Wed. Sep 26th, 2018

हिमालिनी, जुलाई अंक 2018 ।

जिन्दगी ने मेरी कई उफान देखें हैं
जो तोड न सके, वो ईमान देखे हैं ।
अब औरों से क्या शिकवा करुँ
मैंने कई अपने ही बेगाने देखें हैं ।
आँखों में प्यार दिलों में नफरत देखी है
अपनों मे ही दुश्मनों सी कोशिश देखी है ।
अब कैसे कर लूँ भरोसा अजनबियों पर
अपनों को ही जज्बातों के खून करते, देखें हैं ।
डर लगता है किसी पर भरोसा करने में ।
‘क्योंकि’ अपनों को ही लूटते सरेबाजार देखे हैं ।
जिदंगी ने मेरी कई उफान देखें हैं
जो तोड़ न सके वो इमान देखें हैं ।

सुरेखा शर्मा
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