२०वें वर्ष में प्रवेश करती हिमालिनी : आज की आवाज, सबकी आवाज

आसान नहीं था हिमालिनी का बीस वर्षों का सफर, समय था राजतंत्र का, जहाँ आपके शब्दों पर पहरे थे, आपकी भावनाएँ और अभिव्यक्ति को व्यक्त करना सहज नहीं था, ऐसे दौर का साक्षी बना हिमालिनी ।


20170109_225733

काठमांडू १० जनवरी | हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका नेपाल की स्थापित और स्तरीय पत्रिका है जिसने पाठक वर्ग में अपनी एक अलग पहचान बनाई है और प्रबुद्ध पाठकों से सराहना भी पाई है । विगत २० वर्षों से हिमालिनी अनवरत रुप से प्रकाशित हो रही है । हिमालिनी के इस सफर में कई उतार चढाव आए किन्तु इसकी गति को कोई रोक नहीं पाया । यह कल भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति के साथ हमारे समक्ष था और आज भी है । इसकी सफलता में हिमालिनी से सम्बद्ध लोगों की मेहनत है तो आपका भरपूर प्यार भी । हिमालिनी की शुरुआत साहित्यिक पत्रिका के रुप में हुई थी किन्तु वक्त और हालात के साथ इसके तेवर बदले और आज यह विविधता के साथ एक सम्पूर्ण मासिक पत्रिका के रुप में हमारे समक्ष है । राजनीति, साहित्य, समाज, संस्कृति, अध्यात्म, स्वास्थ्य इनसे जुड़ी समग्र जानकारी हिमालिनी अपने प्रबुद्ध पाठकों के सामने लाती है । हिमालिनी आनलाइन भी सजग पाठकों के लिए हाजिर है जो रोज की खबर पाठकों के समक्ष लाती है और जिसे निरन्तर आपका सहयोग मिल रहा है ।

आज एक नजर हिमालिनी की बीस वर्षों की यात्रा पर डालें । पहाड़ी धरातल की तरह उबड़ खाबड़ राह रही हिमालिनी की फिर भी पहाड़ी नदी की तरह अपने रास्ते की बाधाओं को राह से हटाती यह अबाध गति से आगे बढ़ती रही । सच तो यह है कि हिमालिनी श्रद्धा है, आदर है और है हिन्दी के वरिष्ठ और समर्पित नाम डॉ कृष्णचन्द्र मिश्र के लिए हमारी श्रद्धाजंलि । वहीं हिन्दी के नाम से जीने वाले डा. मिश्र का आशीर्वाद है हिमालिनी जो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से हमें संवल प्रदान करती है । डा। कृष्णचन्द्र मिश्र नेपाल के हिन्दी साहित्यकारों में एक श्रद्धेय नाम है । जिन्हें हम नमन करते हैं । आपने अनवरत रुप से हिन्दी की सेवा की और नेपाल में हिन्दी को एक सम्माननीय स्थान दिलाने के लिए आजन्म प्रयासरत रहे । हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका उनके लिए एक श्रद्धान्जलि है और इस महत भावपूर्ण कार्य का निर्वाह २० वर्षों से होते आ रहे हैं ।

आसान नहीं था हिमालिनी का बीस वर्षों का सफर, समय था राजतंत्र का, जहाँ आपके शब्दों पर पहरे थे, आपकी भावनाएँ और अभिव्यक्ति को व्यक्त करना सहज नहीं था, ऐसे दौर का साक्षी बना हिमालिनी । हिन्दी भाषा में प्रकाशन अपने आप में एक दुरुह कार्य था, किन्तु यह सम्पन्न हुआ सक्षम हाथों, जीवट विश्वास और प्रतिकूल को भी अनुकूल कर देने की अदम्य साहस की वजह से । हिमालिनी का प्रकाशन डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र अकादमी और नेपाल हिन्दी साहित्य कला संगम के सहयोग से प्रारम्भ हुआ । विगत में भी कई हिन्दी पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं पर सफल नहीं हो पाई । वजह चाहे जो भी हो पर इनकी असफलता के पीछे हिन्दी भाषा को लेकर नेपाल का प्रतिकूल परिदृश्य अवश्य था । ऐसे चुनौतीपूर्ण वातावरण में हिमालिनी एक बीज के रूप में प्रस्फुटित होकर आज एक वटवृक्ष के रूप में अपना अस्तित्व कायम किए हुए है, जिसकी छाँव तले राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, क्षेत्रीय विचारों, घटनाओं और विश्लेषणों को पनाह मिलती है ।

