मधेश का मखौल ना उड़ाएँ

madhesiमधेश का मखौल ना उड़ाएँ
श्वेता दीप्ति । काठमान्डौ । मोदी के साथ मधेश की भी चर्चा जोरों पर रही । सुषमा से मोदी तक मीडिया की निगाह इस बात पर टिकी थी कि मधेश को क्या हासिल होता है ? सही है क्योंकि मधेश को तो वहीं से नहीं मिल रहा जहाँ उसका हक है तो औरों की तो बात ही जुदा है । मोदी ने कहा कि पहाड़ी से मिल कर चलें तो मधेश या मधेशी पर हँसा जा रहा है, खुदा ना खास्ते यह कह देते कि अपनी अलग राह बनाए तो निःसन्देह भूचाल ही आ गया होता । उन्होंने जो कहा वह एक कूटनीतिज्ञ की भाषा थी पर अभी जो मीडिया या समाचारपत्र कह रहा है वह तो निश्चय ही नया नहीं है हमेशा से यही होता आया है । मीडिया के लिए मधेश का समाचार हमेशा दूसरे दर्जे का रहा है । पहाड़ी से मिल कर रहें इसे द अन्नपूर्णपोष्ट ने मुख्य समाचार बनाया, कुछ इस तरह कि मधेश का मखौल बने । अगर कोई कह रहा है कि पहाड़ी से मिल कर चलें तो आप के पास भी यह संदेश जा रहा है कि पहाड़ी को भी मधेश की महत्ता समझनी होगी । क्योंकि मिल कर चलना एकतरफा नहीं होता है कदम दोनों ओर से बढाए जाते हैं । मिल कर चलने का अर्थ यह कदापि ना लें कि वर्षों से जो शोषण की नीति चली आ रही है वह अब भी स्वीकार्य होगी । एक सच्चा राजनेता किसी दूसरी भूमि पर जाकर कभी तोड़ने की बात नहीं कहेगा वो मिलकर चलने की ही सलाह देगा । मोदी के इस बात को अगर इतनी तरजीह दी जा रही है तो यह भी नहीं भूलें कि उन्होंने यह भी कहा कि संविधान में एक कोमा या विश्राम ऐसा न हो कि विषवृक्ष बन जाय । साथ ही यह भी कहा कि देश के सभी पुष्पों को गुलदस्ते में सजाए ताकि उन्हें भी अपने अस्तित्व का अहसास हो । कई समाचारपत्र में यह विचार भी उभर कर आए कि मधेश नेपाली बोलने से शर्माते हैं और हिन्दी का प्रयोग करते हैं जवकि मोदी ने नेपाली में सम्बोधन किया । यह मत भूलिए कि नेपाली को भारत में मान्यता प्राप्त है यह अलग बात है कि मोदी का सम्बोधन दिल जीतने के लिए था पर यह भारत के लिए कोई गैर भाषा नहीं है उनकी अपनी ही भाषा है । उसी तरह मधेश भी यह चाहता है कि हिन्दी को वह स्थान यहाँ के संविधान में प्राप्त हो जो भारत में नेपाली को प्राप्त है । नेपाली हमारी राष्ट्रभाषा है और इसे बोलने में किसी मधेशी को लज्जा नहीं हो सकती अपने देश का स्वाभिमान और अपनी राष्ट्रभाषा हमारा गौरव है । किन्तु इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं कि अन्य भाषाओं से बैर किया जाय । मधेश को नकारने की मानसिकता से बाहर निकलिए सिर्फ राष्ट्रगीत में ‘तराई पहाड़ हिमाल’ को एक कह देना काफी नहीं है इसकी महत्ता को स्वीकार करना होगा, सार्वभौम सत्ता यूँ ही नहीं बन जाता । मधेश और मधेशी नेताओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी । व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागें और मधेश कल्याण की बात सोचें ।

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