Tue. Sep 18th, 2018

तीज–त्योहार नेपाल के

पर्यटन के पीछे मनोरंजन की भावना जुटी होती है । पर्यटकों को यह मनोरंजन विभिन्न देशों की ऐतिहासिक धरोहर, कलापूर्ण वास्तु और शिल्पकला से सुशोभित इमारतें, कलाकृतियाँ, प्राकृतिक सुंदरता, उन देशों के पर्व, वहाँ की जनता की वेशभूषाएँ और खानपान से प्राप्त होती है ।
विभिन्न भाषाएँ, धर्म, तीज–त्योहार, रहन–सहन, रीति–रिवाज, खानपान, हिमश्रृंखलाएँ और मौसम की विशेषताओं से भरे नेपाल की यात्रा में आने वाले पर्यटकों को भी भरपूर मनोरंजन प्राप्त करने के कई अवसर आते है. । क्योंकि यहाँ शायद ही कोई ऐसा महीना होगा जब नेपाली जनता को अपने पर्वों पर भूmमने, नाचने, गाने और कर–कुटंबजन एवं अतिथियों को खिलाने–पिलाने का अवसर न मिलता हो । चूूँकि हर पर्व रंगारंग होता है और उसके साथं हर्ष, उल्लास और मनोरंजन के पक्ष होते हंै, अतः नेपाल आने वाले पर्यटकों को इन रंगारंग पर्वों से रूबरू होने का अतिरिक्त अवसर प्राप्त होता रहता है ।
पिछले दिनों बैशाख–ज्येष्ठ की गृष्मकाल में जहाँ बौद्ध धर्मावलंबियों ने बुद्ध पूर्णिमा का पावन पर्व श्रद्धा और भक्तिपूवर््ृाक मनाया, वहीं मुस्लिम संप्रदाय के लोगों ने रमजान की समाप्ति पर ईद का पर्व उत्साहपूवर््ाक मनाया और इन अवसरों पर अन्य संप्रदाय के लोग उनकी खुशियों में सरीक होकर गले मिलने और सांप्रदायिक सद्भाव का ज्वलंत उदाहरण पेश करने से नही चुके । अब वर्षा काल आ पहुँचा है तोे हिंदू धर्मावलंबी भी अपने पर्व मनाने के लिए अग्रसर हो रहे हैं । इस ऋतु के महत्वपूर्ण महीने हैं– श्रावण, भादो, आश्विन आदि । और इन महीनों के पावन पर्व हैं– रक्षाबंधन, नागपंचमी, गाइजात्रा, इन्द्रजात्रा, हरितालिका आदि ।
आषाढ़ और सावन के महीने की तो छटा ही निराली होती है । हर ओर हरियाली, हवा में लहराते पेड़–पौधों की हरीभरी डालियाँ, आकाश में उमड़ते काले और नीले बादलों के बीच से निकलती ठंढी हवा, बादलों के बीच से बीच–बीच में झाँकते सूर्यदेव और इस शानदार माहौल में हरी चूडियाँ और परिधानों में सजी सावन के भूmले में भूmलती स्त्रियाँ और बालाएँ प्रकृति में इंद्रधनुषी छटा ही बिखेर रही होती हैं । ऐसे माहौल में आने वाले पर्व लोगों में नव उमंग का संचार करते हैं ।
गुरूपूर्णिमा और नागपंचमी पर्व के साथ पर्वाें का सिलसिला शुरु होता है । हमारे जीवन को ज्ञान से आलोकित करने और व्यक्तित्व को निखारने में गुरुओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है । अतः श्रावण महीने की पूर्णिमा को गुरु के नाम समर्पित की गयी है और गुरु की तुलना ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर से की गयी है । ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः’ कहते हुए उनके प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त की जाती है । उनकी चरणवंदना की जाती है ।
श्रावण शुक्ल का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व है–नागपंचमी । नेपाल कृषि प्रधान देश होेने के कारण इस पर्व को भी अत्ंयत ही श्रद्धा के साथ मनाया जाता है । कृषि कार्य के लिए वर्षा की नितांत आवश्यकता होती है और नाग को वर्षा का वाहक माना जाता है । अतः वर्षा न होने की स्थिति में किसान लोग किसी नदी या जलाशय में गाय का दूध अर्पित कर नाग को प्रसन्न करते हैं, ताकि उनकी कृपा प्राप्त हो सके और वर्षा आने पर कृषि कार्य पूरी की जा सके । नागपंचमी के दिन कोई भी किसान इस भय से खेत में कुदाल नही चलाता कि कहीँ कोई नाग या साँप कुदाल से घायल न हो या मारा न जाय । दूसरी ओर नागपंचमी के अवसर पर हिंदूजन अपने घरों में नाग का चित्र चिपकाकर पूजा करते हैं और घर की बाड़ी के एक कोने में नाग की प्रिय पेय दूध में खील डालकर रख देते हैं । नेपाल में नाग को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । गृह निर्माण करते हुए भूमिपूजन के अवसर पर आधारशिला पर नाग की प्रतिमा का रखा जाना इस बात का प्रमाण है । इसके अतिरिक्त नेपाल की काष्ठकला हो या प्रस्तरकला या स्थापत्यकला, हर क्षेत्र में नाग की मूर्ति का मिलना भी इस तथ्य की ओर इंगित करता है ।
रक्षाबंधन का पावन पर्व तो नेपाल और भारत के प्रमुख पर्वों में से एक हैं । भाद्र शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व नेपाल और भारत के तागाधारियों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है । इस दिन समस्त तागाधारीजन अपने–अपने जनेऊ बदलते हैं । नेपाल में तो इसे वैदिक विधि के साथ मनाया जाता है । प्रातःकाल ही समस्त ब्राह्मणजन किसी नदी या तालाब के तट पर पहुँचकर वैदिक विधि–विधान के अनुसार नहाते, जनेऊ बदलते, ऋषियों के लिए विधिपूर्वक तर्पण देते और रक्षासूत्र धारण कर ब्राह्मणों के हाथों रक्षासूत्र धारण करते हैं । रक्षासूत्र लिए बैठे ब्राह्मणजन भी इस अवसर पर रक्षासूत्र बाँधते हुए यजमानों को बलि राजा की दानशीलता का स्मरण कराते हुए जिन मंत्रों का उच्चारण करते हैं, वह इस प्रकार है–‘दानबद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल, एनत्वाम प्रतिवघ्नामि, रक्षामा चलमाचलः ।’ पर राजा बलि की बराबरी न कर सकने वाले यजमान उन्हें यथाशक्ति दान–दक्षिणा देते हैं जिसे रक्षासूत्र बाँधने वाले ब्राह्मण सहर्ष स्वीकार करते हैं । घर पहुँचने पर वे क्वाँटी (विभिन्न प्रकार के अंकुरित दलहन) के गरमागरम शोरबा के साथ भात (चावल) और अन्य व्यंजन खाते हैं । नेपाल जैसे ठंढे मुल्क में सुबह–सुबह खुले जलाशय में नहाकर विभिन्न धार्मिक रीतियों का पालन करते हुए शरीर पर पड़ने वाले शीत के प्रभाव को दूर करना ही इस प्रकार के भोजन का प्रमुख कारण है । विभिन्न प्रकार के अंकुरित दलहन को शक्तिवद्र्धक खाद्यपदार्थ माना जाता है ।
इस दिन ऋषियों के नाम तर्पण देने का कार्य भी होता है अतः इसे ऋषितर्पंणी पर्व भी कहा जाता है । भारत में इस दिन को भाई–बहनों के पावन पर्व रक्षाबंधन के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आधुनिकता और बसुधैव कुटुंबकम के वर्तमान युग में अब नेपाल में भी धागों के इस त्योहार को भाई–बहन के शाश्वत प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाने लगा है ।
इस पर्व की समाप्ति के साथ ही दूसरे दिन गाइजात्रा का पर्व मनाया जाता है । यह मुख्यतः काठमांडू के नेवार संप्रदाय द्वारा मनाया जाता है । अपने दिवंगत माता–पिता या भाईयों की वार्षिकी पर उनकी आत्मा की शांति के लिए यह पर्व मनाया जाता है । इस अवसर पर अपने दिवंगत माता या पिता के नाम पर किसी गाय को सुंदर वस्त्र और पूmल–माला एवं अन्य आभूषणों से सजाया जाता हैै । इसके अलावा एक युवक या किशोर को जोगी के रूप में सजाकर नगर की परिक्रमा की जाती है । गाय को इस अवसर के लिए चुने जाने के पीछे यह मान्यता है कि मृत्यु उपरांत यमलोक मे चित्रगुप्त के दरबार तक पहुँचने से पूर्व मृतात्मा को विभिन्न कंकटपूर्ण मार्ग से गुजरते हुए वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है । चूँकि वैतरणी नदी पार करने में गाय सहायता पहुँचाती है अतः इस पर्व में गाय को महत्व प्रदान किया गया है और पर्व का नाम गाइजात्रा रखा गया है । इस प्रकार इस पर्व के साथ धार्मिक, सामाजिक और मनोरंजनात्मक पक्ष संबंद्ध है ।
भाद्र महीने के महत्वपूर्ण पर्वों में इन्द्रजात्रा प्रमुख है । सात दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व के प्रथम दिन राष्ट्राध्यक्ष की उपस्थिति इस पर्व को गरिमामय बनाती है । इसके अतिरिक्त इस अवसर पर नेपाल की जीवित देवी कुमारी, जो देवी तलेजू भवानी की स्वरूपा मानी जाती हैं, की रथ यात्रा और उस अवसर पर की जाने वाली लाखे नृत्य इसे मनोरंजक बनाते हैं । प्रत्येक पर्व और त्योहार के पीछे किसी न किसी पौराणिक और ऐतिहासिक गाथा संबद्ध रहती है । इस पर्व का संबंध देवराज इन्द्र द्वारा अपनी माता के लिए हारसिंगार (पारिजात पूmल) ले जाने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होने, किसी के बगीचे में अनुमति बिना घुसकर चुपके से पूmल तोड़ने और इस क्रम में माली द्वारा पकड़े जाने और सजा के रूप में उन्हें नगर परिक्रमा कराये जाने की घटना से संबंद्ध है । इसी की स्मृति में यह पर्व प्रत्येक वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है ।
भाद्र महीने के शुक्लपक्ष की तृतिया तिथि के दिन सुहागन स्त्रियाँ हरितालिका का महान पर्व मनाती हैं । इस उपलक्ष्य में वे पूर्व संध्या में सरगही खाती हैं और दूसरे दिन निराहार व्रत रखते हुए और भगवान शिव की पूजा करती हैं । कुछ महिलाएँ स्वास्थ्य के कारण संध्याकाल में शरबत, काढ़ा या हलका फलाहार करती हैं । हरितालिका के दिन वे सुहाग के प्रतीक लाल साड़ी, मंगलसूत्र (जिसे नेपाली में तिलहरी कहते हैं) और अन्य आभूषण धारण कर जब मंदिर की ओर निकलती हैं तब सड़कों पर निराली छटा छा जाती है । इस पर्व के संबंध में यह कहा जाता है कि देवी पार्वती ने शिव को वर के रूप में पाने के लिए कठोर व्रत की थी ।.क्रमश (शेष अगले अंक में ।)

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