पुरानी प्रतिबद्धता कार्यान्वयन की जाए : हृदयेश त्रिपाठी

हृदयेश त्रिपाठी, सांसद्

हिमालिनी अप्रैल अंक, २०१८ | मित्रता और सुन्दरता का अन्त कभी भी नहीं होता । अर्थात् मित्रता में कोई भी लक्ष्मण रेखा नहीं होती । दूसरी बात आप मित्र बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी को नहीं । तसर्थ यही दो बातों के आलोक में नेपाल–भारत संबंध को देखना चाहिए, परिभाषित करना चाहिए । नेपाल–भारत सम्बन्ध को निर्धारण करनेवाले प्रमुख तत्व क्या है ? सरकार–सरकार बीच का सम्बन्ध है या काठमांडू और दिल्ली बीच का सम्बन्ध ? अथवा कुछ और भी है ? मेरे विचार में सरकार–सरकार अथवा काठमांडू–दिल्ली बीच जो सबंध हैं, उसके अलावा सम्बन्धों के अन्य आयाम भी हैं, जो महत्वपूर्ण है । उदाहरण के लिए मेरे गांव में रहनेवाले छेदीलाल ने भारत, महाराजगंज की रुकमिणी के साथ शादी किया । यह बात न दिल्ली जानती है न काठमांडू । शादी के लिए जो निमन्त्रण कार्ड बांटा जाता है, वह न इधर के राजदूत को मिला है न उधर के । दो अलग–अलग देशों के लड़का–लड़की के बीच जो शादी की गई, उसके लिए न तो भारतीय दूतावास ने अनुमति दिया, नहीं तो नेपाली दूतावास ने । इस तरह का जो संबंध हैं, इसका आकार बहुत बड़ा है ।
इसीतरह पवित्र तीर्थस्थल चारधाम जाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेनेवाले कोई नेपाली हैं ? या भारत से पशुपति आने के लिए नेपाल सरकार की अनुमति मांगनेवाले भारतीय हैं ? इस तरह का जो संबंध है, इसका कोई अर्थ है या नहीं ? इसको अन्यथा लेना जरुरी नहीं, लेकिन वास्तविकता यही है । जब हम लोग औपचारिक संबंध के बारे में बात करते हैं, ऐसे ही नागरिक पीडित होते हैं, जिन लोगों का संबंध सरकार से नहीं है, नागरिक–नागरिक के बीच है । इसीलिए अन्य स्टाकहोल्डरों को बाहर रखकर जो संबंध बनाया जाता है, वह सब कथा–कहानी और निबन्ध बन जाता है ।
मधेश में एक शब्द है– जुगाड़ । इसका अर्थ है– जब कोई सामान (मशीन) बिगड़ जाता है तो तत्कालीन आवश्यकता को मध्यनजर करते हुए किसी भी तरह काम करने के लिए योग्य बनाना । अर्थात् क्षणिक समय के लिए काम करना । इसीलिए यह ‘जोगाड़ीलाल’ सम्बन्ध है, अब इसतरह हम लोग आगे नहीं बढ़ सकते हैं । आज तक जो भी उतार–चढ़ाव आया है, यही ‘जोगाड़ीलाल’ सम्बन्ध के कारण ही आया है । यह तो हमारी आन्तरिक चुनौती है ।
नेपाल एक संक्रमणकाल को पार करके नयां संक्रमणकाल में प्रवेश किया है । कल तक जो संक्रमणकाल था, वह आशावादी था । सभी कहते थे कि चुनाव के बाद स्थिर सरकार बनेगी । हम लोग भी यही कहते थे । लेकिन आज जो संक्रमणकाल शुरु हुआ है, वह परिणाम तलाश रहा है । अगर हम लोग परिणाम नहीं दे सकते हैं तो निराशा और भी बढ़ जाती है । जिसको हम लोग ‘निराशावादी संक्रमणकाल’ भी कह सकते हैं । केन्द्र, प्रदेश और स्थानीय निकायों के बीच कैसा सम्बन्ध रहेगा, इन निकायों की काम, कर्तव्य और अधिकार क्या है, साधन–स्रोत की बंटवारा कैसे किया जाएगा ? इन तमाम विषयों में अन्तिम निर्णय होना अभी भी बांकी है ।
जब मैं संविधानसभा में था, उस वक्त मैंने ५६ देशों का संविधान अध्ययन किया । संविधान में एक अब्जेक्टिभ (मनोगत) स्वरूप होता है । मनोगत स्वरूप में हर संविधान उत्कृष्ट लगता है, कहीं भी विभेद नजर नहीं आता । आब्जेक्टिभ दृष्टिकोण से विश्व के हर संविधान ऐसा ही है । लेकिन जब संविधान की सब्जेक्टिभ स्वरूप के बारे में विचार करते हैं तो वहां विभेद, असमानता, गरीबी सब कुछ दिखाई देता है । आज हमारे यहां भी वही अब्जेक्टिभ और सब्जेक्टिभ के बीच विवाद जारी है । यह भी हमारी आन्तरिक विषयवस्तु ही है । लेकिन विवादों का समाधान करना चाहिए ।
सिर्फ नेपाल में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में जो प्रतिबद्धता व्यक्त की जाती है, उस को पूरा करने के लिए कोई भी तत्परता दिखाई नहीं देती । यह एक आदत बन गयी है । इसीलिए हमारे प्रधानमन्त्री को भी इस बात की ओर ध्यान देना जरुरी है । भारत भ्रमण करते वक्त नयी–नयी प्रतिबद्धता और सम्झौता करने की कोई भी जरुरत नहीं है । सिर्फ पुरानी प्रतिबद्धता और सम्झौता क्या है, उसको स्मरण कर कार्यान्वयन किया जाए । यही हमारे लिए बड़ी बात होगी । हां, सरकार–सरकार बीच जो सम्बन्ध होता है, जो सम्झौता किया जाता है, जनस्तर में उसका असर किस तरह पड़ रहा है, वह भी खयाल रखना चाहिए । क्योंकि नेपाल–भारत संबंध सिर्फ राजा–महाराजा, प्रधानमन्त्री और संसदों का संबंध नहीं है ।
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में स्व. वीपी कोइराला से लेकर मनमोहन अधिकारी तक सैकड़ों युवाओं को लेकर क्यों शामिल हुए थे ? राणा शासन अन्त करने के लिए कुलदीप झा लगायत भारतीय युवाओं ने क्यों आन्दोलन किया ? क्या उन लोगों को हमारी भौगोलिक सीमा बाधक रही, इसकी ओर भी ध्यान दिया जाए । क्योंकि यही हमारा असली सम्बन्ध है । ( नेपाल भारत मैत्री समाज द्वारा आयोजित प्रोग्राम में दिया गया मन्तव्य )

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