संसार में मेरा कौन ?

संसार में मेरा कौन है ? यह प्रश्न है तो भाई ! इसका असली उत्तर यह है कि मेरा भगवान के सिवा कोई नहीं, ये दोनों चीजे मेरा कोई नहीं और मैं किसी का नहीं मानने की है । एक बड़ी सुन्दर बात यह है कि जब तक जिस को (मेरा) कहनेवाले अधिक होते हैं, तब तक इस बात में एक बड़ी बाधा रहती है कि भगवान उसे ‘मेरा’ कह दे और जब तक बहुत सी वस्तुओं में ‘मेरापन’ रहता है, तब तक भगवान को ‘मेरा’ कह दे, इसमें भी बाधा रहती है दोनों चीजे विचारने की है । भाई ! हमारे इतने स्नेही मानते है, ये अभिमान बोलता है, मोह बोलता है । वह तब तक ऐसा मानता है कि संसार में मुझ को मेरा कहनेवाले बहुत हंै, तब तक भगवान उसको ‘मेरा’ कहने में सकुचाते हैं, क्योंकि वह भगवान का एकाधिपत्य अपने ऊपर स्वीकार नहीं करता, वह कहता है कि मैं बहुतों का मेरा हूं तो केवल भगवान का मेरा – यह क्यों ?

जब तक मुझ पर विपत्ति आयी, तब मेरे मन में यह आया कि मुझे अब ‘मेरा’ कौन कहेगा ? उसके बाद ही ऐसी चीज घटी कि भगवान ने ‘मेरा’ कह दिया, बड़ा अच्छा, बड़ा अच्छा । अगर ये सत्य है तो इतनी अच्छी बात है कि यहां के ‘मेरे’ कहनेवाले अगर को भी न रहे और न ही रहने चाहिए । नहीं कहने का अर्थ ये नहीं कि ये वे सब मर जाए, ये अर्थ नहीं– ‘अपने प्रति उनका मेरा भाव छूट जाए ! जब तक मेरा कहनेवाले बहुत लोगों का दल रहता है, बहुत लोग कहते हैं– ये मेरा, ये मेरा तब तक भगवान कहते हैं– इनके बने रहो अब, हमारे अकेले के तो तुम बनना चाहते नहीं, तुम को हम कैसे मेरा कहे ? और दूसरी बात हम बहुत चीज को मेरी–मेरी कहते है, ये मकान मेरा, ये धन मेरा, ये पुत्र मेरा, ये जमीन मेरी, ये कीर्ति मेरी, नाम मेरा, यश मेरा, न मालूम कितनी–कितनी लाखों–करोड़ो वस्तुओं में हमारा मेरापन फैला हुआ है, तब तक हम निश्चित रूप से भगवान से खुलकर कैसे कहे दे कि तुम ही मेरे हो ? तम तो बहुतों को मेरा मान रहे हो ना । तुम तो न मालूम कितने जगह बिखरे पड़े हो ? तो उन्ही में तुम हम को भी मेरा मानना चाहते हो तो मुझे अपना अधिकार पूरा कर लेने दो या मेरे पर तुम पूरा अधिकार कर लो । अधूरा नहीं, या तो तुम केवल मेरे बन जाओ, तुम पर पूर्णधिकार हो जाए, तुम को मेरा कहनेवाला मेरे सिवाय कोई रहे नहीं । मुझ को ही मेरा मान लो, और किसी वस्तु में, मेरापन मत रखो ।
जगत में जहां मेरापन कहते है, जगत में जहां हम अपने को किसी का मेरा बनाते हैं, ये दोनों ही हमारे लिए खरतानाक चीज है, भ्रान्ति है । भगवान के नाते सब को मेरा कहे, इसमे कहता है– ‘मेरा, शब्द कहने में कोई आपत्ति नहीं, शब्दों से डरना और शब्द को बदल लेना, सूत्र नहीं बदलता । इससे हम बोले कि ये शरीर इस पार जाएगा और हम कहे कि हम उस पार जाएंगे, इस में कोई भी गड़बड़ी नहीं है, चाहे शरीर कहे और चाहे ‘म’ मैं कहे, पर शरीर में ‘म’ बना है और शरीर हम अलग कहते है तो कोई बात नहीं और इस ‘म’ में अगर ‘मैं’ नहीं है और मैं कहते हैं तो कोई आपत्ति नहीं, ये बात नहीं भाषा से कुछ बनता–बिगड़ता नहीं । असल में भाव से होता है । संसार की वस्तुएं रहे कोई आपत्ति नहीं उनका हम उपयोग भी करे, उनकी संभाल भी करे, पर करे वैसे ही जैसे मैनेजर अपने मालिकी वस्तु की करता है ।
इसीलिए मुझे कहना है कि संसार में किसी का कोई नहीं है, जब हमारी छाया भी साथ छोड़ देती है, तब दूसरा हमारा साथ क्या जा सकता है । मनुष्य का भ्रमजाल को छोड़ कर कुछ न कुछ भगवत भजन का आर्जन कर लेना चाहिए ताकि आगे हमारे काम आवे । क्योंकि गीता के अनुसार पूर्व जन्म सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं, संसार में भगवान का सिवा कोई नहीं ।
नहीं धन में नहीं पारस, हरि बिनू को परि है मेरा सोवारथ ।

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