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मेरी पश्चिम नेपाल की यात्रा

Damauli-Bazar

phpto source: dctanahun.gov.np

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
विगत नवंबर महीने में जब ज्योतिर्लिङ्ग रथ यात्रा सुदूर पश्चिम से पूर्व झापा जिले तक के लिए संचलित हो रही थी, तब मुझे भी एक पत्रकार के रूप में उसके साथ यात्रा में शामिल होने का न्योता मिला । यह जीवन का ऐसा पहला अवसर था, जिसमें एक सहयात्री के रूप में चलते हुए पत्रकारिता धर्म का भी निर्वाह करना था । दो सप्ताह की इस धार्मिक यात्रा में मुझे देश के विभिन्न पश्चिमी जिलों के भूगोल से परिचय प्राप्त करते हुए एक नियात्री के रूप में देश के हरे–भरे क्षेत्र, हिमश्रृंखलाओं से सुशोभित प्रदेशों, नदियों की उफनती लहरें, पहाड़ों से बहती मनमोहक ठंढी हवाएं और मठ–मंदिरों से संचारित पावन वातावरण से प्रभावित होने का अवसर मिला । हर मोड़Þ मन को छूने से नहीं चुकते । अतः मुझे पर्यटक की दृष्टि से यात्रा का भरपूर आनंद उठाने का मौका मिला । हमारी यात्रा सबसे पहले गण्डकी अंचल स्थित तनहुं जिले के सदरमुकाम दमौली की हुई, जो प्राकृतिक सुंदरता की दृष्टि से एक बहुत ही महत्वपूर्ण, रमणीय पर्यटकीय और धार्र्मिक स्थल है । प्रकृति की सुंदर छटा के बीच बहती मादी और सेती नदियों के संगम तट पर छठ के पावन अवसर पर बने पंडाल में हो रहे कीर्तन और सूर्य देव को अर्घ देती महिलाओं के द्वारा भक्तिभाव से की जा रही पूजा में दर्शनार्थी के रूप में उपस्थित होने के अवसरों नें मन को आह्लादित किया ।
काठमांडू से लगभग ४घंटे २० मिनट की निर्वाध बस यात्रा के बाद जब हम लोग वहां पहुंचे तो निकट के पहाड़ों से बहती शीतल हवा ने हमें जो ताजगी प्रदान की उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है । ज्योतिर्लिङ्ग रथयात्रियों की टोली की उपस्थिति के कारण वातावरण में धार्मिकता का संचार भी हो रहा था । दिन भर की थकान मिटाने के बाद दूसरे दिन प्रातःकाल हम लोग समीप ही अवस्थित व्यास गुफा देखने गए, जहां निवास करते हुए महर्षि वेदव्यास ने १८ पुराणों और ४ वेदों की रचना की थी । व्यास गुफा की अपनी सुंदरता है, विशेषताएं हैं और धार्मिक एवं पर्यटकीय महत्व भी है । पौराणिक महत्व प्राप्त इस गुफा को, जो सुबह की बेला में भी अंधेरा दिखता था, देखते हुए यह पंक्तिकार इस कल्पना में डूब गया कि पौराणिक युग में, जब यह स्थल दुर्गम और साधनहीन अवस्था में था, महर्षि ने पौराणिक महत्व के इतने सारे कालजयी ग्रंथों की रचना कैसे की होगी ? व्यास गुफा का अवलोकन करते समय शिव पांचायन मंदिर संरक्षण समिति के प्रमुख संरक्षक शान्तिस्वरूपानन्द श्री दामोदर बाबा से मुलाकात हुई । जब हमने उनसे व्यास गुफा के संबंध में पूछा तो वह कहने लगे–‘ तनहुं जिले की यह पावन भूमि २८वें वेदव्यास का जन्म स्थल है । २८वें व्यास श्रीकृष्ण द्वैपायन माने जाते हैं । इसी प्राकृतिक गुफा में रहकर उन्होन्ने १८ पुराणों और ४ वेदों की रचनाएं की । हमने वेदव्यास के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के सिलसिले में भारत से २८ विभिन्न वेदव्यासों की मूर्तियों को संकलित करने और १२करोड़ वर्ष इधर के इतिहास का अन्वेषण करते हुए उन्हें स्थापित करने का कार्य संपन्न की है ।’ मादी और सेती नदी के तट पर अवस्थित इस गुफा की सुंदरता भी अलौकिक है । मन को मोह लेती है । गुफा के शिलाखण्डों पर उभरी छवियां तो विस्मित कर देती हैं ।
