राष्ट्रीय महिला आयोग राजधानी तक ही सीमित हैं : डॉ.रिना यादव

हमे पूर्ण विश्वास है कि देश में सामान्य लोकतंत्र स्थापित हो जाने के बाद राजधानी में रहने वाली शिक्षित, सम्पन्न, सशक्त मुस्लिम महिलाओं की भांति तराई की महिला भी उन्नति मे आएंगी
८ मार्च को नारी दिवस के रूप मेें विश्व के कई देश महिला सशक्तिकरण के रूप में मनाता आ रहा हैं । इस में महिलाओं को सशक्त करने, Rina yadavउन्हे आत्मनिर्भर और जागरुक करने के अनेकों प्रयास और योजनाओं को प्रत्यक्ष रूप से चलाया जा रहा हैं । नेपाल के संदर्भ में देखा जाए तो आधा धरती आधा आकाश के तौर पर आधी जनसंख्या महिलाओं की है । समय–समय पर नेपाल सरकार द्वारा राजधानी में महिलाओं के सशक्तिकरण कार्यक्रमों को सुचारु रूप से चलाया जाता हैं । किन्तु नेपाल में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति के विषय पर किसी को भी सुध लेने की नहीं पड़ी हैं । मुस्लिम महिलाएं आज भी अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा शोषित हैं । वह अपनी पाँचो इन्द्रियों को होते हुए भी इन से विहीन हैं । वे देख समझ सब कुछ रही हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पा रही हैं । ये आज भी अनेकों वर्जनाओं और कुप्रथाओं से दबी हुई हैं । जैसे–परदा प्रथा, बाल विवाह, अशिक्षा, दहेज, तीन तलाक, भ्रुणहत्या आदि । आज भी ये रुढि़वादी परम्पराओं और शरियत सोच से दबी हुईं हैं और पुरुष–प्रधान समाज द्वारा नित मूर्ख बनाकर ठगी जाती हैं । हमारे देश और समाज मे कन्या को ‘पराया धन’ और परिवार पर बोझ ही समझा जाता हैं ।
नेपाल की कुल आबादी २ करोड़ ९० लाख के करीब हैं । इस में ८० फीसदी से ज्यादा हिन्दु हैं । मुसलमानों की आबादी लगभग १० लाख होगी । उस में ९६ प्रतिशत फीसदी मुस्लिम तराई क्षेत्र में और शेष राजधानी काठमाण्डौं और उसके आसपास रहते हैं । तराई नेपाल का एक ऐसा हिस्सा हैं जहां नेपाल की जनसंख्या का आधा से ज्यादा आबादी रहती हैं । परन्तु यहां नेपाल सरकार की सरकारी नीतियाँ सही ढंग से पहुँच ही नहीं पाती क्योंकि तराई को लेकर सरकार के मन में कई विभेदकारी सोच होती हैं । वैसे ही नेपाल देश में राष्ट्रीय महिला आयोग मात्र राजधानी तक ही सीमित हैं । दुखद हैं कि अन्य जिलों में इसकी कोई कार्यकारिणी शाखाएं नही हैं और यही कारण भी है की राजधानी छोड़कर अन्य जिला, राष्ट्रीय महिला आयोग की नीतियां और योजनाओं से वंछित रह जाते हैं । तराई का क्षेत्र महिलाओं के मामले में अत्यंत ही पिछड़ा, अशिक्षित और अभावयुक्त हैं । यहां महिलाओं को नित नए जटिलताओं का सामना करना पड़ता हैं ।

वहीं मुस्लिम महिला की समस्या एवं कठिनाई और भी जटिल दिखती हैं । यहाँ की बाँकी महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परेशानियों के साथ नागरिकता और भाषा भी प्रमुख समस्या दिख रही हैं । प्रायः यहाँ भारतीय मूल की बहुएं लाना पंसद किया जाता है जिनके लिए आजकल नागरिकता की समस्या शोषण का रूप ले चुकी है । घर–परिवारों में भी पर्दों के पीछे रहने वाली बहुएं रोज (ऋ।म्।इ)दफ्तर के चक्कर काट कर हताशा के कगार पर आ जाती हैं । आजकल आ रही बहुएं अच्छी पढी लिखी होेने के बावजुद भी वार्तालाप में हिन्दी और लेखनी में नेपाली के चक्कर में परेशान और असहाय सी हो जाती हैं । उनका मनोबल गिरने लगता है । तराई की महिलाओं की आधी समस्या बन चुकी नागरिकता और भाषा का समाधान अति शीघ्र होना चाहिए ।

यहाँ की महिलाओं की लड़ाई बहुत कठिन है । उन्हे सबसे पहली लड़ाई पितृ सत्ता के खिलाफ और दूसरी सरकार की विभेदकारी सोच और नीतियों के खिलाफ, अपने खुद के सम्मान और वजुद के लिए और अपने बच्चों के आने वाले भविष्य के लिए लड़ना होगा । इतिहास ही बताता है कि नेपाल का तराई क्षेत्र नेपाली शासको के द्वारा हमेशा से विभेद का शिकार होता रहा है । जबकि हिमाल, पहाड़ और तराई की विविधताओं के संरक्षण एवं सम्वद्र्धन द्वारा सरकार को देश में शान्ति एवं समृद्धि बनाये रखने की उत्तम नीतियाँ बनानी चाहिए थी । किन्तु ये इसकी विपरीत ‘एक भाषा एक देश’ की नीति के तहत तराई को विभेद की दृष्टि से देखकर ‘दास’ बनाकर रखने की नीति को लागू करने लगे । किन्तु इनकी इस नियोजित विभेदकारी योजना को मधेशी, थारु, जनजाति सहित विभिन्न वर्ग एवं सम्प्रदायों के लोगों ने समझ लिया और इनके द्वारा लाए गए संविधान को लागू करने से पहले आंदोलन में जाना पसंद किया । वे आज भी आंदोलन मे हैं तथा तब तक रहेंगें जब तक असमानता, गरीबी, घृणा, दोष तथा नस्लवादी विभेद की नीति एवं पद्धति का अंत नहीं होता एवं सरकार सब वर्ग और समुदाय के हित में संविधान नहीं लाती ।
हमे पूर्ण विश्वास है कि देश में सामान्य लोकतंत्र स्थापित हो जाने के बाद राजधानी में रहने वाली शिक्षित, सम्पन्न, सशक्त मुस्लिम महिलाओं की भांति तराई की महिला भी उन्नति मे आएंगी । जरूरी है महिला प्रगति या उत्थान के लिए सरकारी और गैर–सरकारी संस्थाएं शिक्षा में इनका भी पहुँच बढाये, छात्रवृति पर कार्य करे, सामाजिक गतिविधियों में सहभागिता करवाये, चेतना उत्पन्न करे, ग्रामीण लघुउद्योग लगाये, आत्मनिर्भर बनाने के जितने भी कार्य हो चलाये जाये, नेतृत्व विकास और स्वास्थ्य सम्बंधी योजनाएं और कार्यक्रमों को लाना बहुत जरूरी हैं तभी महिलाएं सशक्त हो पाएंगी और नारीदिवस की बधाई का उद्देश्य जान पाएंगी

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