२०७२का बैशाख आँखों में सिर्फ आँसू दिए, गवाही खून से भरी सत्ता की उपलब्धि है : श्वेता दीप्ति

प्रधानमंत्री द्वारा मानवअधिकार आयोग की मोहना अंसारी और मानव अधिकार के प्रमुख अनुपराज शर्मा को अपने कार्यालय में बुलाकर निकाला है । देश की वैधानिक और स्वायत्त निकाय पर इस तरह प्रधानमंत्री का कटाक्ष की शैली में बोलना और एक महिला को धमकाना कहाँ तक उचित है ?

श्वेता दीप्ति,काठमांडू,१ गते बैशाख,२०७३ |

विनाश काले विपरीत बुद्धि यह उक्ति कई मायनों में इस देश के सत्ताधारियों की मानसिकता को परिभाषित करती हैं ।

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नया वर्ष दस्तक दे रहा है, कैलेन्डर के पन्ने बदल जाएँगे अंक बदल जाएँगे किन्तु क्या सचमुच देश की नियति, सत्ता की नीयत और जनता की किस्मत बदलेगी ? २०७२ का बैशाख महीना जिसने देश की आँखों में सिर्फ आँसू दिए और इसी आँसू के पन्ने पर संविधान लिखने की तैयारी शुरु हुई । इस तैयारी में देश हित की जगह अगर कुछ निहित था तो सत्ता और स्वार्थ की राजनीति । विध्वंश और लाशों की ढेर पर ताबरतोड़ घोषणाएँ हुईं, लगा भूकम्प के पराकम्पन ने नेताओं की नीयत को भी हिला दिया है । शायद जिन्दगी की क्षणिकता का अहसास इन्हें भी हो गया है । किन्तु ऐसा कुछ नहीं था । न तो इनकी नीयत बदली थी और न ही नैतिकता ने इनकी आत्मा को जगाया था । इस बात की गवाही पूरे वर्ष की खून से भरी सत्ता की उपलब्धि देती है । खैर, सती के शाप से ग्रसित देश में उम्मीदें यूँ ही खाक होती नजर आ रही हैं ।