वहां हम लोगों ने एक पृथक कक्ष में रखी गई उन सभी २८ वेदव्यास की मूर्तियों के भी दर्र्शन किए जिसका विवरण श्री दामोदर बाबा ने हमें दिया था । दमौली में पराशर ऋषि की स्मृति में भी एक आश्रम बनाया गया है । साथ ही वहां श्री सत्य साईं बाबा केन्द्र की भी स्थापना की गई है । पराशर आश्रम के पास से बहती मादी नदी के तट पर बिखरे शालिग्राम के बड़े–बड़े शिलाखण्डों से हमें पराशर आश्रम के एक सदस्य श्री बस्नेत ने परिचित कराया, जिनके ऊपर बहती जलधारा के हिल्लोल से देवी–देवताओं की छवियां उभरी दिखाई देÞती थी । श्री बस्नेत ने जब शालिग्राम के उन शिलाखण्डों पर उभरे इन छवियोेंं से परिचित कराया तो दांतों तले उंगली दबाने की नौबत आई । इसके अतिरिक्त उन्होन्ने इस पंक्तिकार को कुछ ऐसे शालिग्राम भी भेंटस्वरूप दिए जो दुुुर्लभ रंग और आकार–प्रकार के थे ।
वेदव्यास के प्रति स्थानीय लोगों की श्रद्घा और आस्था के प्रतीक के रूप में वहां महर्षि वेदव्यास विद्याश्रम की भी स्थापना की गई है । इसके प्रमुख संरक्षक व्यास–तपस्वी श्रीऊंनाथ पांडे और संरक्षक शान्तिस्वरूपानन्द श्री दामोदर बाबा हैं । दमौली २८वें वेदव्यास की जन्मभूमि होने की मान्यता होने के कारण इस नगर को महर्षि व्यास के नाम पर समर्पित करते हुए व्यास नगरपालिका के अधीन रखा गया है ।
पर्यटकों के ठहरने के लिए यहां छोटे–बड़े होटलों के अलावा थ्री स्टार होटल भी है । तनहुं जिले को महर्षि वेदव्यास की भूमि होने के अतिरिक्त नेपाल के आदिकवि और नेपाली भाषा में अध्यात्म रामायण के रचयिता भानुभक्त आचार्य की जन्मभूमि होने का भी गौरव प्राप्त है । इस प्रकार इस जिले को नेपाल के इतिहास में दो–दो महारथियों की जन्मभूमि होने का विशेष स्थान प्राप्त है ।
दमौली कीे यात्रा पूरी कर हम लोग लगभग ५१ कि.मी. की दूरी पर अवस्थित पर्यटकीय नगरी पोखरा के लिए रवाना हुए । दमौली से लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा करते हुए जब हम लोग इस रमणीय नगर में पहुंचने लगे तोें दूर से ही माछापुच्छ«े पर्वत हमें इस प्रकार निहार रहा था मानो वह हमें पूछ रहा हो आने में क्यों देरी हो रही है ? अन्नपूर्ण और धौलागिरी पर्वतों की हिमश्रृंखलाएं तो बाहें फैलाए हमारे स्वागत में खड़ी प्रतीत हो रहीं थी । पंक्तिकार के द्वारा हिमालिनी के नवंम्बर अंक में इस पर्यटकीय नगरी के संबंध में अपनी यात्रा संस्मरण प्रस्तुत करते समय वहां के प्रसिद्घ गुप्तेश्वर गुफा की चर्चा करने के बावजूद स्थानाभाव के कारण विस्तार में लिखना संभव नहीं हो पाया था, जिसे इस अंक में उल्लेख करना धार्मिक एवं पर्यटकीय दृष्टि से भी सांदर्भिक होगा । किंवदन्ती के अनुसार गुफा के अंदर विद्यमान शिवलिंग की उत्पत्ति स्वयम् में एक अलौकिक घटना थी, जिसके संबंध में जानकारी मिलने के बाद उसे गुफा मंदिर के रूप में विकसित करना स्थानीय लोगों में विद्यमान आस्था को प्रकट करता है । बाद में वहां पूजादि होने लगी । कई छोटी–बड़ी सीढि़यों से नीचे उतरते हुए गुफा में प्रवेश करना पड़ता है । शिवलिंग के दर्शन से पूर्व हम लोगों का साक्षात्कार मूर्तिवत् कामधेनु गाय से होती है । वहां एक पात्र रखी गई है, जिसमें कंचे के आकार की एक गोली को उसमें गिराने पर कामधेनु गाय के ऊपर दूध की धारा बहती है, जिसे हाथ में लेकर गाय के कान के ऊपर छिड़कते हुए अपने सिर पर सेचन करने के बाद गुफा के अंदर दूसरे कक्ष में विद्यमान बिशाल आकार के शिवलिंग का दर्शन हो पाता है ।
इस बार की पोखरा यात्रा में एक नई अनुभूति हुई । कास्की जिले के इस सदरमुकाम में ढुंगासाधु नामक स्थल पर राष्ट्रीय परोपकार महासंघ नामक एक संस्था कार्यशील है । उसके द्वारा वैदिक गुरुकुल आश्रम का संचालन किया जा रहा है, जिसमें देश के विभिन्न कोने से आए लगभग ५० छात्र संस्कृत के अलावा आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त कर रहे है । हमें इसका अवलोकन भी करने का अवसर मिला । रात हमने वहीं बिताई । खाना–पीना भी वहीं हुआ । महासंघ के संचालक भागवत भाष्कर गुरुदेव श्री कमल नयन गौतम के द्वारा कपास से बनवाई गई ८ लाख बत्तियां महासंघ के प्रांगण में निर्मित शिवालय में प्रज्ज्वलन करने के कार्यक्रम में सहभागी होने के लिए हम लोगों को आमंत्रित किया गया था । नेपाली समाज में धार्मिक भावना रखने वाले व्यक्ति प्रायः एक लाख बत्ती का प्रज्ज्वलन किसी मंदिर के प्रांगण या धार्मिक स्थलों पर किया करते है । पर इतने वृहत स्तर पर ८ लाख बत्ती का प्रज्ज्वलन कार्यक्रम में उपस्थित होना इस पंक्तिकार के लिए एक नया सुखद अनुभव था ।
पोखरा की यात्रा के बाद हम लोग बुटवल के लिए प्रस्थान हुए । बुटवल की यात्रा विगत वर्षों में इस पंक्तिकार ने कई बार किया था । पर इस बार की यात्रा ने बुटवल के साथ उज्जैन के राजा भर्तृहरि के साथ के संबंध में जानने और उनकी स्मृति में बनी सिद्वबाबा धाम में श्रद्वापूर्वक सिर झुकाने का भी अवसर दिया । सिद्वबाबा धाम सिर्फ बुटवलवासियों के लिए ही नहीं अड़ोसपड़ोस के इलाके और समीपवर्ती भारतीय क्षेत्र के लोगों के लिए भी एक धार्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्व है । क्योंकि इसकी प्रसिद्वि एक सिद्वपीठ के रूप में चारो ओर फैली हुई है और इसका संबंध उज्जैन के प्रतापी राजा भर्तृहरि के साथ है । इसके अलावा लुम्बिनी अञ्चल के विभिन्न जिलों के कई स्थलों में उनकी ही स्मृति में सिद्वबाबा, सिद्वेश्वर तथा सिद्व के नाम से कई मठ,धाम और गुफाएं हैं । सिद्वबाबा क्षेत्र में निर्मित सिद्वबाबा धाम (शिव मंदिर) एवं सिद्वगुफा में प्रतिदिन भक्तजन सिद्वबाबा की पूजा आराधना के लिए पंक्तिवद्व होते हैं । इससे इस क्षेत्र में सिद्वबाबा की महिमा का भी ज्ञान होता है । सड़क मार्ग से जुटे और रेल मार्ग के निकट अवस्थित होने के कारण बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए बुटवल में कई सुविधासंपन्न गेष्ट हाउस के अलावा उच्च स्तरीय होटलें भी हैं । आधुनिकता भरी इस नगरी में घूमने के लिए परिवहन की भी अच्छी व्यवस्था है । व्

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