धन और मान में सच्चा सुख नहीं

रवीन्द्र झा
उन्नसठवीं सदी के अन्तिम चरण की बात है, कराची के एक मध्यमवर्गीय सिन्धी परिवार में हरनाम नाम का एक बालक था । माँ बचपन में ही मर चुकी थी । बाप ने प्रौढ़ावस्था में फिर से एक गरीब घर की लड़की से विवाह कर लिया । उसके दो दो सौतेले बहन–भाई भी हो गये थे । हर नाम की शादी शुदा अपनी एक बहन थी । परन्तु उसे कभी त्यौहार पर भी नहीं बुलाया जाता था । कभी–कभी छुपकर वह भाइ की पाठशाला में आती और कुछ चीजे दे जाती । घर में छोटे भाई बहन के लिए विशेष अवसरों पर नये कपड़े और तरह–तरह की मिठाइया बनती, परन्तु हरनाम को कोई भी नहीं पूछता । बेचारा बालक ललचाई आँखों से देखता रहता । कभी कभार वे दोनों इसे कुछ देना चाहते तो माँ उन्हें मना कर देती ।
एक दिन किसी साधारण से कसूर पर विमाता ने हरनाम को बहुत पीटा । पिता भी पत्नी के डर से कुछ नहीं बोला । भूखा–प्यासा बच्चा घर से भागकर समुद्र किनारे खड़े किसी भरवाही जहाज में जाकर छिप गया । थोड़ी देर बाद, जब जहाज रवाना हुआ तो उसे वस्तुस्थिति का भान हुआ और वह सुबक–सुबक कर रोने लगा । परशियन आयल कम्पनी का जहाज था । ज्यादातर मुल्लाह अरब के थे, दो–चार अफिसर भी थे । जब उन्होंने १२–१३ वर्ष के एक अतिसुन्दर बालक को इस स्थिति में देखा तो आश्चर्यचकित रह गये । धीरे–धीरे सारी बात की जानकारी ली । जहाज का कराची वापस जाना सम्भव नहीं था । बालक पर कप्तान का स्नेह हो गया । उसने उसे अपनी केबिन में रखा लिया । इरान पहुँचकर कप्तान ने उसे एक धनी ईरानी परिवार में नौकरी में रखवा दिया । हरनाम की बुद्धि कुशाग्र थी । थोड़े दिनों में ही उसे अरबी, फारसी और अंग्रेजी बोलने का अच्छा अभ्यास हो गया ।
उन दिनों, इरान में तेल कम्पनी के बहुत से अंगरेज अधिकारी थे । परशियन आयल कम्पनी का बड़ा साहब वहाँ ब्रिटेन की तरफ से सर्वोच्च राजदूत भी था । एक दिन साहब और उकी पत्नी टहलते हुए किसी अरबी शब्द के बारे में बहस कर रहे थे । हरनाम उधर से गुजर रहा था, उसने क्षमा मांगते हुए विनयपूर्वक कहा कि मेम साहिबा का जुमला सही है ।
अब तो हरनाम पर उन दोनों की पूर्ण कृपा हो गयी । उसे इन्हीं के बंगले में रहने, खाने की सुविधा मिल गयी । हाथ खर्च के लिये दो सौ रुपया महीना दिया जाने लगा । काम था, मेम साहिबा को अरबी और फारसी पढ़ाना ।
प्रथम महायुद्ध में इरान मध्य–पूर्व का सप्लाई केन्द्र बना । कड़ोरों रुपये महीने का समान वहाँ से वितरण होने लगा । तेल कम्पनी का बड़ा साहेब निदेशक नियुक्त हुआ । अधिकांश समान के वितरण को काम मिला, हरनामदास एण्ड कम्पनी का, सन् १९१८ ई. तक हरनामदाश करोडपति सेठ बन गया । वही चार–छ मुताह कंट्राक्ट मैरिंज या अल्पकालीन विवाह कर लिए । इन बीबियों के अलावा उसके रंगमहल में एक–से–एक सुन्दरी दासिया थीं । सैकड़ो नौकर–चाकर, मुनीम–गुमाश्ते घर और ऑफिस का काम देखते, उसके दरवाजे पर अनेक अतिथि और प्रतिनिधि आते रहते, सब का यथायोग्य आदर–सत्कार होता ।
संयोग से, एक दिन भारतीय साधु घुमता हुआ वहाँ जा पहुँचा । स्वदेश के संन्यासी की दूसरे की अपेक्षा अधिक खातिरदारी होेनी स्भाविक ही थी । एक महीने तक किसी राजा–महराजा का–सा आयोजन उनके लिए हुआ । विदाई की दक्षिणा में कीमती शाल–दुशाले तथा अच्छी रकम नकद दी गई ।
पन्द्रह वर्ष के लम्बे समय के बाद एक साधु–महाराज हरिद्वार के पास मुनि की रेती में एक बड़े पकौड़ी की दुकान पर खड़े होकर दुकानदार को बड़े ध्यान से देख रहे थे, महाराज को प्रेम से नाश्ते का निमन्त्रण मिला । पहले से ही चार–पाँच संन्यासी प्रसाद पा रहे थे । दुकान पर ग्राहको की अच्छी भीड़ थी । दुकानदार ने पूछा– महाराज ! आप इतने ध्यान से मुझे क्यों देख रहे थे ?