पिछले दिनों मानवअधिकार की बातें, उसकी स्थिति और उपस्थिति काफी चर्चा में रही है । मानवअधिकार आयोग एक स्वतंत्र निकाय है, जिसकी जिम्मेदारी होती है मानव अधिकार के हनन के खिलाफ आवाज उठाना । पिछले दिनों मधेश आन्दोलन के दौरान पुलिस प्रशासन के द्वारा हुई बर्बरतापूर्ण कार्यवाही में ६० से अधिक मधेशियों ने अपनी जान की आहुति दी । मृत्यु प्राप्त करने वाले व्यक्ति इस देश के ही नागरिक थे, सामान्य जनता थी, उनके खिलाफ कोई आतंकवाद का मुद्दा नहीं दायर था और न ही देखते ही गोली मारने का आदेश जारी था, किन्तु उन्हें राज्य के द्वारा जो मौत दी गई वो बिल्कुल ऐसी ही थी मानो वो निर्दोष जनता खूंखार आतंकवादी हों । जब इस बात की तहकीकात मानवअधिकार आयोग ने किया तो उसने स्पष्ट रूप से यह वक्तव्य जारी किया कि आन्दोलन के दौरान होने वाली हिंसा में मानवअधिकार का हनन हुआ है । यही स्पष्टोक्ति देश के प्रधानमंत्री को रास नहीं आई और उन्होंने यह खुन्नस मानवअधिकार आयोग की मोहना अंसारी और मानव अधिकार के प्रमुख अनुपराज शर्मा को अपने कार्यालय में बुलाकर निकाला है । देश की वैधानिक और स्वायत्त निकाय पर इस तरह प्रधानमंत्री का कटाक्ष की शैली में बोलना और एक महिला को धमकाना कहाँ तक उचित है ? वैसे देखा जाय तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । आखिर घोर लोकतंत्र विरोधी और राजावादी कमल थापा से लेकर घोर गणतंत्र विरोधी चित्र बहादुर केसी तक के समर्थन से टिकी सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है । इन सबसे लोकतंत्र के मुल्य, मान्यताओं के सम्मान की अपेक्षा करना निहायत बेवकूफी ही होगी । सच्चाई को सामने लाने का खामियाजा सम्भवतः मोहना अंसारी को भुगतना पड़ सकता है । परन्तु जीत हमेशा सत्य की हुई है यह भी एक सत्य ही है । सिंहदरबार में मोहना अंसारी के खिलाफ सम्मन भेजकर बहुत बड़ी राजनैतिक गलती सत्ता पक्ष ने की है । मोहना अंसारी नेपाल की पहली महिला वकील हैं जो पूर्व में महिला अधिकार की अध्यक्ष रह चुकी हैं और वत्र्तमान में नेपाल के मानवअधिकार से संलग्न हैं । मोहना अंसारी आज भी अपने दिए गए वक्तव्य पर अडिग हैं और आयोग के प्रमुख अनुपराज शर्मा ने भी उनके वक्तव्य को उचित ठहराया है । निःसन्देह यह प्रधानमंत्री के लिए एक झटका साबित हुआ होगा । वैसे, अगर मानवअधिकार आयोग के कार्यशैली के प्रति सरकार की ऐसी असंतुष्टि और विरोध है तो अच्छा होता कि इसे भी सरकारी निकाय में ही शामिल कर लिया जाता । तब जो रिपोर्ट पेश होता वह सरकार के पक्ष में होता । शुरु में ही मैंने कहा था कि विनाश काले विपरीत बुद्धि क्योंकि जब शासन तंत्र और सूचना तंत्र ही अद्र्धविक्षिप्त हो जाय तो देश की स्थिति का तो सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है । बीमार मानसिकता का आलम तो यह है कि सही रिपोर्ट पेश करने पर देश के प्रसिद्ध समाचारपत्र के सम्पादकीय में मोहना अंसारी पर महाभियोग लगाने की माँग की जा रही है । भाई सत्ता और शासन आपके आकाओं के ही हाथ में है लगा दीजिए महाभियोग, उसके बाद की स्थिति और विश्व की राजनीति में नेपाल की जो किरकिरी होगी वह भी देख ही लीजिएगा क्योंकि मधेश आन्दोलन ने पूरे विश्व में चर्चा पाई है और सबने वह देखा है जो यहाँ के धृतराष्ट्र ने नहीं देखा है क्योंकि उनके पास कोई संजय नहीं है और जो है, उसने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है ।

फिलहाल खबर आ रही है कि यू एन के कार्यक्रम में ओली जी टर्की यात्रा की तैयारी में हैं और जोरशोर से भारत के खिलाफ विश्वमंच पर मोर्चा खड़ा करने के लिए तत्पर हैं । अब देखना है कि ओली जी की बिगुल पर भारत विरोध का ऊँट किस करवट बैठता है क्योंकि यह कोशिश तो निरंतर पिछले कई महीनों से जारी है और अभी चीन की यात्रा ने इसमें अधिक उर्जा प्रदान किया हुआ है । जिस उर्जा प्राप्ति के बाद से राष्ट्रवाद की भावनाओं को और भी सींचा जा रहा है, बल दिया जा रहा है और उसी के ओट में भारत विरोधी अभियान चलाया जा रहा है । क्योंकि यही एक अभिमंत्र रहा है यहाँ की सत्ताधारियों को अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए । परन्तु कब तक ? मधेशी मोर्चा से वार्ता के लिए गठित समिति से कमल थापा का हटाया जाना और पुनः बहाल किया जाना एकबार फिर अपनी डूबती नैया को किनारे लगाने के लिए ही किया गया है । भारत यात्रा से पहले समिति बनाने और वार्ता करने की पहल एक दिखावा थी और एक बार फिर टर्की यात्रा के पहले ऐसी ही पहल की जा रही है एमाले के द्वारा । एमाले की बैठक में मधेश मुद्दा के समाधान के लिए उठ रही आवाज भी हाथी के दाँत ही साबित होने वाले हैं । जिससे मधेशी मोर्चा को सचेत और सतर्क होने की आवश्यकता है ।

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