महिला सशक्तिकरण : डॉ. दिग्विजय शर्मा

समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी ।

आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी ।

डॉ. दिग्विजय शर्मा

हिमालिनी मार्च २०१८ अंक | समाज में महिला और पुरुष की भूमिका इतनी अहम है कि अगर एक भी अपने संस्कारों और कर्तव्यों से भटक जाए तो समाज का मजबूत ढांचा भी खोखला होने लगता है । वर्तमान का सामाजिक ढांचा हमारी आने वाली पीढ़ी के बदलाव का घोतक है । पीढ़ी कैसे बदलेगी यह हम बड़ी आसानी से अपने समाज का अध्ययन करके पता कर सकते हैं । आज अपने समाज पर प्रकाश डाला जाए तो समाज महिला और पुरुष के बीच में होड़ की, उनकी श्रेष्ठता की, उनके हकÞ की और खुलेपन की कहानी बयां करता है जिससे यह पता चलता है कि बंधन नाम की कोई चीजÞ इस जग में बची ही नहीं । इन दोनों की मैं–मैं ने समाज से “हम की भावना” खत्म कर दी है और जबसे हम की भावना का कत्ल हुआ तब से दया, संस्कार, परोपकार और जजÞ्बातों का हमारी पीढ़ी में रत्ती भर भी अंश नही दिखता । यह इतनी खोखली पीढ़ी है कि यह हर चीजÞ को पराकाष्ठा पे ले जाकर तबाह कर देती है तो फिर सोच के डरिये की आने वाले कुछ सालों में समाज का यह धुंधला शीशा टूट कर कितना चकनाचूर होकर समाज को बेरहमी से चुभेगा । दया पाखंडी हो गयी । संस्कार व्यावसायिक हो गए । परोपकार स्वार्थी हो गए और जजÞ्बात खोखले हो गए । फिर लोगों में बचा क्या ? सिर्फ झूठी तसल्ली देने वाली अल्पकालीन संतुष्टि । इस विलासिता की डगर पे चलकर मानव जीवन अस्त व्यस्त हो चुका है । प्रकृति ने हमें तीन भोग दिए । पहला प्रेम, दूसरा वासना और तीसरा आसक्ति । प्रेम निर्मल था । वासना भी उपासना थी और आसक्ति दैवीय थी । पर वर्तमान में सब उल्टा पुल्टा घटित हो रहा है । आसक्ति मटमैली हो गयी । वासना जुनून बन गयी और प्रेम संभोग बन गया । बस यही हम अपनी पीढ़ी को दे रहे हैं और वह समाज में कुरीतियां फैला रही है । यह संतुष्टि की चाह कच्ची उम्र से लेकर अधेड़ उम्र तक के लोगों पर सावन के घनघोर बादलों की तरह इस प्रकार बरस रही है कि लिहाजÞ नाम का संस्कार बाढ़ में बहकर कहीं दूर निकल चुका है । आखिर इसकी वजह क्या है ? इसकी वाजिव वजह यह है कि माँ बाप एक छत के नीचे रहते हुए भी विचारधाराओं से अलग अलग हैं । परिवार के प्रति लगन और जिÞम्मेदारी अब खत्म होने लगी है । रिश्तों के बीच अहम की दीवार खड़ी है तो परिवार स्वस्थ कैसे रहे । “एक ने कही दूसरे ने मानी” यह बात हो गयी अब पुरानी । यही कारण है कि छोटे बच्चे मन हल्का करने के लिए अपनी बात किससे कहें । यहीं से वो भटकना शुरू करते हैं । जब उन्हें घर के क्लेशों में प्यार नही मिलता तो वह बाहर भागते हैं और भावनाओं की आंधी में बहकर गलत कर बैठते हैं । खासकर छोटी उम्र की बच्चियां जो ज्यादा भावुक होने के कारण जज्बाती सहारा ढूंढती हैं और प्यार लेने देने के चक्कर में कुछ अप्रिय ऐसा घटित होता है कि वो फिर घर और समाज से पृथक होने लगती हैं और मुसीबतों के दलदल से बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल होता जाता है क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में लाज की गाज सिर्फ लड़कियों के सिर पे ही गिरती है। कुछ बेच दी जाती हैं तो कुछ डर के कैद हो जाती हैं । कुछ मार दी जाती हैं तो कुछ का जीवन जिंदा लाश जैसा बन जाता है । कानून की ताकत भले ही लड़कियों के पक्ष में जाये पर समाज का दिया हुआ कलंक वो ताउम्र नहीं धो सकतीं इसलिए प्यार देना किसको है और प्यार लेना किससे है यह किसी से नजदीकी बढ़ाने से पहले सोचना चाहिए । आज प्यार संभोग से शुरू होता है इसलिए इसका वजूद अस्थाई है । प्यार की यही खासियत है कि पराकाष्ठा पे पहुंचकर यह टिकता नहीं । जिस समाज में आत्मीयता कामुकता में दिखती हो वहां गुनाह कम कैसे हो सकते हैं और समाज सुरक्षित कैसे रह सकता है । स्त्री की अहमियत इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुष से कहीं ज्यादा है क्योंकि संस्कार स्त्री से ही पुरुष में जाते हैं । माँ जितनी संस्कारी होगी उसका घर उतना ही बड़ा देवालय होगा और बच्चे समाज की मजबूत नींव । मेरा छोटी उम्र की बच्चियों से अनुरोध है कि आपका शरीर परमात्मा के छोटे अंश आत्मा के रहने का मंदिर है तो कृपया इस मंदिर पे किसी भेडि़ये की वहशी नजÞर, गंदे हाथों और नापाक दांतों की मुहर न लगने दें । आप विधि विधान से जब तक एक दूसरे के न हो जाएं तब तक पराये हाथों को अपनी अस्मिता से न खेलने दीजिये । अस्मिता आपका गहना है। कोई छलिया इस गहने को ठग कर न ले जाये । यह कुछ पल का आनंद आपके पूरे जीवन से खुशियां छीन सकता है । पुरुष को बनाने वाली औरत ही अगर पुरुष द्वारा बर्बाद होगी तो यह समाज प्रकृति के भयानक तांडव को नंगी आंखों से देखने का स्वतः जिÞम्मेदार होगा ।
महिला सशक्तिकरण क्या है ?
महिला सशक्तिकरण को बेहद आसान शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है कि इससे महिलाएँ शक्तिशाली बनती है जिससे वो अपने जीवन से जुड़े हर फैसले स्वयं ले सकती है और परिवार और समाज में अच्छे से रह सकती है । समाज में उनके वास्तविक अधिकार को प्राप्त करने के लिये उन्हें सक्षम बनाना महिला सशक्तिकरण है ।
महिला सशक्तिकरण के नारे के साथ एक प्रश्न उठता है कि “क्या महिलाएँ सचमुच में मजबूत बनी है” और “क्या उसका लंबे समय का संघर्ष खत्म हो चुका है”। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज मे सरकार द्वारा कार्यक्रम चलाए जा रहे और लागू किये गए है । महिलाओं को कई क्षेत्र में विकास की जरुरत है । अपने देश में उच्च स्तर की लैंगिक असमानता है जहाँ महिलाएँ अपने परिवार के साथ ही बाहरी समाज के भी बुरे बर्ताव से पीडि़त है । भारत में अनपढ़ो की संख्या में महिलाएँ सबसे अव्वल है । नारी सशक्तिकरण का असली अर्थ तब समझ में आयेगा जब भारत में उन्हें अच्छी शिक्षा दी जाएगी और उन्हें इस काबिल बनाया जाएगा कि वो हर क्षेत्र में स्वतंत्र होकर फैसले कर सकें ।
भारत में महिलाएँ हमेशा परिवार में कलंक से बचाने हेतु किये गये वध के विषय के रूप में होती है और उचित शिक्षा और आजादी के लिये उनको कभी भी मूल अधिकार नहीं दिये गये । ये पीडि़त हैं जिन्होंने पुरुषवादी देश में हिंसा और दुर्व्यवहार को झेला है । भारतीय सरकार के द्वारा शुरुआत की गयी महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये राष्ट्रीय मिशन के अनुसार २०११ गणना में इस कदम की वजह से कुछ सुधार आया । इससे महिला लिगांनुपात और महिला शिक्षा दोनों में बढ़ोतरी हुई । वैश्विक लिंग गैप सूचकांक के अनुसार, आर्थिक भागीदारी, उच्च शिक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिये भारत में कुछ ठोस कदम की जरुरत है । जरुरत है कि इसे आरम्भिक स्थिति से निकालते हुए सही दिशा में तेज गति से आगे बढ़ाया जाए ।
पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा कहा गया मशहूर वाक्य “लोगों को जगाने के लिये”, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है । एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है । महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रुण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी और ऐसे ही दूसरे विषय । लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर ले आता है जो देश को पीछे की ओर ढ़केलता है । भारत के संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार है ।
लैंगिक समानता को प्राथमिकता देने से पूरे भारत में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है । महिला सशक्तिकरण के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये इसे हर एक परिवार में बचपन से प्रचारित व प्रसारितकरना चाहिये । ये जरुरी है कि महिलाएँ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रुप से मजबूत हो । चूंकि एक बेहतर शिक्षा की शुरुआत बचपन से घर पर हो सकती है, महिलाओं के उत्थान के लिये एक स्वस्थ परिवार की जरुरत है जो राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है । आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी की वजह से कम उम्र में विवाह और बच्चे पैदा करने का चलन है। महिलाओं को मजबूत बनाने के लिये महिलाओं के खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार, लैंगिक भेदभाव, सामाजिक अलगाव तथा हिंसा आदि को रोकने के लिये सरकार कई सारे कदम उठा रही है ।
महिला सशक्तिकरण की दशा और दिशाएं
देश में महिलाओं की समस्याओं का उचित समाधान करने के लिये महिला आरक्षण बिल(ज्ञण्डवाँ संविधान संशोधन का पास होना बहुत जरुरी है ये संसद में महिलाओं की घघ५ हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है। दूसरे क्षेत्रों में भी महिलाओं को सक्रिय रुप से भागीदार बनाने के लिये कुछ प्रतिशत सीटों को आरक्षित किया गया है। सरकार को महिलाओं के वास्तविक विकास के लिये पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में जाना होगा और वहाँ की महिलाओं को सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं और उनके अधिकारों से अवगत कराना होगा जिससे उनका भविष्य बेहतर हो सके। महिला सशक्तिकरण के सपने को सच करने के लिये लडÞिकयों के महत्व और उनकी शिक्षा को प्रचारित करने की जरुरत है ।
