इयु विवाद और फर्जी राष्ट्रवाद : रणधीर चौधरी

वास्तव मे कहा जाय तो नेपाल मे समावेशी, समानुपातिक और आरक्षण व्यवस्था का चीरहरण किया गया है । ऐसी अवस्था मे भीष्म पितामह जैसै कठोर मौन धारण करना महाभारत जैसे युद्घ को नेपाल मे खुला आमन्त्रण करना है 

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हिमालिनी,अप्रैल अंक २०१८ | त्रुटिपूर्ण संविधान को लागु करने के लिए संवैधानिक प्रावधान विपरीत सभी जगह तीन तह का चुनाव करवाने में सफल होने के बाद नेपाल के शासक वर्ग यह दिखाना चाह रहे हैं कि देश मे पहचान का मुद्दा सम्बोधन हो गया है । इस मुद्दे से हटकर सत्तापक्ष अब नेपाल मे अन्तहीन विकास के मुद्दाें को जनता के मानसपटल में बैठाना चाहता है । ठीक इसी वक्त नेपाल स्थित युरोपियन युनियन (इयु) ने अपना चुनाव अनुगमन का २९ बुंदे प्रतिवेदन सार्वजनिक किया है । सार्वजनिक प्रतिवेदन मे इयु का कहना है कि नेपाल के संविधान मे समेटे गए खस आर्य वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान समाजिक न्याय विपरीत है । इस को हटाने के लिए इयु ने निर्देशनात्मक सुझाव प्रकट किया है । यह प्रावधान कालान्तर मे नेपाल में द्वन्द पैदा कर सकता है । वास्तव मे यह प्रावधान समावेसी समानुपातिक सिद्घान्त के खिलाफ है । इयु के इस सुझाव को ले कर नेपाल के खस आर्य अर्थात शासक वर्ग बौखला गए हैं और विषवमन करने से थक नही रहे हैं । और हर बार की तरह आन्तरिक मामला कह कर राष्ट्रवाद को हवा देने में लगे हुए हैं 
ऐसे मे एक काल्पनिक प्रश्न खड़ा होता है । अगर इयु या कोई अन्य कुटनीतिक नियोग की तरफ से यह सुझाव आता कि अब नेपाल मे पहचान की राजनीति का औचित्य समाप्त हो गया है । पहचानवादी ताकतों को अब इस संविधान को पूर्णतः स्वीकार कर के सिर्फ आर्थिक प्रगति के बारे मे सोचना चाहिए, तो क्या ऐसी हालत में यह खस आर्य कुटनीतिक नियोग का प्रतिवाद करता ? कतई नहीं । उन्हें तो बस अपनी सत्ता को यथास्थिति में रखने में आनन्द की अनुभूति होती है ।
गौरतलव है कि नेपाल के तत्कालीन नरेश ज्ञानेन्द्र शाह ने जब देश के लोकतन्त्र पर क्रुरतम प्रहार कर सत्ता का बागडोर अपने हाथ ले लिया था उस वक्त यही खस आर्य इयू लगायत विभिन्न कुटनीतिक नियोग के चौखट पर अपना सर पटक सहयोग की भिक्षा मांगना अपना नैसर्गिक अधिकार समझते थे । उस वक्त कहाँ गायब हो गया था इनका राष्ट्रवाद ? अभी इयु के तरफ से आए सुझाव को बाध्यात्मक उर्दी की संज्ञा दे रहे खस आर्य के काबिलयत पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है ।
वास्तव मे इयु के प्रतिवेदन ने बहुत सारे खसआर्य को नंगा कर दिया है । नेपाल मे सार्थक समावेशी समानुपातिक व्यवस्था का खुला वकालतकर्ता पूर्व प्रधानमन्त्री बाबुराम भट्टराई का भी असली चेहरा बाहर आ गया है । उन्होंने समाजिक संजाल मे इयु प्रतिवेदन का विरोध करते हुए कहा है कि खस आर्य को आरक्षण देने की बात संविधान मे कही उल्लेखित नही किया गया है । जब की नेपाल सरकार के हरेक नौकरी के विज्ञापनों में खस आर्य के लिए आरक्षण की अलग व्यवस्था है । अब बाबुराम को कौन समझाए कि उनको आम मधेशी वा कहे तो सीमांतकृत वर्ग अच्छे से पहचान गए हैं । आखिर नश्लिय संविधान के हस्ताक्षरकर्ता बाबुरम भी तो हैं ।
वैश्वीकरण के युग मे कूटनीतिक सम्बन्ध मे बंधे हरेक पक्ष एक दूसरे के क्रियाकलाप का खुला अवलोकन करते हैं । यह सब का कूटनीतिक धर्म भी है और इयु ने भी अपना कूटनीतिक धर्म अदा किया है । वास्तव मे कहा जाय तो नेपाल मे समावेशी, समानुपातिक और आरक्षण व्यवस्था का चीरहरण किया गया है । ऐसी अवस्था मे भीष्म पितामह जैसै कठोर मौन धारण करना महाभारत जैसे युद्घ को नेपाल मे खुला आमन्त्रण करना है । वास्तव मे कहा जाय तो इयु ने न तो खसआर्य के विपक्ष में प्रतिवेदन सार्वजनिक किया है न ही सीमांतकृतवर्ग के पक्ष में । अगर सीमांतकृतवर्ग को बहिष्करण में नहीं धकेला होता तो नेपाल मे न जनयुद्घ सम्भव था न मधेश आन्दोलन । और सीमांतकृत समुदाय बहिष्कृत होने का कारण है खस आर्य का एकल जातीय सत्ता का निरन्तरता और यथास्थिति से लगाव । गौरतलव है इयु के प्रतिवेदन को अगर आत्मसात कर आगे बढ़ा गया तो नेपाल मे विद्यमान अप्रकटित द्वन्द से सहज छुटकारा पाया जा सकता है ।
विडम्बना है, खसआर्य इयु के प्रतिवेदन का विरोध करने मे सारी उर्जा लगा रहे हैं । इतना ही नहीं सीमांतकृत समुदाय का कठोर और अस्वाभाविक मौन भी अजीब है । बहुत सारे सीमांतकृत समुदाय से आने वाले लोग अभी के खसआर्य की निगाह से अपना व्यक्तिगत स्वार्थ या किसी प्रकार के राजनीतिक नियूक्ति को लालाइत हैं । सीमांतृकत और खास कर मधेशी समुदाय को इयु के प्रतिवेदन का समर्थन करना उचित होगा । यह सर्वजन हिताय की बात है ।
सच यह भी है कि कुटनीतिक नियोग कभी भी सत्ता और शक्ति के समीप ही होता है । नेपाल मे स्थित कुटनीतिक नियोग के कार्यलय मे खसआर्य का अच्छा खासा दखल है । उनके घर में और शौचालय मे प्रयोग होने वाले टीसू पेपर भी इयू जैसे कुटनीतिक नियोग से कमाए गए डलर की ही उपज है । नेपाल के व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में तो विदेशी नियोग का खुला हस्तक्षेप है । न जाने क्यों महान खसआर्य विदेशी नियोग के इन खुला हस्तक्षेप का विरोध करते नजर नही आए ? शायद यह एक माध्यम है देश मे दलालीकरण को बढावा दे कर ब्रम्हलूट का मजा लेने का ।
अन्त में । कुछ ही हप्ता पहले पूर्व रूसी गुप्तचर और उनके बेटी के ऊपर हुए हमले के बाद उत्पन्न तनाव बढ़ते जाने के बाद रूस ने २३ बेलायती कूटनीतिज्ञ को निष्कासित करने का निर्णय किया था । रूसी विदेश मन्त्रालय के अनुसार उन सभी को एक हप्ते का समय दिया गया था । रूसी विदेश मन्त्री ने मास्कोस्थित बेलायती दूतावास में कार्यरत २३ कर्मचारियों को “पस्रोना ना ग्राटा” अर्थात रूस में रहना वा प्रवेश न कर पाने की सूची मे रख दिया गया है ।
अब देखना है कि अपने आप को वीर गोर्खाली इयु के अभिव्यक्ति के कारण “पस्रोना ना ग्राटा” लागु करने की हिम्मत दिखाता है या नही ? या कूटनीति का दूसरा औजार “प्रोटेस्टनोट” लिखने की हिम्मत कर पाता है या नही ? अब सब की निगाह इन्हीं मुद्दों पर अटकी हुई है । परंतु, सीमांतकृत समुदाय को इयु के प्रतिवेदन के पक्ष में खुल कर आवाज उठाना जरुरी है ।

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