राजपा पहले आपसी विभेद को अंत करे,फिर अधिकार के लिए लड़े : अनिल केडिया

जागरुक नागरिक होने के नाते देश की राजनीति पर नजरें जरुर रहती हैं

अनिल केडिया

उद्योगपति स्व. शंकर बाबु के सुपुत्र अनिल केडिया का नाम सुनते ही हम लोगों के दिमाग में एक सफल उद्योगपति का चेहरा सामने आता है । लेकिन उनका परिचय सिर्फ इतना ही नहीं है । वह शिक्षासेवी हैं और राजनीतिज्ञ भी । विशेषतः मधेश राजनीति से निकट हैं और केडिया डीएभी स्कुल के चेयरमैन भी हैं । देश के जाने माने व्यवसायी तथा राजनीतिज्ञ केडिया के साथ हिमालिनी ने सम–सामयिक राजनीति के विषय पर बातचीत की । प्रस्तुत है– बातचीत का सम्पादित अंश–

राजनीति मेरी बाध्यता है

आपने कहा कि मैं स्व. शंकर केडिया के सुपुत्र हूँ और डीएभी का चेयरमैन भी । हां यह सब तो ठीक है । लेकिन मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूं और राजनीति नहीं करता हाँ देश का जागरुक नागरिक होने के नाते देश की राजनीति पर नजरें जरुर रहती हैं और यह जरुरत भी है। मैं यहाँ विकसित अन्य देशों की कुछ बात करना चाहता हूँ । हाल ही में मैं जापान गया था, वहां १० दिन तक रह कर आया हूँ । वहां के न्यूज पेपर में देखता हूँ तो उनका अपना न्यूज कुछ भी नहीं होता है । क्योंकि जापनिज पेपर के लिए कोई ऐसा राजनीतिक समाचार ही नहीं होता है ताकि वे प्राथमिकता दे कर छाप सके । इसीलिए वहां के पेपर अपने राजनीति कें बारे में नहीं, इरान–इराक जैसे देशों के बारे में ज्यादा लिखते हैं । इसी तरह वे लोग अमेरिका आदि अन्य देशों की घटनाओं के बारे में लिखते हैं । आम पब्लिक को भी राजनीति में क्या हो रहा है, पता ही नहीं चलता । लेकिन नेपाल में राजनीति इस तरह होती है कि एक आदमी को व्यवहारिक बनने के लिए राजनीति करना पड़ता है और वह राजनीतिक पार्टी ज्वाइन करने के लिए मजबूर होते हैं । इसीलिए राजनीतिज्ञ नहीं होते हुए भी राजनीति करना पड़ रहा है यहां ।

मेरा पेशा, जन्म तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि के दृष्टिकोण से भी मैं राजनीति से निकट नहीं हूँ । लेकिन नेपाल में इतनी ज्यादा पार्टियां है, उनमें से कहीं न कहीं मुझे ज्वाइन करना ही होता है । इसीलिए आवश्यकता अनुसार यहां राजनीतिक नाम के कोई ना कोई मोटे वृक्ष को पकड़ना पड़ता है । अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो व्यापार,व्यवसाय पर भी प्रतिकूल असर पर सकता है। आज प्रायः सभी व्यवसायियों के लिए यह एक पीड़ा भी है । मैं सिर्फ नेपाल की बात नहीं कर रहा हूँ । दक्षिण एशियायी देश भारत और पाकिस्तान में भी ऐसी ही हालत है । नेपाल में और ज्यादा है । यह एक खराब राजनीतिक चरित्र और व्यवस्था के कारण ऐसा हो रहा है ।

देश में व्यवहारिक प्रजातन्त्र नहीं है

आपने पूछा है कि राष्ट्रीय जनता पार्टी को अब क्या करना चाहिए ? वर्तमान स्थिति को देखेंगे तो हम लोग जिस परिवर्तन की अपेक्षा कर रहे है, वह नहीं हो पा रहा है । इसमें सबसे बड़ी दिक्कत कुछ लोगों की मानसिकता है । देखा जाय तो सिर्फ मधेश के प्रति ही नहीं, हर कोई भी एक वर्ग, दूसरे वर्ग के प्रति असहिष्णु दिखाई दे रहा है । यह पञ्चायती व्यवस्था से ही होता आ रहा है । परिवर्तन के नाम में यहां पहले से ही कोतपर्व जैसे काण्ड होते आ रहे हैं । राजा के दो सौ साल के इतिहास में हमने जो देखा है, आज भी वही देखते आ रहे हैं । हम बोल रहे हैं कि आज प्रजातंन्त्र है, तो प्रजातन्त्र सबों के लिए होना चाहिए प्रजातन्त्र में सबका साझा अधिकार होता है कोई खास वर्ग वा व्यक्ति के लिए प्रजातन्त्र नही होता है |

प्रजातन्त्र का मतलव पावर प्रजा के पास होनी चाहिए है । लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है । अभी जो पावर में बैठे है, उनके पास ही पावर हैं । वही शासन कर रहे हैं । प्रजा के हाथ में तो कुछ भी नहीं है । हां, जो शासक बनना चाहते हैं, उनमें से किस को चयन करना है अर्थात् वोट देना है, यह अधिकार जनता को मिला है । लेकिन अन्य सभी अधिकार तो उन्हीं शासकों के पास है ।

मैं एक उदाहरण पेश करता हूं । मान लीजिए मुझे उच्च पदों में रहने वालों में से किसी से मिलना है, चाहे वह राजनीतिज्ञ हो वा व्युरोक्रेट्स । हमारे लिए विल्कुल सहज नहीं है । पञ्चायत काल में जितनी दिक्कत होती थी, आज उससे भी ज्यादा दिक्कत बढ़ गयी है । राजा के समय में कुछ दिक्कत होती ही थी, जब हमारे राजा गये, हम लोग और दिक्कत में पड़ गए हैं । अर्थात् हमारी आवाज आज भी कोई नहीं सुन रहा है ।

जैसे कि मैं स्कूल चलाता हूँ । स्कूल के क्षेत्र में मधेशी बहुत कम हैं । मुझे पता है कि मधेशियों की पीड़ा के वारे में । व्यापार तथा अन्य व्यवसाय के क्षेत्र में आवद्ध मधेशी क्या पीड़ा झेल रहे हैं, उस का पता कम ही चलता है । लेकिन स्कूल के क्षेत्र में तुरंत सब कुछ पता चलजाता है । बार बार हमारे ऊपर आक्रमण होता रहता है । उसकी एक ही वजह होती है कि हम मधेशी हैं । यह बात मुझे बोलना नहीं चाहिए । लेकिन क्या करे, सच तो यही है । क्योंकि हम लोगों को मधेशी कह कर अलग किया जाता है । यह पीड़ा हम लोग कब तक झेलें ?

मानसिकता परिवर्तन की आवश्यकता

प्रजातन्त्र आया है, तो क्यों मधेश और पहाड़ की बात होती है ? मुझे यह बात समझ मे नहीं आती । यह देश तो सब का है । लेकिन ‘आप को इतना अधिकार दे दिया है’ कह कर राजनीति की जाती है यहाँ ? एक प्रश्न– आप देने वाले कौन है ? हम लेने वाले कौन हैं ? इसीलिए सबसे पहले यह देश सब के लिए साझा देश होना चाहिए । उसके लिए सोच में बदलाव आना जरुरी है । पञ्चायतकालीन मानसिकता जिस तरह की थी, आज भी वही मानसिकता रखेंगे तो जनता, प्रजातन्त्र की अनुभूति नहीं कर पाएगी ।

राजपा की राजनीति

विभिन्न ६ दलों में विभाजित मधेशवादी पार्टी आज एक जगह हो गए हैं, यह अच्छी बात है । लेकिन यहां कुछ आशंका भी है । यहां मुझे भारत वर्ष का इतिहास याद आता है । भारत वर्ष का इतिहास देखेंगे तो वहां अंग्रेजों से लेकर मुगल तक का राज चला है । भारत वर्ष के लोग ऐसे हैं, जो अपने लोगों को ही दुश्मन मानते हैं । यह इतिहास सिद्ध तथ्य है । विगत १२–१३ सौ वर्षो. का इतिहास देखा जाए तो वहां मुगल का राज भी चला । मुगल क्यों आए है ? भारतीय लोगों के सपोर्ट में ही वे लोग आए थे । यह एक उदाहरण है । आज भी भारत में हिन्दूत्व के लिए ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है । एक हिन्दू द्वारा दूसरे हिन्दू के ऊपर कुछ हो जाता है तो खास मतलव नहीं रखता । लेकिन दूसरों के ऊपर कुछ हो तो वहां आपस में हाय–तौवा मच जाती हैं, एक–दूसरों के बीच मार–काट हो जाती है । इस तरह भारत के अंदर भारत के लोग ही गुलाम हो रहें है । वैसी ही हालांत नेपाल में भी हो रही है ।

