असमन्जस

ई. सन्तोष पोखरेल

सूनी राह है असमन्जस में
हर निगाह है असमन्जस में
मैं तीरन्दाज तो नहीं
जो दिशाओं को भेद सकूँ
तेरी पनाह है असमन्जस में
मेरी चाह है असमन्जस में ।

तूफां आए थे बेशक
मैनें परिन्दों को वाकिफ माना
उनकी काबीलियत है
आसमान को जान पाना
मैने आसमान को जाना नहीं
तूफानों को पहचाना नहीं
जो था नहीं मेरे वश में
था तभी मैं असमन्जस में ।

अब मेरा कहाँ मन है ?
अब तो मुर्दा अमन है,
दिल पड़ा कशमकश में
मैं पड़ा हूँ असमन्जस में
तुमने हालात आगाह किए
खुद हालात जो है असमन्जस में
बातें जो किये थे कभी
वो हर बात अभी असमन्जस में
अब क्या याद करु मैं ?
अब हर याद पड़ी असमन्जस में
टोको नहीं जज्वात से मुझे
ये जज्बात भी है असमन्जस में ।

सूनी सूनी है डगर
चल पड़ा हूँ मगर
सुनी राह खुद है असमन्जस में है
हर निगाह है असमन्जस में
किसने मेरी चाहत को दावत दी
पर ये चाह भी है असमन्जस में ।

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