Wed. Sep 26th, 2018

समृद्ध मधेश चाहते हैं तो एमाले पर ही विश्वास करना पड़ेगा

विनोदकुमार खड्का प्रदेश सांसद्, प्रदेश नं. ३




विनोदकुमार खड्का की राजनीतिक यात्रा वि.सं. २०३८ साल से शुरु हुई है । वामपन्थी विचार धारा से प्रभावित होकर उन्होंने तत्कालीन अनेरास्ववियु ५वें से अपनी राजनीति शुरु की थी । बाद में वह नेकपा एमाले की सांगठनिक राजनीति में आवद्ध हो गए । खड्का कमलामाई नगरपालिका–७ सिन्धुली के निवासी हैं । सिन्धुली सदरमुकाम स्थित बाजार कमिटी के सचिव, युवासंघ जिला कमिटी के सदस्य और अध्यक्ष, केन्द्रीय कमिटी सदस्य तथा जनकपुर अञ्चल कमिटी इञ्चार्ज होते हुए खड्का अभी प्रदेश नं. ३ के लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधि हुए हैं । सिन्धुली निर्वाचन क्षेत्र नं. २ ‘क’ से प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रदेश सांसद खड्का के साथ मधेश राजनीति और समसामयिक विषयों में केन्द्रित रहकर हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का संपादित अंश–
० चुनावी नतीजा के अनुसार कुल सात प्रदेशों में से एमाले ६ प्रदेश में प्रथम पार्टी है । १ और ३ नम्बर प्रदेशों में तो एकल बहुमत में भी है । इस तरह पूरे देश एमालेमय होते हुए भी २ नम्बर प्रदेश में एमाले कमजोर दिखाई दिया, यहां की जनता ने एमाले पर विश्वास नहीं किया । अर्थात् तराई–मधेश निवासी जनता ने एमाले को अस्वीकार किया, इसीलिए असफल रहा है । अब तो इस सत्य–तथ्य को आप स्वीकार करते हैं न ?
– आपका कथन मुझे स्वीकार्य नहीं है । आप ने जिस तरह व्याख्या की, मैं आपकी तरह नहीं देखता हूं । आपने कहा कि मधेश और मधेशी जनता की भावना को सम्बोधन करने में एमाले असमर्थ रहा और जनता ने एमाले को अस्वीकार किया, यह झूठ है । चुनाव में विजय और पराजय होने के पीछे प्राविधिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होता है । मधेश और एमाले के सवाल में अभी यही हो रहा है । तराई–मधेश से एमाले को जितना भी मत प्राप्त हुआ है, वह कम नहीं है । निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या को देखते हैं तो भी एमाले यहां तीसरे राजनीतिक शक्ति के रूप में है ।



हां, अन्य प्रदेशों की तुलना में २ नम्बर प्रदेश में एमाले कुछ कमजोर दिखाई देती है । इसके पीछे कुछ कारण है । उदाहरण के लिए चुनाव से पहले की घटना को स्मरण करना होगा । उस समय मधेश में एमाले के विरुद्ध प्रतिकूल वातावरण रहा । जनता के बीच जाने के लिए एमाले को प्रतिबंद्ध किया गया । इस तरह का वातावरण बनाने के लिए राज्य पक्ष ने भी सहयोग किया । मधेश में जितने भी राजनीतिक शक्तियां क्रियाशील हैं, वह सभी एमाले को हराने के लिए सक्रिय रहे । प्रजातान्त्रिक अभ्यास में किसी भी राजनीतिक दल को जनता में जा कर अपनी बात रखने का अधिकार होता है । लेकिन तराई–मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले कुछ दल और नेताओं ने अपनी तानाशाही चरित्र का प्रदर्शन किया, एमाले को मधेशी जनता के बीच में जाने के लिए अवरोध खड़ा किया और हमारे विरुद्ध गलत प्रचार करते रहे । मधेश और मधेशी जनता के लिए एमाले नेतृत्व की सरकार ने क्या–क्या किया है, उसका प्रचार–प्रसार करने में हम लोगों को रोका गया । एमाले को हराने के लिए ही तराई मधेश के महत्वपूर्ण शक्ति फोरम नेपाल, राजपा और नेपाली कांग्रेस लगे थे, उन पार्टियों ने एमाले विरुद्ध सभी अस्त्र का प्रयोग किया । इतना होते हुए भी तराई–मधेश में एमाले तीसरे स्थान में है ।
० अगर मधेशी जनता एमाले के विरुद्ध नहीं होती तो जनस्तर से स्वागत होना चाहिए था, एमाले के विरुद्ध खड़ा होनेवालों के विरुद्ध जनस्तर से प्रतिवाद होना चाहिए था । लेकिन ऐसा तो नहीं हुआ ?