हिमालिनी का प्रथम अंक १९९८ जनवरी में प्रकाशित हुआ । सफर की शुरुआत त्रैमासिक साहित्यिक–सांस्कृतिक पत्रिका के रूप में हुई । प्रसिद्ध होने के लिए आलोचित होना एक आवश्यक माँग है, यह भी संयोग ही रहा कि हिमालिनी अपने प्रथम अंक में ही विवादित हो गई अपने आवरण पृष्ठ को लेकर । जहाँ सम्भवतः कार्य दक्षता न होने की वजह से आवरण पृष्ठ पर छपी राजा वीरेन्द्र की तस्वीर के उपर धुस्वाँ सायमी की पुस्तक “एक चिथड़ा आदमी” शीर्षक को रख दिया गया था । बस इतना काफी था विवाद को जन्म देने के लिए । काफी कोशिश की गई इसी विषय को लेकर हिमालिनी को बन्द कराने की किन्तु हिमालिनी हिमालय की ही भाँति अपने अस्तित्व को बचाए रखने में सक्षम रही । साहित्यिक धरातल पर जन्मी हिमालिनी वक्त की नजाकत, माँग और नव्ज को समझती हुई विविधताओं को अपनाती चली गई । समय की माँग थी कि नेपाल की राजनीति को जन–जन तक पहूँचाया जाय और जनता अपने अधिकार और अस्तित्व से रुबरु हो सके । इस महत् कार्य के लिए हिमालिनी ने अपना स्वरूप बदला और २००६ से राजनीति इसका विशेष आधार बन गया । आज विविधताओं से सजी हिमालिनी अपने सुधी पाठकों का भरपूर प्यार और स्नेह पा रही है । परन्तु यह सफर सहज नहीं था । २००७ के जनवरी फरवरी अंक में प्रकाशित प्रवीण कुमार मिश्र द्वारा लिखित आलेख बारूद के ढेर पर मधेश ने एक बार फिर हिमालिनी को त्रसित किया । उक्त आलेख में जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा के संयोजक जयकृष्ण गोइत से हुई बातचीत जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं नेपाली नहीं हूँ….को रखा गया था । इस आलेख ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दिया था । जिसकी वजह से हिमालिनी पर आक्रमण किया गया और क्षति पहुँचाई गई । ऐसी ही कई घटनाएँ हैं जिसे हिमालिनी टीम झेलती आई है । मैंने पहले ही कहा कि प्रसिद्धि के लिए आलोचित होना आवश्यक है, आलोचनाएँ और बाधाएँ ही आपकी सफलता का राह खोलती है । जब आलोचित हों और आपके दुश्मनों की संख्या बढ़ जाय तो आप समझिए कि आप अपने लक्ष्य में कामयाब हो रहे हैं । हिमालिनी पर जितने प्रहार हुए उसे अपनों ने भी दिया और गैरों ने भी बावजूद इसके हिमालिनी अपने कर्मपथ पर तटस्थ है और अनवरत रूप से आगे बढ़ती रहेगी क्योंकि शुभेच्छुओं की भी कमी नहीं है, ऐसे में मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है, वही होता है जो मंजुरे खुदा होता है ।

विगत वर्षों में नेपाल में हुए परिवर्तन का साक्षी बनी हिमालिनी । राजतंत्र का अन्त, राजदरबार हत्याकांड, माओवादी जनविद्रोह, कोशी का कहर, महाभूकम्प की त्रासदी और पिछले वर्ष हुए मधेश आन्दोलन का जीवन्त दस्तावेज बना हिमालिनी, जिसके पन्नों पर इतिहास दर्ज होता चला गया । मधेश आन्दोलन को मुख्य रूप से कवरेज करने की वजह से समुदाय विशेष की कोप का भाजन हिमालिनी को बनना पड़ा । जहाँ गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, प्रेस काउसिल से हिमालिनी को बन्द करवाने की कोशिश की गई, वहीं सराहना भी मिली क्योंकि हिमालिनी ने पाठकों तक सच को लाने की हिम्मत दिखाई थी और यही हिमालिनी के लिए उसका पुरस्कार था । वैसे इसका खामियाजा हिमालिनी को भुगतना पड़ा परन्तु हिमालिनी तुष्ट है क्योंकि इसने पत्रकारिता के उसूल का निर्वाह किया है ।

हिमालिनी के बीस वर्षों के कामयाब सफर में कई सहयोगी हाथों का संबल है जिसने इसे सजाया, सँवारा और कलेवर दिया । प्रथम प्रधान संपादक नेपाल में हिन्दी की सुपरिचित लेखिका डा. उषा ठाकुर, प्रथम संपादक डा. संजीता वर्मा, अतिथि संपादक डा.नवीन मिश्रा, संपादक रमेश झा, कार्यकारी संपादक मुकुन्द आचार्य आदि दक्ष और विद्वत जन की आभारी है जिनके कुशल हाथों ने हिमालिनी को जीवंतता प्रदान की । हिमालिनी अपने समस्त लेखकों को नमन करती है जिनकी तीक्ष्ण लेखनी पाठकों को आकर्षित करती है और जिसकी वजह से पाठकों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है । हिमालिनी आभार मानती है अपने तकनीकी सहायकों का, बाजार–व्यवस्थापन समूह का, विज्ञापन दाताओं का जिनकी वजह से हिमालिनी कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी । हिमालिनी आज की आवाज आप सबकी आवाज ।

इसे भी पढिये..

हिन्दी प्रेम,मिलन और सौहार्द की भाषा है : श्वेता दीप्ति

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz