बेटी–विदाई मिथिलांचल की

बड़ रे जतन से सियाजी के पोसलों
से हो सिया राम लेने जाय ।’


मिथिला की बेटी की विदाई के वक्त यह गम अपनी चरमावस्था में होता है । यह बात अलग है कि शहरों की अधिकांश बेटियों ने विदाई के वक्त ब्यूटीशियन की मदद से तैयार किये गये मंहगे मेकअप के बिगड़ जाने के डर से आंसु बहाना बंद कर दिया है और खुशी–खुशी बोलेरो में बैठकर समझदारी और आधुनिकता का परिचय देना प्रारम्भ कर दिया है, किंतु मिथिला की बेटियां अभी भी इस प्रभाव से पूरी तरह अछूती हैं

रूपा लोहनी
जो मिथिलावासी नहीं है, और जिन्होंने मिथिला की बेटी की विदाई का दृश्य नजदीक से नहीं देखा है, यह बात अटपटी जरूर लगेगी कि मिथिला की बेटी के रोने के दृश्य को ही सबसे अधिक दर्दनाक दृश्य क्यों कहा जा रहा है । किसी प्रिय की मृत्यु से उत्पन्न दर्द से भी अधिक मिथिला की बेटी की विदाई से उत्पन्न दर्द को अधिक क्यों बताया जा रहा है ?
यूं तो नेपाल की हर बेटी जब पहली बार अपने मायके को अलविदा करते हुए ससुराल में अपनी नयी दुनिया बसाने को मायके की देहरी लांघती है तो टूटते हृदय के भाव आंसू बनकर आंखों से टपकने ही लगते हैं और माहौल बहुत गमगीन हो जाता है, लेकिन मिथिला की बेटी की विदाई के वक्त यह गम अपनी चरमावस्था में होता है । यह बात अलग है कि शहरों की अधिकांश बेटियों ने विदाई के वक्त ब्यूटीशियन की मदद से तैयार किये गये मंहगे मेकअप के बिगड़ जाने के डर से आंसु बहाना बंद कर दिया है और खुशी–खुशी बोलेरो में बैठकर समझदारी और आधुनिकता का परिचय देना प्रारम्भ कर दिया है, किंतु मिथिला की बेटियां अभी भी इस प्रभाव से पूरी तरह अछूती हैं ।

दिलचस्प तथ्य तो यह भी है कि मिथिला में विदाई के वक्त बेटी का रुदन एक कला भी है । बेटी के सुसराल चले जाने के बाद आस–पड़ोस के लोग खासकर महिलाएं उसके रुदन की समीक्षा करती हैं । जो नवविवाहिता बहुत ही मार्मिक ढंग से रोती है व अधिक से अधिक लोगों को रुलाकर चली जाती है, उसे लोग बरसों याद रखते हैं और बातचीत के दौरान उसके रुदन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं । इसके विपरीत जो ढंग से रो भी नहीं पाती, उसका उपहास भी बाद में किया जाता है
दरअसल मिथिला की बेटी जब विदाई के वक्त रोना प्रारंभ करती है, तो वह अकेले नहीं रोती बल्कि उस मौके पर उपस्थित परिजन, ग्रामवासी एवं तमाम लोग रोने लगते हैं । उपस्थित सारी महिलाएं तो जोर–जोर से इस कदर रोने लगती हैं मानों उसके हृदय के टुकड़े–टुकड़े हो रहे हों और उनका सब कुछ लुटा जा रहा है । पिता, भाई, चाचा, परिजन व अन्य उपस्थित मर्द तो जोर–जोर से नहीं रोते, किंतु वे सिसकते, हिचकियां लेते और बार–बार आंखें पोंछते अवश्य नजर आते हैं । सबों को रोते देखकर छोटे–छोटे बच्चे भी जोर–जोर से रोने लगते हैं, चाहे उन्हें दर्द का अहसास हो न हो । मिथिला के कुछ इलाकों में इस प्रकार के रुदन को ‘घौना विलौना’ कहते हैं ।
यहाँ तक कि दहेज के नाम पर बेटी के बाप से खून तक चूस लेनेवाले निष्ठुर दुल्हे भी इस अवसर पर आंखें पोंछते नजर आते हैं और कभी–कभी तो दुल्हे के मन में यह भाव भी उत्पन्न हो जाता है कि वह अपनी दुल्हन को अपने साथ ले जाकर उसके मायके वालों को इस तरह का असहनीय कष्ट क्यों दे रहा है । ऐसे में दुल्हा कभी–कभी सबों की मार्मिक कथा का जिम्मेदार खुद को मानने लगता है । बेटी को विदा करने आम–पड़ोस के व टोल से सारे लोग पहुँच जाते हैं और आशिर्वाद के साथ–साथ आंसू की सौगात भी देते हैं । ऐसा लगता है मानो घरद्वार, पेड़–पौधे, जानवर आदि भी रो रहे हैं, बेटी को विदा करते वक्त ।
विदाई के क्षण के पास आते ही बेटी जब रोना शुरु कर देती है तो फिर उस करुन क्रंदन का कोई ओर–छोर नहीं होता है । माता–पिता, भाई–बहन, भाभी–चाची व अन्य सबों से गले मिलकर रोती है और सबों को जोर–जोर से पुकार–पुकार कर बिखलते हुए स्वर में पूछती है कि उसने कौन–सा अपरा– किया है कि उसे सबों से दूर भेजा जा रहा है, कैसे सब आत्मीय जनों के बिना जाएगी वह किसको मां–मां या बाबूजी कह पुकारेगी ।
भाव विह्वल होकर वह पूछती है कि उसे कहां भेजा जा रहा है, जिसका जवाब हर कोई सिर्फ रो कर आंसुओं से देता है । साथ रोती महिलाएं सामूहिक रुदन के साथ–साथ धीरे–धीरे बेटी को संभालते हुए उस सवारी (कार, जीप, ट्रैक्टर, बोलेरो, बस) के पास लाती है, जिस सवारी पर बैठकर उसे ससुराल जाना होता है, तो यह दृश्य अपने ‘क्लाइमेक्स’ पर जा पहुँचता है । बेटी गाड़ी पर चढ़ना नहीं चाहती है और रिश्तेदार महिलाएं उसे समझा–बुझाकर गाड़ी पर चढ़ाने का प्रयास करती रहती है । बेटी इस कदर कतराती है मानो वह गाड़ी नहीं फांसी का फंदा हो ।
मिथिला में बेटियों के इस कदर भाव विह्वल होकर रोने की परंपरा बुहत ही पुरानी है । संभवतः उतनी ही पुरानी जितनी पुरानी मिथिला है । मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री सीता की राम के साथ विदाई के दृश्यों का वर्णन करता एक गीत–
बड़ा रे जतन से सियाजी के पोसलों
से हो सिया राम लेने जाय ।’
न जाने कब से पारंपारिक गीत बना हुआ है । यह गीत मिथिला का चर्चित गीत है और इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस गीत की धुन हिन्दी, नेपाली, बंगाली, अंग्रेजी के बेहतरीन मार्मिक धुनों में से एक है । बिछोड़ से उपजे इस तरह के गीतों की धुन को मिथिलावासियों ने एक अलग ही नाम दे डाला है– ‘समदाउन’ । समदाउन के तहत कई तरह के गीत इस बात को प्रतिबिंबित करते हैं कि मैथिली भाषा के गीतकारों–संगीतकारों ने भी बड़ी गहराई से बेटी की विदाई की मार्मिकता को महसूस किया है ।
वस्तुतः यह मिथिलावासियों की भावुकता व अत्यधिक संवेदनशीलता का बहुत बड़ा प्रमाण है । जिसकी चरम प्रस्तुति बेटी की विदाई के वक्त होती है । इससे यह कल्पना की जा सकती है कि विदाई के औपचारिक दृश्यों में भी जब स्थानीयवासी रोने लगते हैं तो दिल के टुकड़े से विदाई के वक्त वे कितना आंसू बहाते होंगे । कभी–कभी तो इस तरह के दृश्यों तस्वीरें उतारने वाला ‘फोटोग्राफर’ या सेल्फिस्तान’ लेनेवाले भी तस्वीरें उतारते–उतारते खुद भी तस्वीर का एक हिस्सा बन जाता है और हिचकियां लेने लगता है । ऐसी ही स्थिति रोने की आवाज को रेकॉर्ड करनेवाले के साथ भी होती है । वस्तुतः ये आंसू दर्द के पिघलने से उत्पन्न होते हैं, इसलिए एक मुख्य सवाल यह भी उठता है कि मिथिला की बेटियों का ही दर्द इतना गहरा क्यों है ?
दरअसल मिथिला में प्रारम्भ से ही बच्चों के विवाह में दूरी को नजरअंदाज किया जाता रहा है । लोग अपनी बेटियों की शादी दूर–दूर के गांवों में करते रहे हैं, अच्छे घर एवं वर की तलाश में । और अब तो तेज सवारियां व सड़क उपलब्– हैं, पहले तो डोली व कहार ही थे । डोली व कहार के बाद बैलगाड़ी पर चढ़कर दुल्हन सुसुराल जाने लगी, फिर ट्रैक्टर का युग आया और अब कार, जीप, बस का युग आया है । वैसे अभी भी ट्रैक्टर का युग है ।
दिलचस्प तथ्य तो यह भी है कि मिथिला में विदाई के वक्त बेटी का रुदन एक कला भी है । बेटी के सुसराल चले जाने के बाद आस–पड़ोस के लोग खासकर महिलाएं उसके रुदन की समीक्षा करती हैं । जो नवविवाहिता बहुत ही मार्मिक ढंग से रोती है व अधिक से अधिक लोगों को रुलाकर चली जाती है, उसे लोग बरसों याद रखते हैं और बातचीत के दौरान उसके रुदन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं । इसके विपरीत जो ढंग से रो भी नहीं पाती, उसका उपहास भी बाद में किया जाता है ।
इतना ही नहीं मार्मिक ढंग से न रो पाना मिथिला महिलाओं के व्यक्तित्व का एक ‘निगेटिव प्वाइंट’ भी माना जाता है क्योंकि बेटियों के रोने का काम विदाई में ही समाप्त नहीं हो जाता । विदाई के बाद पहली बार अपने गांव लौटती हुई महिला भी अपने गांव की सीमा रेखा के अंदर प्रवेश करते ही जोर–जोर से रोना आरंभ कर देती है । मिथिला के दूरदराज के गांवों में अभी भी ऐसा देखा जा सकता है ।
पुनः ससुराल जाते वक्त भी बेटी रोती है । फिर माता–पिता के मौत पर भी बेटियां रोती हैं । इसलिए विदाई से पहले बेटी रोने का पूर्वाभ्यास भी कर लेती है । पुराने समय में तो बेटियों को विदाई से एक महीना पूर्व से ही रुलाया जाता था, लेकिन अब यह प्रचलन नहीं है ।
विदाई के एक दिन पहले जब दुल्हा अपने सगे संबंधियों को लेकर दुल्हन की विदाई कराने पहुँच जाता है, तब बेटी को रुलाया जाता है । दरअसल मिथिला में कई ऐसे मामले भी देखने–सुनने को मिले हैं कि बेटी महीना भर से रोने का पूर्वाभ्यास करती रही और विदाई करवाने दुल्हा ही नहीं पहुँच पाया । इसलिए एक महीना पहले से ही बेटी को रुलाने की परंपरा समाप्त कर दी गयी

अनुवादः विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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