‘प्रचण्ड’ से नाराज कयों ?

संविधानसभा की अन्तिम तारिख को बढाये जाने की सरकार व्दारा हुई सिफारिस को लेकर अगर कोइ व्यक्ति वदनाम हुआ है तो सबसे पहले नाम आता है माओवादि अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल प्रचण्ड का । इनपर आरोप है कि ए सभी समझोता कर के बाद मे बदल जाते हैं । माधवकुमार नेपाल ने तो यहाँ तक कह दिया है कि षडयन्त्र और जाल-झेल का दुसरा नाम है प्रचण्ड और उन्होंने प्रधानमन्त्री की रजिनामा की भी माँग करदी। इसी तरह का आरोप कांग्रेस का नेता भी लगा रहे हैं ।इनपर हाथिवन समझौता का उल्लघन के साथ साथ पाँचवुदें सहमति के विपरित जाने का भी आरोप है । यहाँ गौरतलव बात यह है कि आरोप लगाने वाले नेता स्वँय भी इन सभी आरोपों के भागिदार हैं।
यहाँ सोचने की वात यह है कि क्या प्रधनमन्त्री के राजिनामा से समस्या का समाधान निकल जायगा अगर ऐसा होता तो अभी तक ३-४ प्रधानमन्त्री राजिनामा कर चुके हैं समस्या यथावत है । ये सभी नेता अपनी कमजोरी को छिपाने के लिया दसरे के कमजोरी को आगे ला रहे हैं । संविधान के लिये सबसे पहले जरुरी है सहमति की जिसका अभाव सभी नेताऔं मे देखा जा सकता है ।आजतक जितने भी समझौता हुआ है उसमे मधेसी मुद्दा को गौण रखा गया है ।मधेस के नाम पर कांग्रेस और एमाले की लगभग एक जैसी निति रही है। और तो और नेपाली संचार जगत भी मधेस मुद्दा के साथ अब तक सौतेला रुख अपनाता आया है।जबतक इन मुद्दा को सुलझाया नही जाता और जबतक भेद-भाव पुर्ण मानसिकता से उपर उठकर सभी समुदायों को समेटने वाली संविधान पर सहमति नही जुटा ली जाती है तबतक संविधान निर्माण का काम ओझल मे ही परा रहेगा चहे कितनी भी प्रधानमन्त्री क्यों न बदली जाय ।

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