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‘सुख’ सम्पन्नता का मोहताज नहीं

0 June 15, 2017

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य शरीर सर्वेश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है । भगवान ने मनुष्य को दस इन्द्रियां एक मन और बुद्धि देकर सर्वगुण सम्पन्न ...

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रुद्राक्ष का माहात्म्य

0 May 17, 2017

सेव्यः सेव्यः सदा सेव्यः शंकर सर्वदुःखहा रुद्राक्ष शिव को बहुत ही प्रिय है । इसे परम पावन समझना चाहिए । रुद्राक्ष के दर्शन के स्पर्श से तथा उस पर जप क...

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भस्म–महात्म्य

0 May 5, 2017

भस्म सम्पूर्ण मंगलों को देनेवाला सर्वोत्तम साधन है, उसके दो भेद बताये गये है । एक को ‘महाभस्म’ और दूसरे को ‘स्वल्पभस्म’ । महाभस्म के भी अनेक भेद हैं ।...

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कुसंग से होता है व्यक्ति का नाश

0 January 17, 2017

भगवत गीता के इस दृष्टान्त से यह शिक्षा मिलती है कि श्रेष्ठ व्यक्ति भी कुसंगत से पाकर नष्ट हो जाता है । गीता में भगवान् कहते हैं– ‘अपने द्वारा अपना संस...

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मेरा जन्म क्यों

0 December 18, 2016

रवीन्द्र झा ‘शंकर’ मनुष्य अपनी ओर नहीं देखता कि मेरा जन्म क्यों हुआ है, मुझे क्या करना चाहिये और मैं क्या कर रहा हूँ ? जब तक वह उसपर ध्यान नहीं देता, ...

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धन और मान में सच्चा सुख नहीं

0 November 25, 2016

रवीन्द्र झा उन्नसठवीं सदी के अन्तिम चरण की बात है, कराची के एक मध्यमवर्गीय सिन्धी परिवार में हरनाम नाम का एक बालक था । माँ बचपन में ही मर चुकी थी । बा...

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रे अभागे मन

0 October 23, 2016

रवीन्द्र झा ‘शंकर’ प्रभोः मेरे लिए ‘मैं’ जितना प्यारा हूँ, उससे कहीं अधिक तुम्हारे लिए ‘मैं’ प्यारा हूँ । फिर मैं अपने लिए इतनी चिन्ता क्यों करता हूँ ...