– फिर भी कहता हूं– चुनावी जीत–हार प्राविधिक विषय है । लेकिन एमाले, मधेश और मधेशी जनता के विरोधी पार्टी नहीं है । इसके लिए ज्यादा बहस करने की आवश्यकता ही नहीं है । मधेश और मधेशी जनता के पक्ष में एमाले नेतृत्व की सरकार ने क्या–क्या किया, आप उसका थोड़ा अध्ययन कर लीजिए, सब कुछ सामने आ जाएगा । आजतक के इतिहास में मधेश के लिए सबसे अधिक बजट देनेवाली सरकार एमाले का ही है, मधेशी जनता को लक्षित कर सबसे ज्यादा नीति तथा कार्यक्रम बनानेवाली पार्टी भी एमाले ही है । सरकार में रहते वक्त मधेश के लिए एमाले ने जो कुछ भी किया, उतना काम अन्य कौन–सी पार्टी ने किया है ? मधेश के नाम में जो राजनीति करते हैं, उन लोगों ने सरकार में रहते वक्त क्या किया ? और एमाले ने सरकार में रहते वक्त क्या किया ? ईमानदार हो कर इन प्रश्नों का सही जवाब खोजेंगे तो पुष्टि हो सकती है कि एमाले मधेश विरोधी पार्टी नहीं है । हां व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कुछ समय जनता को भ्रम में रख सकते हैं, लेकिन ज्यादा समय नहीं है । एमाले मधेश विरोधी पार्टी नहीं है, यह बात मधेश में रहनेवाली जनता भी समझने लगी है ।



० लेकिन २ नम्बर प्रदेश में तो मधेशवादी दल तथा उनके नेता ही सबसे ज्यादा चुनाव में विजयी हुए हैं । वे लोग कह रहे हैं कि आज भी हमारा प्रमुख एजेण्डा संविधान संशोधन ही है । लेकिन इसके लिए एमाले बाधक हो रहा है, ऐसा उन लोगों का कहना है । इसके बारे में क्या खयाल है ?
– इस विषय में भी एमाले के विरुद्ध भ्रामक प्रचार हो रहा है । एमाले संविधान संशोधन के विरुद्ध नहीं है । संविधान संशोधन आवश्यक है या नहीं ? जिस मुद्दा को लेकर संशोधन की बात हो रही है, क्या वह देश और जनता की हित में है ? इन प्रश्नों का सही जवाब मिलना चाहिए । अगर सही जवाब प्राप्त हो सकता है तो वहां संविधान संशोधन आवश्यक बनता है । इसके लिए एमाले बाधक नहीं है । अर्थात् मधेश तथा समग्र देश की विकास और समृद्धि के लिए कहीं संविधान बाधक दिखाई देता है तो एमाले संशोधन के लिए तैयार है । लेकिन चंद पार्टी तथा नेताओं की स्वार्थ और महत्वांकाक्षा के लिए संविधान संशोधन नहीं हो सकता ।
० सिर्फ मधेश के लिए संविधान संशोधन नहीं हो सकता, क्या आप यही कहना चाहेंगे ?
– नहीं । सिर्फ मधेश के लिए भी संविधान संशोधन हो सकता है । लेकिन संशोधन आवश्यक है कि नहीं ? इसमें स्वस्थ बहस जरुरी है । क्या संविधान के कारण ही मधेशी जनता अपने न्यूनतम अधिकारों से वंचित हो रहे हैं ? राज्य से प्राप्त होनेवाली न्यूनतम सेवा–सुविधा उन लोगों को नहीं मिल रहा है ? क्या वर्तमान संविधान ही मधेश के विकास के लिए बाधक है ? संशोधन के बाद उन लोगों को क्या–क्या मिलनेवाला है ? क्या संशोधन नेपाल के हित में है ? इन प्रश्नों में बहस होना चाहिए, और सकारात्मक जवाब आना चाहिए । अगर उसके बाद मधेश और मधेशी जनता के उत्थान में संविधान बाधक दिखाई देता है तो एमाले संशोधन के लिए तैयार है । लेकिन जिन्होंने संविधान संशोधन के नाम में हत्या–हिंसा को प्रोत्साहित किया और राजनीतिक अस्थिरता के लिए काम किया, वह सब गलत था । एमाले उस गलत क्रिया–कर्म को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है ।
० ‘वर्तमान संविधान अपूर्ण है, चुनाव में मत मिलेगा तो हम लोग उस को संशोधन करेंगे’ इसी चुनावी नारा के साथ फोरम नेपाल और राजपा नेपाल ने २ नम्बर प्रदेश में चुनाव में विजय हासिल किया । आप कहते हैं कि संविधान संशोधन आवश्यक ही नहीं हैं । जनता को किस तरह समझाएंगे ?
– हां, अभी संशोधन आवश्यक नहीं है । कार्यान्वयन करते वक्त कोई व्यवधान आ जाए तो उस वक्त आवश्यक हो सकता है और उसी वक्त संशोधन की आवश्यकता होगी । क्योंकि संविधान कोई भी गीता, कुरान और बाइबल नहीं है, जिसको परिवर्तन नहीं किया जाएगा । आवश्यकता और औचित्य के आधार में संविधान किसी भी वक्त संशोधन हो सकता है । तराई–मधेश में रहनेवाली जनता चाहती है कि वह भी समान रूप में राज्य के मूल प्रवाह में समावेश हो सके, आर्थिक और सामाजिक रूप में समृद्ध बन सके । इसके लिए वर्तमान संविधान बाधक नहीं है ।
० फिर समस्या कहां है ?
मधेशी और पहाड़ी समुदाय के बीच वैमनस्यता खड़ा कर राजनीति करनेवालों के कारण ही आज समस्या आई है । उन लोगों के भ्रामक प्रचार में कुछ मधेशी जनता भी बहक रही हैं । लेकिन आज के दिन मधेशी जनता के लिए संविधान संशोधन मूल आवश्यकता नहीं है । व्यक्तिगत तथा समूहगत आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, समान अधिकार की प्रत्याभूति उन लोगों की आवश्यकता है, जिसमें संविधान बाधक नहीं है । संविधान के विरुद्ध गलत प्रचार–प्रसार करने से यह सब प्राप्त होनेवाला नहीं है । संविधान ने पहाड़ में रहनेवाले जनता को ज्यादा और मधेश में रहनेवाले जनता को कम अधिकार दिया है, इस तरह का जो प्रचार किया जा रहा है, वह सत्य नहीं है ।
० तराई–मधेश से प्रतिनिधित्व करेवाले एमाले के कुछ सांसद् अभी भी कह रहे हैं कि २ नम्बर प्रदेश में कम से कम उदयपुर और सिन्धुली को जोड़ना चाहिए । क्या यह सम्भव है ?
– सिर्फ सिन्धुली और उदयपुर को ही नहीं, मकवानपुर और रामेछाप को भी तराई–मधेश में मिलाकर प्रदेश निर्माण करना चाहिए, मैं भी ऐसा ही कहता था । लेकिन मधेश में ठेकेदारी चलानेवाले कुछ नेताओं के कारण वातावरण बिगड़ गया । पहाड और मधेश एक–दूसरे के लिए दुश्मन है, इस तरह प्रचार किया गया । जिसके चलते दोनों तरफ की जनता भावनात्मक रूप में भ्रमित हो गए । ऐसी अवस्था में आज आकर २ नम्बर प्रदेश में सिन्धुली और उदयपुर को समावेश करना चाहिए, ऐसी बात करते हैं तो मुझे लगता है तत्काल यह सम्भव नहीं है । हां, मधेशवादी कहलानेवाले नेता कहते हैं कि हम लोगों से गलती हुई है, हमारी चेतना वापस आई है, ऐसी अवस्था में हम लोगों को भी सोचना चाहिए । लेकिन वे लोग चाहते हैं कि उदयपुर, सिन्धुली और मकवानपुर जिला के चुरे से दक्षिण स्थित समथर भू–भाग ही २ नम्बर प्रदेश में होना चाहिए, पहाड़ नहीं । थोड़ा गौर कीजिए– समथर भू–भाग चाहिए, लेकिन पहाड नहीं ! इस का मतलब क्या है ? इस तरह स्वार्थपूर्ण ढंग से आनेवाले प्रस्ताव को हम लोग स्वीकार करने वाले नहीं हैं ।
मैं भी सिन्धुली निवासी हूं । पहले से ही हमारा अञ्चल प्रशासन कार्यालय जनकपुर में था । कई सरकारी कामकाजों को के लिए जनकपुर ही जाना पड़ता था । मुझे लगता था कि जनकपुर और सिन्धुली एक ही है, इस को अलग करना ठीक नहीं है । लेकिन मधेश के नाम में राजनीति करनेवालों ने जनकपुर और सिन्धुली को अलग किया । जनकपुर में पहाड़ी समुदाय के लोगों को प्रवेश करना अपराध है, इसतरह का भ्रम बिछाया गया । जिसका भावनात्मक असर आम लोगों में दिखाई दिया । जिसके चलते अब पहाड़ में रहनेवाले लोग भी मधेश से जुड़कर रहने के लिए असहज महसूस करने लगे हैं । हां, दो नम्बर प्रदेश को प्राकृतिक स्रोत–साधन से से जोड़ना है तो सिन्धुली, उदयपुर और रामेछाप को मिलाना आवश्यक है, लेकिन व्यावहारिक रूप में अब सहज नहीं है ।
० एमाले सबसे बड़ी पार्टी है, फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने भी कहा है कि जानकी मन्दिर से प्राप्त होनेवाला दान–दक्षिणा से दो नम्बर प्रदेश चलनेवाला नहीं है । ऐसी अवस्था में कल राजनीतिक नेतृत्व में उदयपुर और सिन्धुली को दो नम्बर प्रदेश में मिलाने की बात भी हो सकती है । क्या उस वक्त सिन्धुली प्रतिकार में उतर आएगी ?
– इस तरह से सोचना गलत है । हमारी चाहत है कि सभी (सात) प्रदेश ही हर दृष्टिकोण से सुविधा–सम्पन्न और समृद्ध बन सके । सात प्रदेशों में से कोई शक्तिशाली और कोई कमजोर, ऐसा नहीं हो । ऐसी अवस्था में सीमांकन में कुछ बदलाव आवश्यकता है तो उसके लिए हम लोग को तैयार होना पड़ेगा । लेकिन आज आकर सिन्धुली को २ नम्बर प्रदेश में ले जाने की बात की जाती है तो मुझे लगता है सिन्धुलीबासी इसके लिए तैयार नहीं है । उससे पहले विश्वास का वातावरण निर्माण होना आवश्यक है ।
० दो नम्बर प्रदेश में आज भाषा सम्बन्धी विवाद भी दिखाई दे रहा है । एक समूह है, जो कहता है– हिन्दी दो नम्बर प्रदेश के लिए सम्पर्क भाषा है, इसी को सरकारी कामकाजी भाषा के रूप में विकास करना चाहिए । लेकिन मैथिली तथा भोजपुरी भाषी समर्थक दूसरा समूह इस कथन के विरुद्ध दिखाई देते हैं । इस को आप किस तरह लेते हैं ?
– इस तरह भाषा के नाम में विवाद करना ठीक नहीं है । भाषा और धर्म के नाम में नयी लडाई शुरु करेंगे तो हम लोग कभी भी आगे नहीं जा पाएंगे । मेरे विचार में नेपाल की कोई भी क्षेत्र में हिन्दी को कानूनी संरक्षण प्रदान कर सरकारी कामकाजी भाषा बनाने की आवश्यकता भी नहीं है । क्योंकि नेपाल में हिन्दी को मातृ–भाषा के रूप में प्रयोग करनेवाले लोग भी नगण्य हैं । हां, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आदि भाषाओं की संरक्षण किया जा सकता है । स्थानीय स्तर में स्थानीय भाषाओं को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने की मांग होती है तो उसको स्वीकार किया जा सकता है । क्योंकि अपनी मातृ–भाषा का संरक्षण करना उन लोगों का अधिकार भी है ।
० लेकिन भोजपुरी, मैथिली तथा थारु भाषा–भाषियों के बीच हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में लिया जाता है, ऐसी अवस्था में सरकारी कामकाजी भाषा के रूप में हिन्दी को क्यों नहीं विकास किया जाए ?
– सिर्फ भोजपुरी–मैथिली भाषियों के बीच में ही नहीं, कई सन्दर्भ में नेपाली भाषियों के लिए भी हिन्दी सम्पर्क भाषा हो सकती है । लेकिन सम्पर्क भाषा होने के कारण ही उसको कानूनी तौर पर सरकारी मान्यता मिलनी चाहिए, हिन्दी में ही पाठ्यक्रम विकास करना चाहिए और सरकारी लिखापढी होनी चाहिए, यह जरुरी नहीं है । हम लोग हिन्दी के पीछे क्यों इस तरह पड़े है ? हमारे यहां कानूनी तौर पर हिन्दी को संरक्षण और विकसित करना जरुरी है ? नहीं । यह तो आपसे आप विकसित अंतर्राष्ट्रीय भाषा है । जिस को नीति–नियम बनाकर संरक्षण करने की जरुरत नहीं है । इसीलिए हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता ।
० मधेश और पहाड, भोजपुरी और मैथिली समुदाय के बीच हिन्दी सम्पर्क भाषा हो सकती है, इस बात को स्वीकार करते हैं तो तराई–मधेश में सरकारी कामकाज के लिए इस को रोकने की जरुरत क्यो ?
– मुझे लगता है कि हिन्दी भाषा के लिए इस तरह की विचार–विमर्श आवश्यक नहीं है । तराई–मधेश निवासी नेपाली में से कितने हैं, जो नेपाली नहीं समझ सकते है ? हिमाल, पहाड़ और तराई जहां भी हो, नयी पीढी के हर व्यक्ति नेपाली भाषा समझ सकते हैं । जहां तक हिन्दी की बात है, पहाड में भी हिन्दी भाषा को समझनेवाले व्यक्ति बहुत हैं । इसका मतलब अब क्या पहाड़ में भी हिन्दी भाषा लागू किया जाए ? यह नहीं हो सकता । ऐसी अवस्था में समग्र नेपाल के लिए नेपाली भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा बनाना उपर्युक्त है । इतना होते हुए भी स्थानीय स्तर में स्थानीय समुदाय की भाषा संरक्षण के लिए स्थानीय सरकार अपनी भाषिक अधिकार प्रयोग कर सकता है ।
हां, मैं भी हिन्दी भाषा समझता हूं । और, सम्मान भी देता हूं । लेकिन हिन्दी भाषा संरक्षण के लिए हमारे यहां कानूनी व्यवस्था करने की जरुरत नहीं है । हम लोगों के कानूनी संरक्षण न देने से भी हिन्दी की पहुँच, प्रभाव और विस्तार को रोका नहीं जा सकता । जो खुद में ही समृद्ध और सशक्त भाषा है, उसको नेपाल में कानूनी संरक्षण की आवश्यकता क्यों ? दूसरी बात, हिन्दी भाषा को हमारे यहां राष्ट्रीयता से जोड़कर भी देखा जाता है, व्याख्या–विश्लेषण किया जाता है । अर्थात् हिन्दी भाषा हमारी राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करती । इसीलिए हिन्दी के लिए यहां पक्ष और विपक्ष खड़ा कर बहस करना जरुरी नहीं है ।
० आप प्रदेश नं. ३ के प्रदेशसभा सांसद् हैं । इस प्रदेश को आर्थिक रूप में कैसे समृद्ध किया जा सकता है ?
– अन्य प्रदेशों की तुलना में प्रदेश नं. ३ अपने आप में समृद्ध है । उदाहरण के लिए केन्द्रीय सरकार भी इसी प्रदेश में है, प्राकृतिक स्रोत–साधन और भौतिक पूर्वाधार के दृष्टिकोण से भी प्रदेश नं. ३ अन्य प्रदेशों में से समृद्ध है । पर्यटकीय क्षेत्र, धार्मिक क्षेत्र, खेती–योग्य जमीन, जल सम्पदा हर क्षेत्र में ३ नम्बर प्रदेश आगे है । सरकारी सेवा–सुविधा, यातायात, विकास के लिए पूर्वाधार किसी में भी कम नहीं है । आगे जाने के लिए बस काम करना बाकी है ।
आजतक हमारा पारवहन सम्झौता सिर्फ भारत के साथ रहा । अब उत्तरी पड़ोसी मुल्क चीन के साथ भी हो रहा है । जिसके चलते दो देशों के बीच व्यापार–व्यवसाय वृद्धि हो जाएगी । यह समय का मांग भी है । वैसे तो अन्तर्राष्ट्रीय सन्धी–सम्झौता और व्यापारिक कारोबार केन्द्र सरकार के द्वारा की जाती है । लेकिन केन्द्र सरकार ३ नम्बर प्रदेश में ही है और चीन के साथ जिस नाके से पारवहन सम्झौता हो रहा है, वह जमीन भी ३ नम्बर प्रदेश में ही है । हम लोग इसका भरपूर फायदा ले सकते हैं ।
इसीतरह धार्मिक–सांस्कृतिक स्थलों का विकास, पर्यटकीय स्थलों का व्यवस्थापन, जलस्रोत का सदुपयोग आदि करके भी हम अपना आर्थिक स्रोत बढ़ा सकते हैं । यहां ऐसे कई भूगोल, सांस्कृतिक सम्पदा और ऐतिहासिक तथ्य हैं, जो विश्व जगत के लिए ध्यानाकृष्ट कर सकती है । जैसे की सिन्धुली जिला को ही ले सकते है । सिन्धुली जिला को तो मैं ‘वीरता का प्रतीक’ भी मानता हूं । आज हम लोग खुद को गौरव के साथ नेपाली कहते हैं । इस अवसर के लिए सिन्धुली जिला का महत्वपूर्ण योगदान है । अंग्रेजी साम्राज्यवाद को काठमांडू प्रवेश करने से रोकनेवाला जिला सिन्धुली ही है । अर्थात् तत्कालीन समय (वि.सं. १८२४) में अंग्रेजों के साथ सिन्धुलीगढ़ी में जो लड़ाई नेपाली ने की, उसी लडाई के कारण ही आज नेपाल सुरक्षित है । उस समय सिन्धुलीगढ़ी में अंग्रेज–सेना को नेपाली ने परास्त नहीं किया होता तो काठमांडू में अंग्रेजों का शासन शुरु हो सकता था । इस तरह का ऐतिहासिक महत्व रखनेवाला जिला ३ नम्बर प्रदेश में है । जिसके प्रचार–प्रसार में हम लोग अभी तक असमर्थ दिखाई देते हैं । सिन्धुलीगढी का भौगोलिक बनावट भी अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए आकर्षित कर सकता है । यह तो एक उदाहरण है, इस तरह के कई स्थल ३ नम्बर प्रदेश में हैं । संक्षेप में कहा जाए तो पर्यटकीय स्थालों को व्यवस्थित करने से भी ३ नम्बर प्रदेश आर्थिक रूप में समृद्ध हो सकता है ।
० नेपाल में आज जिस तरह की संघीय संरचना है, उसको संचालन करने के लिए नेपाल की अर्थ–व्यवस्था असमर्थ हो सकती है, इस तरह की चर्चा भी हो रही है । आप का खयाल क्या है ?
– हम लोगों ने आज तक केन्द्रीय और स्थानीय सरकारों का अभ्यास किया है । अब नयी संरचना और शासन व्यवस्था का अभ्यास करने जा रहे हैं । भौगोलिक संरचना के अनुसार नेपाल एक छोटा देश है । लेकिन यहां ७ प्रदेश हैं । जिस तरह संघीय संरचना और जनप्रतिनिधियों की संख्या है, उसको देखकर स्वभाविक अनुमान किया जाता है कि व्यवस्थापन के लिए राज्यकोष से कुछ ज्यादा ही खर्च करना पड़ता है । लेकिन बीते दिनों में नेपाल सरकार जो बजट बनाती थी, उससे कई गुणा ज्यादा बजट आज बन रहा है । आर्थिक स्रोत–साधन भी बढ़ रहा है । प्रदेश सरकार निर्माण होने के बाद और भी बढ़ेगा । इसीलिए आर्थिक स्रोत–साधन के अभाव के कारण ही संघीयता असफल हो सकती है, इस तरह का प्रक्षेपण ठीक नहीं है ।
हां, चावल, फलफूल, दूध, मांस–मछली जैसे आधारभूत खाद्यान्न आज हम लोग पड़ोसी देशों से आयत कर रहे हैं । क्या इस तरह के खाद्यान्न में हम लोग आत्मनिर्भर नहीं बन सकते ? अवश्य बन सकते हैं । उसके लिए कृषि में आधुनिकीकरण, उन्नत बीज, दक्ष जनशक्ति पहला शर्त है । हां, शुरुआती दिनों में कुछ कठिनाई हो सकती है । जनप्रतिनिधि तथा प्रदेश सरकार के लिए आवश्यक भौतिक संरचना निर्माण और व्यवस्थापन में कुछ ज्यादा ही धनराशि खर्च हो सकती है । लेकिन जब नया जनप्रतिनिधि इमानदार होकर अपनी काम करते हैं तो उसके बाद हमारा आर्थिक स्रोत बढ़ जाता है । इसीलिए आज ही इसतरह का अनुमान ठीक नहीं है ।
० प्रदेश नम्बर ३ की राजधानी हेटौडा कायम हुआ है, जो सभी के लिए सुलभ नहीं है, उसको स्थानान्तरण करना चाहिए, इस तरह की बात भी हो रही है । ३ नम्बर प्रदेश के सांसद् होने के नाते क्या कहते है ?
– सभी प्रदेशों के लिए अस्थायी राजधानी घोषणा करना वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी थी, जो उसने किया है । ऐसी ही अवस्था में ३ नम्बर प्रदेश की राजधानी हेटौडा बनाया गया । यहां आप को एक प्रश्न का जवाब देना होगा– राज्य का पुनर्संरचना क्यों किया जा रहा है ? राज्य से प्राप्त होनेवाली सेवा–सुविधा सहज रूप में जनता को प्रदान करने के लिए, जवाब तो यही है । तो ३ नम्बर प्रदेश की राजधानी हेटौडा होने से ३ नम्बर प्रदेश निवासी जनता को समान रूप में वह सुविधा प्राप्त हो सकती है ? नहीं, इसीलिए ३ नम्बर प्रदेश के लिए हेटौडा राजधानी उपर्युक्त नहीं है ।
हां, पुरानी राज्य संरचना के अनुसार हेटौडा में क्षेत्रीय प्रशासन कार्यालय है । तत्कालीन अवस्था में प्रशासन संचालन के खातिर यहां कुछ प्रशासनिक कार्यालय तथा भौतिक पूर्वाधार भी है, यातायात सुविधा भी है । इसीलिए सरकार ने हेटौडा को प्रदेश राजधानी घोषित किया होगा । लेकिन हम लोगों को खयाल रखना चाहिए कि ३ नम्बर प्रदेश में १३ जिला है । चितवन, मकवानपुर और सिन्धुली के अलावा अन्य जिला के लिए हेटौडा उपर्युक्त नहीं है । रामेछाप, दोलखा, रसुवा, धादिङ, नुवाकोट जैसे जिला के निवासी को हेटौडा जाने लिए कुछ ज्यादा ही दिक्कत झेलनी पड़ती है । इसीलिए इस में पुनर्विचार होना चाहिए, मुझे विश्वास है– प्रदेशसभा इस में पुनर्विचार करेगी ।
० उपर्युक्त स्थल कहां हो सकता है ।
– भौगोलिक दूरी के हिसाब से काठमांडू के आसपास ही राजधानी होना ठीक है । लेकिन यहां केन्द्रीय राजधानी भी है, इसीलिए काठमांडू उपर्युक्त नहीं है । काभ्रेपलाञ्चोक जिला के कोई भी उपर्युक्त स्थान में ३ नम्बर प्रदेश की राजधानी हो सकती है । बनेपा, धुलिखेल, पाँचखाल अथवा भकुण्डेबेसी कहीं भी चयन कर सकते हैं ।
० चुनाव में वोट माँगते वक्त आपने जनता के बीच कई आश्वासन दिया होगा, अपने चुनावी क्षेत्र के लिए कैसी योजनाएं है ?
– चुनाव के समय में संयुक्त वाम गठबन्धन ने जो घोषणापत्र तैयार किया था, उससे ज्यादा मैंने कोई भी गलत आश्वासन नहीं दिया है । घोषणापत्र में हम लोगों ने ५ साल ३ साल और २ साल के लिए कुछ कार्ययोजना प्रस्तुत किया है । अपने चुनावी क्षेत्र में काम करते वक्त मैं वही घोषणापत्र को आधार बनाता हूं ।
० कुछ तो बताइए क्या–क्या करनेवाले हैं ?
प्रदेशसभा की प्रथम बैठक सम्पन्न हो चुकी है । लेकिन प्रदेशसभा द्वारा निर्माण होनेवाले बजट, नीति तथा कार्यक्रम और उसकी कार्यान्वयन संबंधी अवधारणा आदि विषयों में तो विचार–विमर्श होना ही बाकी है, जहां मैं सक्रिय भूमिका निर्वाह करुंगा । सुनकोशी गांवपालिका का अधिकांश भूभाग मेरे निर्वाचन क्षेत्र में पड़ता । स्मरणीय बात यह भी है कि सुनकोशी गांवपालिका का अधिक भूभाग दुर्गम क्षेत्र अन्तर्गत पड़ता है । साथ में जिला सदरमुकाम स्थित कमलामाई नगरपालिका के कुछ वार्ड भी मेरे निर्वाचन क्षेत्र अन्तर्गत पड़ता है । इसीलिए पूरे जिला में प्राप्त होनेवाली सेवा–सुविधा को अधिक प्रयोग करनेवाले और न्यून प्रयोग करनेवाले जनता मेरे चुनावी क्षेत्र में रहते हैं । इसके बीच सन्तुलन बनाना मेरे लिए चुनौती है । सुनकोशी गांवपालिका के अधिकांश गांव में सड़क नहीं है । कमलामाई नगरपालिका के कुछ वार्ड भी वैसे ही हैं । निर्वाचन क्षेत्र केन्द्रित रहकर काम करते वक्त मैं इन्हीं कामों को प्राथमिकता दूँगा ।
दूसरी बात, समग्र जिला के लिए ही महत्वपूर्ण स्थान मानेजाने वाला सिन्धुलीगढी भी यही है । पर्यटकीय स्थल के रूप में इसका विकास किया जा रहा है । इसके लिए प्रारम्भिक काम शुरु हो चुका है । उसके लिए कमलामाई नगरपालिका की ओर से एनआरएन के साथ एक सम्झौता की गई है । सम्झौता अनुसार ६ महीने के भीतर मास्टर प्लान सहित एक रिपोर्ट प्राप्त होनेवाला है । उसके बाद निजी क्षेत्रों से सहकार्य कर सिन्धुलीगढी में स्थित ऐतिहासिक भवन पुनर्निर्माण, संग्राहालय स्थापना, पिकनिक स्पॉट निर्माण, होटल और रिसोर्ट सञ्चालन का काम शुरु किया जाएगा । इतना ही नही, सिन्धुली जिला होते हुए सुनकोशी नदी बहता है । यहां ‘जल–पर्यटन’ अर्थात ‘¥याफ्टिङ’ की सम्भावना अधिक है । हाइड्रोपावर निर्माण की सम्भावना भी अधिक है । इसीतरह धार्मिक सम्पदा भी है, जहां धार्मिक पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है ।
० अंत में कुछ कहेंगे ?
– आपने शुरु में ही कहा था कि हिमालिनी मधेश और मधेशी जनता केन्द्रित मुद्दों को प्राथमिकता देती है । इसीलिए मधेश और एमाले के बारे में ही कुछ कहना चाहता हूं । मधेश में एमाले विरुद्ध दुष्प्रचार किया जा रहा है । एमाले को मधेश विरोधी पार्टी कहा जा रहा है । यह शत–प्रतिशत गलत प्रचार है । इस तरह के गलत प्रचार के भ्रम में न आने के लिए मैं मधेशी जनता से आग्रह करता हूं । उसके लिए एमाले नेताओं के भाषण और मेरी अन्तरवार्ता को ही विश्वास करना पड़ेगा, मैं यह नहीं कहता हूं । मैं यह कहता हूं कि जिस वक्त एमाले सरकार में थी, उस वक्त मधेश और मधेशी जनता के लिए क्या किया ? और जिस वक्त खुद को मधेशवादी कहनेवाले दल और नेता सरकार में थे, उस वक्त उन लोगों ने क्या किया ? निष्पक्ष होकर इस में तुलनात्मक अध्ययन किया जाए । आप को जो सत्य मिलेगा, उसी में विश्वास कीजिए । मैं तो कहता हूं कि आज आप जिन लोगों को मधेशवादी नेता कहते हैं, उन लोगों में मधेश और मधेशी जनता के लिए कोई भी प्रेम–भाव नहीं है, सम्मान नहीं है । अपनी राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए वे लोग मधेश मुद्दा को गलत व्याख्या कर जीवित रखना चाहते हैं । जिसके लिए वे लोग पहाड़ी समुदाय और शासन–सत्ता के विरुद्ध गलत प्रचार करते हैं । मधेशवादी नेता जो कुछ कहते हैं, आंख मूंद कर उस में विश्वास मत कीजिए । उनकी कथन में कितनी सत्यता है, उन लोगों का चरित्र और इतिहास क्या है, इसमें अध्ययन कीजिए । सत्य सामने आ जाएगा । ऐसा करने से खराब नेता भी झूठ बोलने से डरते हैं, सुधरते हैं । आप लोगों को भी असल नेता मिल सकता है । मैं तो कहता हूं– समृद्ध मधेश चाहते हैं तो आप लोगों को एमाले पर ही विश्वास करना पड़ेगा ।

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