दहेज से अभिशप्त नेपाली नारी

जब सास भी दहेज नहीं लेना चाहेगी तभी सामाजिक कूरीतियों के रेगिस्तान के स्थान पर आशा का पुष्प खिल सकना संभव हो सकेगा ।

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रूपा लोहनी
नेपाली समाज के कार्य परंपरा पूर्वाग्राहों में, दहेज का पूर्वाग्रह काफी प्रबल रहा है । समाज के रीति रिवाजों और व्यक्ति के संस्कारों ने मिलकर दहेज के लिए एक ऐसी उर्वराभूमि तैयार कर दी है कि सबल जनमत एवं कठोर कानून के होते हुए भी, यदि अनुपात की दृष्टि से देखा जाये तो यह प्रथा आज भी सुरसा की तरह मुंह बाये हुए समाज को निगल रही है । आधुनिकीकरण के इस युग में इस कुरीति को समूल उखाड़ फेंकने के लिए कई अभियान हुए, समाज सुधारकों के सशक्त प्रयत्न हुए, फिर भी पूरी सफलता नहीं मिल सकी । आखिर क्यों ? क्योंकि जिस स्तर पर वैचारिक क्रांति और सामाजिक जागृति होनी चाहिए थी, न तो वह हुई और न कानून ने कोई ठोस कदम उठाए । सच तो यह है कि केवल कानून का स्पर्श सामाजिक जड़ता की अहिल्या को प्राणदान नहीं दे सकता । कानून से सामाजिक मोर्चा सबल होना चाहिए, इसके लिए सामाजिक शिक्षण, चेतना और मानसिक तैयारी की आवश्यकता होती है । मनस्तत्व के आमूल परिवर्तन की अनिवार्यता होती है । और जब तक सामाजिक स्तर पर दहेज के रावण के साथ जनतारूपी राम का युद्ध नहीं होता, दहेज की लंका भस्म नहीं हो सकती है ।

आत्मनिर्भरता, उनके स्वतन्त्र विचार, नयी चेतना, जागृति, नयी विचारधाराएं, अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता आदि कुछ ऐसे ही नये क्षितिज हैं जो शायद भविष्य में दहेज प्रथा का दमन कर सकें । परिवार में सुख और शांति को ला सकें । दहेज के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हानिकारक परिणामों से समाज को छुटकारा दिला सकें ।
दहेज शब्द से अभिप्राय क्या है ? वास्तव में वर पक्ष कन्या पक्ष से जिस धन की मांग करता है उसी को दहेज कहते हैं । कन्या को मां–बाप अपनी इच्छा से अपनी बेटी को जो कुछ भी देते हैं, वह दहेज की परिभाषा में नहीं आता । यह एक वास्तविक प्रवृत्ति है कि हर मां–बाप अपनी बेटी का यथासम्भव विवाह के अवसर पर और बाद में भी, अपनी शक्ति अनुसार ‘उपहार’ देते रहना चाहते हैं । इससे उन्हें एक प्रकार का आत्मीय सुख मिलता है । यह सुख गले से निकला हुआ कोरा शब्द नहीं होता, हृदय से निकली हुई सच्ची अनुभूति, भावनाओं से भीगी हुई स्नेहिल ध्वनि होती है, किन्तु यही उपहार वर पक्ष की ओर से मांगे जाने पर कलेजे का पत्थर और मन का बोझ बन जाते हैं जो वधू के लिए जीवन पर ग्लानि, वर पक्ष के लिए रोष और कन्या पक्ष के लिए अभिशाप का विषय बनकर रह जाते हैं । कानून धरा का धरा रह जाता है क्योंकि दहेज मांगने वालों ने कानून की आंख में धूल झोंक कर दहेज मांगना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लिया है और दहेज देने वालों ने इसे अपनी नियति मानकर गर्दन झुका दी है । दहेज का धन्धा अभी खुलमखुल्ला चलता है । प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कन्या पक्ष से पूछ लिया जाता है– ‘कितने का ब्याह करेंगे, नगद कितना मिलेगा’ आदि–आदि । दहेज की यह राशि लड़की को नहीं लड़की की सास को मिलती है और यदि इसमें कहीं व्यतिक्रम हो जाए तो सास कहने में तनिक–सा संकोच नहीं करेगी– ‘बेटी वालों ने दिया तो अपनी बेटी को दिया, हमें क्या मिला !’
दहेज लेने वालों की मजबूरी यह है कि यदि वे दहेज न मांगे तो अपने बेटे पर किया हुआ खर्च कहां से और कैसे वसूल करें । इसके अतिरिक्त बेटी की ससुराल से मिले हुए धन से अपनी बेटी के विवाह का खर्च निकालने की अभिलाषा रखने वाले भी कम नहीं है । लड़की वालों की मजबूरी यह है कि वे दहेज देकर अपनी बेटी के लिए खुशियां खरीद लेना चाहते हैं । दहेज न लाने पर सास, ससुर और पति के व्यंग्य–वाणों की वर्षा बेटी पर हुए बिना नहीं रहेगी, इस आशंका से भयभीत होकर वे ‘तेते पाव पसारिये, जेते लंबी सौर’ कहावत भी भूल जाते हैं । और फिर जिन्दगी भर कर्ज की भूल–भुलैया में भटकते रहते हैं । जिनके तीन चार लड़कियां हैं, उन मध्यम वर्ग के माता–पिता का तो कहना ही क्या ? जिनका बेटा जितना योग्य होगा, सौदा उतना ही महंगा होगा । दहेज की विभीषिका ने विवाह को एक ऐसा व्यवसाय बना दिया है कि बेटे वाले सदा फायदे में और बेटी वाले सदा नुकसान में ही रहते हैं । समाज में मानों एक होड़ और प्रतिस्पर्धा की लहर–सी उत्पन्न कर दी है दहेज ने, जिसकी बहु कितना दहेज लायी चर्चा का विषय बनता है और फिर दहेज की दौड़ भी किसी भी घुड़दौड़ की कालाबाजियों को परास्त करती हुई बहुत आगे निकल जाती है । लड़के रूपी चेक का भुगतान करके माँ–बाप हर्ष और उल्लास के समुद्र में गोते लगाते हैं । मुफ्त में मिले माल पर गुलछर्रे उड़ाकर इठलाने में अपनी शान समझते है । उधर लड़कीरूपी डिग्री को देखकर मां–बाप अपने भाग्य को कोसते हुए शोक के सागर में डूबे रहते हैं । शायद तभी तो आज भी कई घरों में पुत्री जन्म पर घर की बड़ी–बूढि़यां कहे बिना नहीं रहती कि यह पत्थर कहां से आ टपका !
परिवार नियोजन अभियान के बावजूद चार–पांच कन्याओं के बाद भी ‘पुत्ररत्न’ पाने की ललक और कसक बनी रहती है पर तीन–चार पुत्रों के बाद पुत्री की अभिलाषा विरले ही कहते हैं । कन्या के लिए ‘घर भी खाली’, ‘पराया धन’ आदि शब्दों एवं कहावतों का चलन शायद दहेज के सताए मां–बाप द्वारा ही हुआ होगा । पर वे बेचारे करें भी तो क्या करें । उनकी स्थिति ‘इधर खाई तो उधर कुआं’ वाली होकर रह गई है । जब तक सामाजिक स्तर पर दहेज के विरुद्ध मोर्चा तैयार नहीं किया जाएगा, उनकी स्थिति में सुधार होना आकाश–कुसुम–सा दुर्लभ है । जब सामाजिक–सांस्कृतिक विप्लव होंगे तभी दहेज की यह घातक प्रथा दूर हो सकेगी । स्त्रियों के नये विकास की आधारशिला, उसका मूलमंत्र है– सामाजिक चेतना, केवल कानून नहीं है ।
वास्तव में दहेज एक भीषण सामाजिक रोग है । इसलिए यह अनिवार्य हो जाता है कि इस रोग की चिकित्सा भी उसी स्तर पर हो । केवल माँ के दहेज न देना चाहने पर यह कुरीति दूर नहीं होगी । जब सास भी दहेज नहीं लेना चाहेगी तभी सामाजिक कूरीतियों के रेगिस्तान के स्थान पर आशा का पुष्प खिल सकना संभव हो सकेगा । ग्रामीण एवं अशिक्षित वर्ग में तो यह समस्या और भी वीभत्स रूप में प्रचलित है । इस वर्ग की जनता के लिए किसी ठोस माध्यम की जरूरत है । चलते–फिरते समाज–सुधारकों के दस्ते हों जो अलग–अलग गांवों व कस्बों में जाकर उन्हें दहेज के दुष्परिणामों से अवगत कराएं, उनमें जागृति पैदा करें । सम्पूर्ण सामाजिक ढांचे में आमूल परिवर्तन अवश्यम्भावी है तभी कमर–तोड़ दहेज प्रथा का अंत हो सकता है अन्यथा केवल कानून की दुहाई बालू से तेल निकालने के समान निरर्थक ही साबित होगी । नई पीढ़ी के लड़के और लड़कियां दहेज जैसी रुढि़ग्रस्त दकियानुसी ख्यालों को तिलांजलि देने को कटिबद्ध हों चाहे इसके लिए उन्हें पुरानी पीढ़ी का विरोध ही क्यों न कराना पड़े, तभी आशा की किरण चमक सकती है । समाज में नये दृष्टिकोण के आयाम स्थपित हो सकते हैं और नई संभावनाएं, प्रेम–विवाह, दहेज मांगने वालों से विवाह–विच्छेद का संकल्प, विवाह को ही अपनी नियती न मान लेने का उनका निर्णय, लड़कियों की उच्च शिक्षा एवं उनकी आत्मनिर्भरता, उनके स्वतन्त्र विचार, नयी चेतना, जागृति, नयी विचारधाराएं, अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता आदि कुछ ऐसे ही नये क्षितिज हैं जो शायद भविष्य में दहेज प्रथा का दमन कर सकें । परिवार में सुख और शांति को ला सकें । दहेज के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हानिकारक परिणामों से समाज को छुटकारा दिला सकें ।
अनुवाद– विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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