साहस का अंग बनाकर अंग्रेजो के विरूद्ध पर्ूण्ा स्वाधीनता का बिगुल फूंका । इसी क्रम में सुभाषचन्द्र बोस जी ने जब १८५७ की सैन्य क्रान्ति का अध्ययन किया तो पाया कि सैन्य शक्ति ही भारत को पर्ूण्ा स्वाधीनता प्रदान कर सकती है । अतः उन्होंने विदेश में जाकर भारतीय प्रशिक्षित सेनानियों को भावनात्मक रूप से जोडÞा और भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने हेतु सफल प्रयास किया । ‘रास बिहारी बोस’ की प्रेरणा ने ही सुभाषचन्द्र बोस की योजना को मर्ूत्तरूप प्रदान किया । १८५७ की सैन्य क्रान्ति में नेता का व्रि्रोही सैनिकों से तालमेल न होने के कारण, क्रान्ति की अर्द्ध सफलता को ध्यान में रखकर सारी कमान नेता जी ने अपने पास रखा एवं सेना को संचार सुविधाओं से परिपर्ूण्ा किया । इसी क्रम में क्रान्तिकारियों में ‘चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह ने १८५७ की सैन्य क्रान्ति में तात्याटोपे की कार्यपद्धति एवं चरित्र चित्रण का अध्ययन किया जिसमें उन्होंने पाया कि ‘तात्याटोपे ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति के द्वारा सभी मोर्चाे पर अंग्रेजो को असफल किया । तात्याटोपे जहां भी गये उन्होंने वहां के शासकों के विरूद्ध वहां की सेना को अपने पक्ष में देश हित के लिए खडÞा कर दिया इसी मूल भावना को दृष्टिगत कर भारतीय जनमानस के सहयोग से क्रान्तिकारियों द्वारा हिंसक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया ।
इसी क्रम में १८५७ की सैन्य क्रान्ति का अध्ययन कर आम भारतीय जनमानस भी पर्ूण्ा स्वाधीनता के प्रति दृढÞ प्रतीज्ञ हो गया । इसके बाद भारत की स्वतंत्रता हेतु जितने भी आंदोलन हुए उसमें क्षेत्रवाद, जातिवाद, सामंतवाद नहीं दिखायी दिया, यही कारण रहा कि अंग्रेजों को १८५७ की क्रान्ति के बाद भारत में निरन्तर चुनौती मिलने लगी जिससे ब्रिटिश शासन ने यह समझ लिया कि अब भारत को स्वाधीन करना पडÞेगा और सन् १९४र्७र् इ. में सचमुच हुआ भी, अंग्रेजो को देश स्वतंत्र करना पडÞा ।
अतः यह पर्ूण्ा रूप से कहा जा सकता है कि १८५७ की सैन्य क्रान्ति स्वयं में अर्द्धसफल होने के बावजूद भारत के स्वतंत्रता हेतु प्रेरणा बनी ।
-लेखकः रक्षा स्ट्राटेजिक अध्ययन विभाग वी.एस.एस.डी. महाविद्यालय कानपुर के असिस्टेन्ट प्रोफेसर हैं)

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