आज जो मधेश की मानसिकता है, वह भारत से मिलती जुलती है । दोनों एक ही है । चाहे वह वीरगंज के हो या जनकपुर के, उनके भाषा, रंग तथा संस्कृति एक ही है । राजपा की समस्या भी यही पर दिखाई देता है । खुद अपने के विरुद्ध ही वे लोग दुश्मन बन जाते हैं । कोई किसी में विश्वास नहीं करते हैं । चुनावी नतीजा को ही देख लीजिए, नतीजा अच्छा नहीं हो रहा है । यह सब आपसी अविश्वास का कारण है । बात जो भी हो, सब को समान अधिकार मिलना चाहिए । इसके लिए आपसी एकता मजबुत होनी चाहिए । उसके बाद ही अधिकार के लिए लड़ सकते हैं । आपस में ही दुश्मनी करते हैं तो हम किसके लिए लड़े ? राजपा के अन्दर यही यथार्थ है ।

अपने भाई का सम्मान करें

ऐसी अवस्था में हम किससे बात करें ? हम जिन लोगों को अपना मानते हैं, वह भी अपने नहीं होते हैं, पराये बनते हैं । जो हमारे नहीं है, वह तो हमारे है ही नहीं । इसलिए हमें पहले अपने ही लोगों से ही विश्वास लेना पड़ेगा । छोटी–मोटी चीजों के लिए विवाद नहीं होना चाहिए ।

यहां मैं गजेन्द्र बाबू को स्मरण करना चाहता हूं, जो अभी जीवित नहीं हैं । मधेश की राजनीति में उनका योगदान अपूरणीय है । मधेश की आवाज को सबसे पहले उन्होंने ही उठाया था । लेकिन जब गजेन्द्र बाबू को सम्मान करने की बात होती है तो यहां हंगामा हो जाता है । जो आदमी है ही नहीं, उसको सम्मान करने में भी हम लोग विवाद करते हैं । इस तरह की छोटी–मोटी बात पर हम आपस में लड़ते रहते हैं, तो हम कैसे आगे जा पाएंगे ? इस बात पर राजपा को ध्यान देना चाहिए । अपने भाईयों को सम्मान करना चाहिए । प्रजातन्त्र में भी ‘आप ऐसे हैं’, ‘आप वैसे हैं’ कह कर विभेद झेलना न पड़े ।

कुछ ही दिन पहले की बात है । मैं एक सरकारी अधिकारियों से मिलने गया था । वह सीधा–सीधा बोलता है– ‘आप यह काम क्यों कर रहे हैं, आप तो बाहर के आदमी हैं !’ मैंने कहा– ‘सर ! हम लोग डेढ सौ साल से यहां हैं, हम कब लोकल होंगे ?’ उनके पास कोई भी जावाब नहीं था । लेकिन इस तरह की बात सुन–सुन कर मैं थक चुका हूं, मन में पीड़ा होती है । लेकिन मैं कहां जाकर इस पीड़ा का व्यक्त करुं ! इस तरह की पीड़ा हर मधेशियों को झेलना पड़ता है । कहां का नियम है यह ? कहाँ लिखा है कि ‘मधेश का आदमी यह काम नहीं कर सकता’ और ‘पहाड का आदमी वह नहीं कर सकता’ ? मैं चाहता हूं, इस तरह की पीड़ा अब किसी को भी न हो । इसीलिए मैं राजपा को कहना चाहता हूं कि आपस में जो विभेद हैं, उसको अंत करना होगा, और अपने अधिकार के लिए लड़ना होगा ।

संविधान संशोधन के सम्बन्ध में

जो सच है, वह आप को पता है और मुझे भी । संघीयता, समावेशिता, समानुपातिक और समान अधिकार का मुद्दा तो माओवादी ने ही आगे लाया है, उसका नेतृत्व प्रचण्ड ने किया है । बाद में अन्य पार्टी, उस मुद्दा को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो गए हैं ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz