३०० करोड डाँलर की लागत से भगवान बुद्ध के लुम्बिनी में चीन का जासूसी अड्डा

रामाशीष:एक ओर धर्मकर्म विरोधी चीन के हान जाति के शासकों की अमानवीय यातनाओं से जान बचाकर हजारों बुद्धमार्गी तिब्बती अपनी जन्मभूमि छोडÞकर भाग रहे हैं और दूसरी ओर चीन, भगवान् बुद्ध के नाम पर गठित अपनी ‘खुफिया संघ संस्थाओं’ के माध्यम और करोडÞो अरबो डाँलर की लागत से भगवान् बुद्ध के जन्मस्थल ‘लुम्बिनी में एक अति विशाल खौफनाक खुफिया-सेन्टर स्थापित करने जा रहा है। नेपाल के माओवादी प्रधानमंत्री ने इस काम में अपने पार्टर्ीीध्यक्ष काँमरेड पुष्पकमल दहाल को लगाया है जिनपर लगभग १७ हजार निर्दाेष नेपालियों की नृशंस हत्या के आरोप हैं। चीन को आखिर ऐसी कौन सी आपदा आ पडÞी है कि उसने भारतीय सीमा से लगे ‘नेपाल के तर्राई-मधेश क्षेत्र में घ अरब डाँलर की लागत से खुफिया-केन्द्र बनाने को बाध्य होना पडÞ रहा है। आर्श्चर्य तो यह है कि चीन की उक्त खुफिया संस्था और प्रधानमंत्री द्वारा माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल की नेतृत्वाली उक्त ‘लुम्बिनी विकास संस्था’ के बीच पिछले दिनों एक समझौता पर हस्ताक्षर भी सम्पन्न हो चुका है, जिसे अभी तक न तो प्रकाशित किया गया है और न ही किसी को इसकी जानकारी है ! आखिर क्यों –
हांगकांग डेटलाईन से प्रकाशित एक समाचार में बताया गया है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टर्ीीे एक वरिष्ठ अधिकारी तथा सिचुआन प्रान्त के नए पार्टर्ीी्रमुख वांग डोंग मिंग ने ‘तिब्बती पृथकतावाद विरुद्ध अभियान’ को और तेज करने की जानकारी दी है। वह एक कार्यक्रम में चीनी शासन के विरोध में तिब्बती मूल के लोगों द्वारा आत्मदाह करने की घटनाओं में हो रही वृद्धि पर चिन्ता व्यक्त कर रहे थे। ‘अभियानकर्ताओं’ के अनुसार पिछले वर्षके मार्च महीने से अभी तक तिब्बतियों द्वारा आत्मदाह करने की लगभग ८० घटनाएं हर्ुइ हैं, जिनमें अधिकांश सिचुआन प्रान्त में ही हर्ुइ। दूसरी ओर, चीन के लगभग आधे दर्जन मुस्लिम-बहुल प्रान्त के लोग भी अपने धार्मिक अधिकारों को पाने के लिए उठ खडÞे हुए हैं जो चीन की प्रमुख शासक जाति ‘हान’ के रहन-सहन और खान-पान की आदतों के विरोधी हैं। पिछले वर्षहान जाति और मुसलमानों के बीच दंगे हुए जिनमें कई लोग मारे गए थे।
इसके साथ ही चीन, बेटी-रोटी एवं खून के मजबूत रिश्ते से जुडÞे नेपाल-भारत संबंधों पर कुठाराघात करने के लिए नेपाल के माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल के नेतृत्व में लगभग ३ सौ करोडÞ डाँलर की लागत से भगवान् बुद्ध के जन्मस्थल पश्चिमी नेपाल के लुम्बिनी में ‘एक विशाल तथा अत्याधुनिक टोही-यंत्रों से लैस चाइनीज केन्द्र’ स्थापित करने जा रहा है। इस संबंध में हांगकांग की चीनी संस्था एशिया पैसिफिक एक्सचेन्ज एंड को-आपरेटिव ९च्म्ज्ञद्ध० और नेपाल सरकार की वृहत्तर लुम्बिनी विकास राष्ट्रीय निर्देशक समिति के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर भी हो चुका है। लुम्बिनी का विकास करने के नाम पर स्थापित इस ‘केन्द्र’ से जहां एक ओर भारतीय सीमा से लगे नेपाल की समतल भूमि ‘तर्राई-मधेश’ के मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारू, उर्दू एवं ‘हिन्दीभाषी-मधेशियों’ के बीच भारत के प्रति घृणा फैलाने का अभियान चलाया जाएगा वहीं दूसरी ओर सीमा पार गोरखपुर सहित भारत के अन्य ‘संवेदनशील रक्षा ठिकानों’ पर भी चाइनीज नजर रखी जा सकेगी और सूचनाएं इकÝी कर चीन को भेजी जा सकेगी।
भारत तथा नेपाल के बुद्धमार्गियों के लिए भारी चिन्ता की बात यह है कि इस केन्द्र का प्रमुख लगभग १७ हजार निर्दाेष नेपालियों की हत्या तथा लाखों लोगों को अपांग बनाने के जिम्मेदार माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल को बनया गया है, जो जाति से ब्राहृमण हैं तथा बौद्धर्-धर्मर्-दर्शन से दूर का भी कोई लेना-देना नहीं।
इसी बीच नेपाल के युवा बौद्ध भिक्षु तपस्सी धम्म सहित लगभग आधे दर्जन बुद्धमार्गियों ने माओवादी प्रधानमंत्री पंडित बाबूराम भट्टर्राई के इस दम्भपर्ूण्ा कारवाही को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायरकर चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है – ‘लुम्बिनी, धर्मप्राण बुद्धमार्गियों का महान तर्ीथस्थल है’ और इसीलिए इसके विकास के नाम पर गठित की जानेवाली देश विदेश की संघ संस्थाओं के साथ किए जानेवाले समझौतों एवं उसके पूंजी-निवेशकों के बारे में नेपाल के बुद्धमार्गियों एवं धर्मगुरूओं को पूरी जानकारी दी जाए। यह भी कहा गया है कि इतने बडÞे शंकास्पद डील और गोपनीय समझौतों की जानकारी तक नहीं देना, बौद्ध धर्मगुरुओं एवं नेपाली बुद्धमार्गियों के मौलिक अधिकार पर कुठाराघात है। इसलिए ‘माओवादी नेतृत्व की सरकार और माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल के बीच हस्ताक्षरित उक्त गोपनीय समझौते को अविलम्ब खारिज किया जाए और उसके मुद्दों को जनसमक्ष लाया जाए।
उल्लेखनीय है कि चीन, नेपाल के ‘चीनी-पैसा भोगी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी नेपालियों’ के सहयोग से भारतीय सीमा से लगे तर्राई क्षेत्र में लगभग दो दर्जन ‘चीन-अध्ययन-केन्द्र’ स्थापित कर चुका है जिसके माध्यम से खुफिया सूचनाओं का संकलन तथा मधेश को चीन का प्रभाव-क्षेत्र बनाने का अभियान चलाया जा रहा है।
मधेश में चीन की खुफिया गतिविधि
अब चीन की नजर हिन्दुओं के परमपवित्र स्थल जगद्जननी सीता के जन्मस्थान ‘जनकपुर धाम’ पर ही जा चुकी है जहां रोज भारी भरकम कैमरों एवं अन्य इलेक्ट्राँनिक यंत्रों से लैस दर्जनों चाइनीज आते हैं और जनकपुर धाम के अलावा धनुषाधाम और भारतीय सीमा से लगे महोत्तरी जिले के जलेश्वरनाथ महादेव जैसे धार्मिक स्थलों के पर्यटकीय-भ्रमण के नाम पर ‘तथ्य संकलित’ कर, लौट जाया करते हैं। यही नहीं, कुछ चहकती-चुलबुली चाइनीज युवतियां और जीन्स-पैंट में सजे छोकडे युवक भी, सुहागिन हिन्दू महिलाओं की मनपसन्द चाइनीज मोती-मूंगा बेचते हुए तर्राई क्षेत्र के गांवों के अलावा सीमा पार के बिहारी गांवों में भी सहज ही प्रवेश करने लगे हैं। लोग उन चीनी नागरिकों की ‘नेपाली भाषा एवं टूटी-फूटी हिन्दी’ के कारण नेपाली मान बैठते हैं और उनकी ‘गतिविधियों एवं खुफिया-नजरों’ पर ध्यान नहीं देते।
इसी बीच काठमांडू से प्रकाशित अखबार ‘कान्तिपुर’ के एक समाचार में बताया गया है कि ”पेंचीदे भू-राजनीतिक स्वार्थाें के कारण नेपाल में अपनी भूमिका बढÞाने पर केन्द्रित पडÞोसी राष्ट्र चीन, दिसम्बर महीने को खर्चीले कार्यक्रमों से भरने में लगा हुआ है। समाचार के अनुसार चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ द्वारा चालू वर्षके प्रारंभ में किए गए नेपाल भ्रमण के दौरान घोषित ‘नेपाल-चीन मैत्री आदान-प्रदान वर्ष २०१२ मनाने के सिलसिले में ही ‘दिसम्बर प्लान’ बनाया गया है। इस प्लान के अनुसार २१ दिसम्बर को लुम्बिनी में लोकप्रिय चीनी ‘संगीतकार उ सी’ का धार्मिक बाद्य-वादन -कर्न्र्सट) आयोजित किया जाएगा जिसमें चीन के लगभग १००० उच्च पदस्थ अधिकारी, प्राध्यापक, साहित्यकार और कलाकार शामिल होंगे। मैत्री सप्ताह और कर्न्र्सट, दोनों ही की तैयारी कर रही संस्था वर्ल्ड कल्चरल नेट-ब्छ के अध्यक्ष दीपक सरकार के अनुसार गौतम बुद्ध के जन्मस्थल ‘लुम्बिनी पर होनेवाले विशाल धार्मिक कर्न्र्सट’ हेतु केवल मंच के निर्माण पर डेढÞ करोडÞ रुपये की लागत आएगी। उन्होंने बताया है कि कर्न्र्सट में शामिल होनेवाले १००० चीनी प्रतिनिधियों को लाने के लिए चीन के तीन शहरों से उडÞनेवाले विमानों की सभी उडÞानें बुक करायी जा चुकी है। उक्त एक हजार दर्शक-श्रोताओं में से लगभग सात सौ २१ दिसम्बर को कर्न्र्सट कार्यक्रम समाप्त होने के बाद, लुम्बिनी के गुम्बाओं में ही ध्यान करेंगे जबकि अन्य व्यक्तियों के लिए होटलों में व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया दोनों ही कार्यक्रमों के तुरंत बाद नये वर्ष२०१३ के शुरूआती तीन महीने तक लगातार चीन के विभिन्न शहरों में नेपाल संबंधी पर््रदर्शनी आयोजित करने का प्रस्ताव चीन कर चुका है। उसके दौरान भारी संख्या में नेपाल के विभिन्न क्षेत्र के अधिकारी और पेशाकर्मियों द्वारा शहरों के भ्रमण कराने की भी तैयारी है।
तिब्बत को लेकर नेपाल में सक्रियता
इसी बीच चीन की एक प्रभावशाली अनुसंधान संस्था चाईना इन्स्टीच्यूट आँफ कन्टेम्पररी इन्टरनेशनल रिलेशन्स ब्प्ब्प्त् अर्न्तर्गत दक्षिण तथा दक्षिण-पर्ूव अध्ययन केन्द्र के निर्देशक हू शी सेंग और नेपाल मामले के पुराने विश्लेषक प्राध्यापक वांग हो बर्ेइ ने चीन के नये नेतृत्व की संभावित नेपाल नीति के बारे में बताया है कि नया नेतृत्व, नेपाल के प्रति प्राथमिकता को जारी रखेगा तथा चीन की ‘नेपाल-प्राथमिकता’ में कोई बदलाव नहीं होगा। नेपाल के विकास निर्माण में चीन का ध्यान, आनेवाले दिनों में और अधिक केन्द्रित होगा। नेपाल के साथ नये राष्ट्रपति का भी उतना ही मैत्रीपर्ूण्ा तथा सौहादर््रपर्ूण्ा संबंध रहेगा। उल्लेखनीय है कि राज्य सुरक्षा मंत्रालय मातहत संचालित सी आई सी आई आर, चीन का प्रभावशाली ‘थिंक टैंक’ है।
हू शी शेंग ने बीबीसी को दिए एक अन्य भेंटवार्ता में कहा है कि ”हम भारत को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करेंगे कि तिब्बत का बहुत ही बडÞा भू-भाग के नेपाल की सीमा से जुडÞे होने और तिब्बती क्षेत्र में हमलोगों को कुछ समस्याओं का सामना करने के कारण, नेपाल के साथ संबंध में विस्तार किया जा सकता है। और, नेपाल के विकास के लिए चीन के पूंजी निवेश की आवश्यकता भी है। पेश है, उस अन्तवार्ता के प्रमुख सम्पादित अंश ः-
० तिब्बत के मामले में नया नेतृत्व नेपाल के प्रति कैसी नीति अपनाएगा –
– तिब्बत के संबंध में, चीन ने नेपाल को भारी महत्व दिया है। इस विषय में नेपाल में राजनैतिक स्थिरता, चीन के लिए सकारात्मक बात होगी। चीन ऐसा चाहता है कि उसकी तिब्बत नीति में, नेपाल रचनात्मक भूमिका निभाए। खासकर गैर-कानूनी रूप में तिब्बत से भागनेवाले तिब्बतियों के विषय में। क्योंकि, वास्तविकता तो यह है कि नेपाल में पश्चिमी देश दबाब दिया करता है।
० तिब्बतियों के अपनी भूमि को छोडÞकर बाहर जाने के विषय को बेजिंग आखिर क्यों इतनी बुरी नजर से देखा करता है –
– वे लोग बाहर जाने के लिए कानूनी रूप में आवेदन दे सकते हैं। जबकि, इस समय तो गैर कानूनी तरीके से मानव तस्करी का धन्धा बन चुका है। यह कानूनी मुद्दा है, लेकिन पश्चिमी जगत, इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए हैं। इस प्रकार गैर-कानूनी रूप में बाहर जानेवाले तिब्बती अपने को राजनीतिक-पीडिÞत होने का बहाना बनाया करते हैं। वे लोग खासकर, पश्चिमी देशों में पहुंचना चाहते हैं और इसके लिए दक्षिण एशिया को प्रवेश द्वार के रूप में प्रयोग करने की कोशिश करते हैं।
० लेकिन, तिब्बत में चीन ने राजनैतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं दी है और तिब्बतियों का दमन करने के कारण वे लोग बाहर जाने की कोशिश करते हैं – ऐसी भी आलोचना है न –
– मुझे तो कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि बाहरी हस्तक्षेप के कारण ही यह विषय गंभीर बन गया है। उच्च चीनी नेतृत्व अभी भी तिब्बत के मुद्दे को चीन का आन्तरिक मामला मानते हैं। यदि बाहरी हस्तक्षेप अधिक होने लगा तो वह उच्च नेतृत्व को अशान्त बना सकता है और वह इस विषय को और अधिक जटिल बना सकता है।
० आप तो ऐसा कहते हैं लेकिन तिब्बतियों के धर्मगुरू दलाई लामा ने बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होने के बाद, उन्हें हाल ही में बधाई देने के दौरान ओबामा प्रशासन, तिब्बतियों की समस्या का समाधान के लिए और अधिक कदम उठाएगा, ऐसी आशा व्यक्त की थी – यदि चीन ने तिब्बती मुद्दे को अच्छी तरह सम्हाला होता तो वह ऐसा नहीं कहते न –
– इसमें पहली बात तो यह है कि दलाई लामा राजनीति से अवकाश ले चुके हैं। इसलिए इस प्रकार का पत्र लिखना बुद्धिमानी नहीं है। दूसरी बात यह कि तिब्बत मामले में अमेरिका द्वारा नेपाल में खेली जा रही भूमिका भी नकारात्मक होगी तथा वह भविष्य में नेपाल और चीन के बीच के संबंध पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अमेरिका इस संबंध में जितनी अधिक भूमिका खेलेगा, वह उतना ही अधिक नकारात्मक होगा और वह तिब्बती मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना देगा।
दलाई लामा द्वारा ओबामा को ऐसा पत्र लिखे जाने पर भी अमेरिका, तिब्बत के बारे में नेपाल में कोई भूमिका खेलेगा, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं –
– अमेरिका गुप्तचर संबंधी सूचना संकलन करने के लिए नेपाल की भूमि का प्रयोग कर रहा है, यह जानकारी हमलोगों को प्राप्त हर्ुइ है। तिब्बती क्षेत्र के बारे में जासूसी करने के लिए अमेरिका तो नेपाल को र्स्वर्ग ही बताया करता है।
० लेकिन, अमेरिका ने ऐसा कहा है, यह तो कहीं किसी मीडिया में नहीं  आया है न –
– काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास में आप देखिए, वहां उनकी आवश्यकता से बहुत ही अधिक कर्मचारी हैं। खुद मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार अमेरिकी दूतावास, नेपाल और तिब्बत की सीमा क्षेत्र में स्थित कुछ तिब्बती गुम्बों में भारी आर्थिक सहायता दिया करता है। उससे मैं व्यक्तिगत रूप में तो यही समझता हूं कि ‘वे लोग इस प्रकार का गुम्बा सूचना संकलन करने के काम के लिए प्रयोग करते हैं’।
० यह तो आपको ऐसा लगने की बात हर्ुइ लेकिन आप उसका कोई प्रमाण तो नहीं दे सकते हैं न –
– सन् १९५० की दशक से १९७० की दशक तक संयुक्त राज्य अमेरिका ने तिब्बती उग्रवादियों को आर्थिक सहायता प्रदान किया था। उसे भारत के गुप्तचर संगठनों का सहयोग भी प्राप्त था। उनलोगों ने नेपाल के मुस्तांग क्षेत्र को, उनके मिलिशिया आधारों में से एक बनाया था। उनलोगों ने उस वक्त तिब्बती क्षेत्र के कतिपय स्थानों पर यातायात के साधनों पर आक्रमण किया था। लेकिन, इस प्रकार के सैन्य और आर्थिक सहयोग, १९७० के दशक में रोक दिया गया क्योंकि उस वक्त रुस को नियंत्रण में रखने के लिए अमेरिका को चीन के सहयोग की आवश्यकता थी।
० यदि बात ऐसी है तो नेपाल में चीन भी सक्रिय होगा न, खासकर अमेरिका को जबाब देने के लिए –
– ऐसा कैसे किया जाएगा, अमेरिका इतना अधिक दूर है, ऐसा करना व्यवहारिक नहीं है, हमें तो ऐसा लगता है कि नेपाल में चीन की सक्रियता काफी कम है। क्योंकि, चीन इस बात में संवेदनशील है कि यदि उसने नेपाल में अपनी उपस्थिति बढर्Þाई तो वह भारत की चिन्ता बढÞाएगा, अमेरिका की नहीं। चीन तो नेपाल में भारत से मिलकर काम करना चाहता है, प्रतिस्पर्द्धर्ााहीं।
चीन की नई कूटनीतिक चाल
नेपाल के वर्तमान राजनीतिक अफरा-तफरी के माहौल में ही नेपाल में चीन के राजदूत यांग होउलान ने एक नया सगूफा छोडÞ दिया है। यांग ने काठमांडू में एक पत्रकार भेंट कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दाबा किया कि नेपाल के बारे में चीन और भारत की धारणाएं एक समान है तथा वह इस संबंध में भारतीय राजदूत जयन्त प्रसाद से आए दिन बातचीत करते रहते हैं। जबकि, वास्तविकता यह है कि नेपाल के बारे में भारत और चीन की नीति, धारणा या दृष्टिकोण किसी हालत में समान नहीं हो सकता। इस तथ्य से नेपाल की सरकार तथा नेपाली जनता भलीभांति अवगत है कि भारत में लगभग ८० से ८५ लाख नेपाली नागरिक रोजगार पाए हुए हैं और एक सामान्य भारतीय की तरह ही जीवन यापन कर रहे हैं। इसके अलावा भारतीय सेना में नेपाल के हजारों जवान कार्यरत हैं तथा अवकाश प्राप्त गोरखा सैनिकों के पेंशन के रूप में करोडÞांे रुपये नेपाल में प्रवेश कर रहा है। नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा है तथा दोनों देशों के नागरिकों को बिना पासपोर्ट वीसा के एक दूसरे देश में आनेजाने की सुविधा है और भारतियों की तरह ही नेपाली नागरिक भी भारत में हर नागरिक सुविधा पा रहे हैं। बल्कि, चीन की सेना तो दूर, राजधानी बर्ेइजिंग सहित चीन की मुख्य भूमि पर दो-चार हजार नेपाली नागरिक को भी कोई नेपाली बिनापासपोर्ट वीसा के प्रवेश नहीं देता है, रोजगार नहीं पा सकता और न ही शादी ब्याह का रिश्ता ही कायम कर सकता है।
लाख टके का सवाल यह है कि ”क्या बर्ेइजिंग के मूल निवासी हान जाति लोगों की मानसिकता और काठमांडू के निवासियों की मानसिकता किसी भी हालत में एक हो ही नहीं सकती है। क्या, चीन और नेपाल के लोग एक दूसरे की मानसिकता को सहज ही समझ सकते हैं – उत्तर मिलेगा – कदापि नहीं। तो फिर भारत की नेपाल के प्रति धारणा और चीन की धारणा एक समान कैसे हो सकता है – स्पष्ट है कि चीन के नेपाल में तैनात राजदूत यांग होउलान का बयान अत्यन्त ही भ्रामक और नेपाली जनता की आंखों में धूल झोंकने के अलावा और कुछ भी नहीं – नेपाल और भारत का संबंध सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषिक, लिपि तथा बेटी-रोटी के खून के रिश्ते से जुडÞा हुआ है। इसलिए किसी भी हालत में भारत-चीन की नेपाल के प्रति धारणा एक नहीं हो सकती।
-७६ वषर्ीय रामाशिषजी पिछले चार दशक से काठमांडू में कार्यरत भारतीय पत्रकार हैं।)

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