२०११ में कैसा रहा नेपाल –

१. शक्तिशाली सर्वोच्चः सर्वोच्च ने नेपाली जनता की मनोगत भावनानुकुल इस वर्षके नभेम्बर में सर्वोच्च अदालत ने संविधान सभा की अवधि अब एक बार मात्र ६ महिना बढाया जा सकता है, ऐसा निर्ण्र्ाादिया। जिससे कार्यपालिका, न्यायापालिका और व्यवस्थापिका बीच तकरार शुरु हो गई है। इस निर्ण्र्ााको सरकार और सदन दोनों की तरफ से पुनरावलोकन दर्ता किए बिना लौटा दिया। जिससे नेपाल में वाकयुद्ध रुपी शीतयुद्ध जारी है।
२. बाबुराम की चर्चाः संस्थापन पक्ष द्वारा उपेक्षित माओवादी उपाध्यक्ष बाबुराम भट्टर्राई ने दूसरे उपाध्यक्ष मोहन वैद्य के साथ गठबन्धन कर प्रचण्ड के विरुद्ध अभियान शुरु किया धोवीघाट सम्मेलन में उनकी भूमिका नेतृत्वदायी रही। परिणामस्वरुप प्रचण्ड ने पार्टर्ीीी ओर से प्रधानमन्त्री उम्मेदवार के रुप में डा. भट्टर्राई का नाम अग्रसारित कर माहोल को ही बदल दिया और डा. भट्टर्राई प्रधानमन्त्री के रुप में निर्वाचित हुए। डा. भट्टर्राई प्रधानमन्त्री बनते ही मितव्यायिता को आगे बढाते हुए नेपाल में निर्मित सस्ती मुस्ताङ गाडÞी को स्वीकार किया, जनपक्षीय राहत कार्य का घोषणा किया, सरकारी खर्च में कटौती करने का अभियान शुरु किया, मितव्यायता के नाम पर उन्होंने चायपान में होने वाले लाखों रुपैये का खर्च कम किया। भारत के साथ डा. भट्टर्राई ने लम्बित बिपा सम्झौता किया। रक्षामन्त्री शरद सिंह भण्डारी, भूमिसुधार मंन्त्री प्रभु साह को क्याबिनेट से निष्काशन के कारण डा. भट्टर्राई आलोचित भी हुए। अक्टुबर में ४९ सदस्यीय जम्बो मन्त्री मण्डल बनाने के कारण से डा. भट्टर्राई चर्चित रहे।
३. सत्ता लिप्साः हमेशा की तरह २०११ में भी राजनीतिक पार्टियों के नेता लोग सत्ता के लिए उचित-अनुचित खेल खेलने में पीछे नहीं रहे। सहमतीय सरकार के नाम पर सभी दल लम्बे समय तक बहस करते रहे। फरवरी में बहुमतीय सरकार के लिए प्रचण्ड, झलनाथ खनाल, रामचन्द्र पौडेल और विजयकुमार गच्छेदारों की उम्मीदवारी आई। अन्त में एमाओवादी एमाले को सहयोग देकर खनाल को प्रधानमन्त्री बनाकर अपने स्र्व्ार्थ साधने में सफल रहा। खनाल सरकार अगस्त में फिर गिरी। तदुपरान्त मधेशी मोर्चा और छोटे-छोटे दलों की सहायता से डा. भट्टर्राई प्रम निर्वाचित हुए।
४. वर्षभर चर्चित माओवादी विवाद ः वर्षकी शुरुवात से ही माओवादी बिवाद उत्कर्षमें रहा। तर्सथ फरबरी में माओवादी मजदुर संगठन औपचारिक रुप में दो टुकडÞो में विभक्त हो गया। वैद्य के र्समर्थन में पारित माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड का प्रतिवेदन केन्द्रिय समिति में पेश हुआ। अप्रिल में प्रचण्ड के प्रस्ताव प्रति असहमति व्यक्त करते हुए वैद्य के द्वारा दूसरा प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ। वैद्य ने जनव्रि्रोह में जाने की धमकी देते हुए नोट आँफ डिसेन्ट लिखा।
५. एमाले में गुटबन्दी एवं एकता ः वर्षकी शुरुवात में एमाले के भीतर उत्पन्न विवाद वर्षके अन्त में आते-आते एक नया मोडÞ पर आ गया। नभेम्बर के अन्त्य में एमाले पार्टर्ीीे सुदृढीकरण अभियान चलाई। केपी ओली को तीसरे बरीयता के क्रम में रखकर ओली-खनाल बीच की तिक्तता खत्म होती दिखाई दी। इस घटना के प्रति माधव नेपालर्,र् इश्वर पाखेरेल एवं वामदेव गौतम सहित नेता लोग सन्तुष्ट नहीं दिखते। पहले गुट-उपगुट में विभाजित एमाले नेता लोग वर्षके अन्त में एकतावद्ध होते दीखते है।
६. कांग्रेस का अन्तरकलहः सरकार में जाने को व्यग्र दिखाई देते कांग्रेस में अन्तरकलह विद्यमान यथावत है। अप्रिल में रामचन्द्र पौडेल को उपसभापति और कृष्णप्रसाद सिटौला को महामन्त्री बनाने के सर्न्दर्भ में सहमति कार्यान्वयन का विरोध करते हुए देउवा पक्ष आजतक असन्तुष्ट हैं। जुलाई में देउवा पक्ष ने संसदीय दल के नेता को हटाने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया। सितम्बर में सभापति सुशील कोइराला द्वारा भातृ संस्था विघटन करने का प्रस्ताव लाया गया, जिसके बाद पार्टर्ीीें व्याप्त विवाद उग्र रुप लिया। र्समर्थन और विरोध में नेता-कार्यकर्ताओं द्वारा आमरण अनसन किया गया। इसके प्रति असन्तुष्टि व्यक्त करते हुए नेता पद से देउवा ने त्यागपत्र दिया, त्यागपत्र अस्वीकृत रहा।
७. निधनः सन् २०११ में नेपाल के चर्चित व्यक्तियों का निधन हुआ है। जनवरी में गायक कुमार कान्छा का निधन हुआ। मार्च में त्यागी, सन्त, कांग्रेस संस्थापक नेता कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई का निधन हुआ। कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई के त्याग पर्ूण्ा जीवन से आजकल के नेताओं में व्याप्त सत्ता लिप्सा को त्यागने की सीख लेनी चाहिए। इसी तरह वरिष्ठ उपन्यासकार डायमण्ड शमशेर का भी निधन हुआ। मई में सगरमाथा आरोहण के क्रम में पर्ूव परराष्ट्रमन्त्री शैलेन्द्र उपाध्य का भी निधन हुआ।

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