8 साल बाद महानवमी और दशहरा एक साथ

ravan_1आठ साल बाद हुआ संयोग 
 रविवार को दशहरा और महानवमी एक साथ पड़े। आठ साल बाद ऐसा हुआ। इतना ही नहीं, 1995 के बाद पहली बार दीपावली से पहले कुछ अनूठे संयोग भी बन रहे हैं। ये संयोग न केवल खरीदारी के लिए बल्कि शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए भी अच्‍छे हैं। तिथियों और नक्षत्रों के संयोग के कारण रविवार को महानवमी और दशहरा पर्व एकसाथ मनाया जा रहा है। ज्योतिषाचार्य पंडित दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार, रविवार सुबह 6:22 से श्रवण नक्षत्र शुरू हो गया, जो कि सोमवार सुबह 5:02 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा रवि योग भी रहेगा। यह संयोग श्रेष्ठ होता है।
नवमी तिथि शनिवार दोपहर 3:27 बजे से शुरू हो गई। यह रविवार दोपहर तक रहेगी। इसके बाद दशमी तिथि शुरू होगी, जो सोमवार सुबह 11:07 तक रहेगी, इसी वजह से ऐसा संयोग बना है। आज दोपहर 1:19 बजे तक नवमी है। इस दौरान देवी पूजा की जाएगी। पूजा का श्रेष्‍ठ मुहूर्त चर : सुबह 7:55 से 9:21 बजे तक है। लाभ व अमृत : सुबह 9:21 से दोपहर 12:13 बजे तक है और इसके बाद बाद दशमी तिथि है। इस दिन शस्त्र पूजा व रावण दहन होगा। शस्त्र पूजन शुभ मुहूर्त : शाम 5:57 से रात 7 :23 बजे तक है, जबकि अमृत और चर : रात 7:23 से 10:38 बजे तक है

सालभर रखते हैं रावण का एक सिर

शशिकांत पांडेय. जशपुरनगर (रायपुर). जशपुर का दशहरा महोत्सव रियासत काल से चली आ रही परंपराओं और मान्यताओं का अनूठा संगम है, जहां सभी वर्ग के लोग भाग लेते हैं। इस परंपरा में एक

अनूठी परंपरा है रावण का एक सिर सालभर संभालकर रखना और उसकी पूजा करना। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कोई आपत्ति न आए। ऐसी मान्यता है कि दशहरे के दिन रावण वध के पश्चात उसका एक सिर बचाकर मंदिर में रखने से क्षेत्र में किसी तरह का नुकसान नहीं होगा। ये परंपरा रियासत काल से चली आ रही है।
रियासत काल से दशहरा की व्यवस्था के व्यवस्थापक भी आदिवासी समाज के लोग होते हैं। 9 दिनों तक इसकी खास तैयारी होती है और अंतिम दिन रणजीता के मैदान में इस खास उत्सव में शामिल होने के लिए हजारों की संख्या में इकट्ठे होते हैं।
जशपुर में रावण की लंका सजाई जाती है, जहां रावण, कुंभकर्ण, मेघनाथ और अहिरावण की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। उस लंका को आग लगाने के पहले हनुमान लंका में जाकर रावण को समझाइश देते हैं। जब रावण नहीं मानता है, तो बालाजी के रथ के पास आकर भगवान को सारी बातें बताते हैं और लंका को दहन करने की अनुमति मांगते हैं। अनुमति मिलने के बाद जाकर लंका दहन करते हैं। लंका दहन करने के पहले हनुमान रावण के एक सिर को काटकर बालाजी के पास लाकर उसे समर्पित कर देते हैं, जिसे वर्ष भर सुरक्षित रखा जाता है
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