लैंगिक असमानता भारत में मुख्य सामाजिक मुद्दा है जिसमें महिलाएँ पुरुषवादी प्रभुत्व देश में पिछड़ती जा रही है। पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है। ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है कि उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। वास्तव में सशक्तिकरण को लाने के लिये महिलाओं को अपने अधिकारों से अवगत होना चाहिये। न केवल घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियों बल्कि महिलाओं को हर क्षेत्रों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। उन्हें अपने आस(पास और देश में होने वाली घटनाओं को भी जानना चाहिए।
महिला सशक्तिकरण में ये ताकत है कि वो समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकें। वो समाज में किसी समस्या को पुरुषों से बेहतर ढ़ंग से निपट सकती है। वो देश और परिवार के लिये अधिक जनसंख्या के नुकसान को अच्छी तरह से समझ सकती है। अच्छे पारिवारिक योजना से वो देश और परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रबंधन करने में पूरी तरह से सक्षम है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ किसी भी प्रभावकारी हिंसा को संभालने में सक्षम है चाहे वो पारिवारिक हो या सामाजिक ।
महिला सशक्तिकरण के द्वारा ये संभव है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के महिला(पुरुष समानता वाले वाले देश को पुरुषवादी प्रभाव वाले देश से बदला जा सकता है। महिला सशक्तिकरण की मदद से बिना अधिक प्रयास किये परिवार के हर सदस्य का विकास आसानी से हो सकता है। एक महिला परिवार में सभी चीजों के लिये बेहद जिम्मेदार मानी जाती है अतस् वो सभी समस्याओं का समाधान अच्छी तरह से कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने से पूरा समाज अपने आप सशक्त हो जायेगा ।
मनुष्य, आर्थिक या पर्यावरण से संबंधित कोई भी छोटी या बड़ी समस्या का बेहतर उपाय महिला सशक्तिकरण है। पिछले कुछ वर्षों में हमें महिला सशक्तिकरण का फायदा मिल रहा है। महिलाएँ अपने स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी, तथा परिवार, देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी को लेकर ज्यादा सचेत रहती है। वो हर क्षेत्र में प्रमुखता से भाग लेती है और अपनी रुचि प्रदर्शित करती है। अंततस् कई वर्षों के संघर्ष के बाद सही राह पर चलने के लिये उन्हें उनका अधिकार मिल रहा है ।
आज महिला सशक्तिकरण की जरुरत है ?
जैसा कि हम सभी जानते है कि हमारा समाज एक पुरुषप्रधान समाज है जहाँ पुरुष का हर क्षेत्र में दखल है और महिलाएँ प्रायः सिर्फ घरपरिवार की जिम्मेदारी उठाती है साथ ही उनपर कई पाबंदियाँ भी होती हैं । ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किये कोई भी देश विकसित हो पायेगा । अगर हमें अपने देश को विकसित बनाना है तो ये जरुरी है कि सरकार, पुरुष और खुद महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाये ।
महिला सशक्तिकरण की जरुरत इसलिये पड़ी क्योंकि प्राचीन समय से हमारे समाज में लैंगिक असमानता थी और पुरुषप्रधान समाज था । महिलाओं को उनके अपने परिवार और समाज द्वार कई कारणों से दबाया गया तथा उनके साथ कई प्रकार की हिंसा हुई और परिवार और समाज में भेदभाव भी किया गया ऐसा केवल यहाँ ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी दिखाई पड़ता है । महिलाओं के लिये प्राचीन काल से समाज में चले आ रहे गलत और पुराने चलन को नये रीति रिवाजों और परंपरा में ढाल दिया गया था । समाज में महिलाओं को सम्मान देने के लिये माँ, बहन, पुत्री, पत्नी के रुप में महिला देवियो को पूजने की परंपरा है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल महिलाओं को पूजने भर से देश के विकास की जरुरत पूरी हो जायेगी । आज जरुरत है कि देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का हर क्षेत्र में सशक्तिकरण किया जाए जो देश के विकास का आधार बनेंगी ।

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