सन्यासी ने पन्द्रह वर्ष पहले के इरान प्रवासी की अपनी कहानी सुनाकर कहा कि सेठ हरनाम दास का चेहरा आपसे एकदम मिलता–जुलता है । जब उन्हें पता चला कि वे उसे हरनामदास से ही बाते कर रहे हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जो कहानी उन्हें सुनायी गयी, वह इस प्रकार थी–
आप के चले जाने के एक वर्ष बाद बड़े साहब का मैंने कभी परवाह नहीं की थी, इसलिए यह और उसके मुंहलगे दोस्त एवं कर्मचारी मुझसे जलते रहते थे । कुछ ही दिनों बाद मुझपर जालसाजी का मुकदमा चलाया गया, जिसकी सजा होती मौत । जल्दी से व्यवस्था करके, मुनीमों को काम सम्भालकर मैं चार–पाँच लाख की सम्पत्ति लेकर अपने सचिव के साथ इरान से छद्म वेश में रवाना हुआ । रास्ते में मेरा सचिव सन्दुक लेकर न जाने कहा उतर गया । मैं जब बम्बई बन्दरगाह पहुँचा तो मेरे पास थोड़े से रुपये और एक बहुमूल्य घडी बची थी ।
घडी बेचने के लिए दो–तीन दुकानो में गया । दुकानदार मेरी मैली वेश–भूषा और बढ़ी हुई दाढ़ी देखकर सन्देह करने लगे कि शायद मैं घड़ी चुराकर लाया हूँ । केवल पचास–साठ रुपये तक देने के लिए तैयार हुए । मैंने क्रोध में आकर घड़ी को समुद्र में फेंक दिया ।
जगह–जगह मजदूरी करता हुआ, संयोग से यहाँ आकर बड़े–पकौड़ी की दुकान कर ली । थोड़े दिनों तक तो मन में संताप रहा, फिर एक दिन एक महात्मा आये । उनका उपदेश था– बच्चा ! धन और मान में सच्चा सुख नहीं है । ईश्वर के बन्दो की सेवा करो, शान्ति मिलेगी, तबसे महात्माओं को प्रसाद देकर जो बच जाता है, उसी से दो जून की खुराक आराम से मिल जाती है । सुबह ६ बजे से लेकर रात के १२ बजे तक मेहनत करने से शरीर स्वस्थ रहता है और मन भी नाना चिन्ताओं से मुक्त है । भगवती गंगा का तट है और साधु–महात्माओं का संग– सचमुच, बहुत आनन्द में हूँ ।
सन्यासी ने प्रसाद पाकर हरनामदास को प्रणाम किया और कहा कि वास्तव में ही आप सुख–दुःख के समदर्शी समग्राही है ।
सन् १९६१ ई में हरनामदास की मृत्यु हुई । स्वर्गीय श्री राम शर्मा (सम्पादक, विशाल भारत) के घरपर एक–दो बार उनसे मुलाकात हुई थी । गरीब होने पर भी आदतें पहले–जैसे ही थी । एक–दो कम्बल या कोट पास में होता तो वे किसी जरुरतमन्द को दे पाते । कई दिनों तक कड़ाके की सर्दी भुगतने के बाद सम्भव होता तो फिर कोट बनवा पाते । परन्तु, कभी उनके चेहरे पर दीनता के भाव नहीं दिखायी दिए । (सच्चा सुख सन्तोष में) ।

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