असंतुलित नीति की जाल में उलझा नेपाल : प्रेमचन्द सिंह

बताया जाता है कि विगत दस महीनों में चीन के साथ नेपाल का व्यापारिक घाटा लगभग रूपया १२४ अरब का है 


नेपाल में भारतीय निवेश की सुरक्षा हेतु औपचारिक सहमति जताई थी, लेकिन नेपाल वापसी के बाद अपनी बचनबद्धता को उन्होंने समाप्त कर दिया

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | नेपाल के प्रधानमंत्री श्री के.पी.शर्मा ओली की हालिया चीन की यात्रा (१९–२४ जून,२०१८) नेपाल और चीन बीच आवागमन, ऊर्जा तथा व्यापार के विकास के परिपेक्ष्य में विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है । इस यात्रा से नेपाल को मिलने वाले लाभ के मायनों को पढ़ने एवं समझने का मात्र यह एक प्रयास है । संदर्भित यात्रा के दौरान चीन और नेपाल के बीच चौदह समझौते हुए, जिसके अंतर्गत रेल–संपर्क, ऊर्जा, जल–संसाधन, जल–विद्युत, सीमेंट एवं फल आदि क्षेत्र आच्छादित है । इसके अतिरिक्त सुरक्षा एवं कानून–व्यबस्था का क्षेत्र भी इन समझौतों का हिस्सा है, जिसकी चर्चा अधिक नही है । इसके तहत नेपाल की सुरक्षा एवं कानून–व्यबस्था से संबंधित गोपनीय सूचनाओं का प्रबंधन तथा प्रशिक्षण आदि की व्यबस्था में चीन की अहम भागीदारी होगी । इसके बावजूद चीन बार–बार नेपाल की स्वतंत्रता एवं संप्रभुता की बात भी कहता है । नेपाल एक स्वतंत्र एवं सारभौम देश है और उसके प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नेपाल के हित मे लिए गए फैसलों एवं समझौतों का सम्मान होना चाहिए ।

चीन और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंधों के हितों के लिए नेपाल हमेशा उत्सुक एवं तैयार दिखता है लेकिन भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंधों के हितों के बीच नेपाल का राष्ट्रवाद खड़ा हो जाता है
बताते चलें कि नेपाल और चीन के बीच के घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में नेपाल का रुझान चीन के प्रति जितना है, उससे कहीं अधिक चीन नेपाल से संपर्क साधने में कटिबद्ध दिखता है । इसका महत्वपूर्ण कारण यह हो सकता है कि चीन दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की नीति पर दृढ–संकल्पित है, खासकर भारत के इर्द–गिर्द अपनी सामरिक एवं व्यापारिक आधारभूत संरचना की संस्थापना में चीन की विशेष दिलचस्पी है । भारत के सामरिक हितों पर अगर चीन और नेपाल के संबंधों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो ऐसी स्थिति में भारत को भी अपनी सामरिक हितों की रक्षा का पूर्ण अधिकार है । भारत की सामरिक एवं व्यापारिक हितों की भी एक लाल रेखा है जिसके अतिक्रमण का प्रयास किस हद तक आपसी संबंधों को कुप्रभावित कर सकता है, इसका आकलन संभव नही है ।
पूंजीनिवेश के लिए नीतिगत रबैया–
प्रधानमंत्री ओली जी अपनी इस चीन यात्रा के दौरान अपने पड़ोसी देश भारत और चीन के साथ अपक्षपातपूर्ण मैत्री संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता का जिक्र अपनी भाषणों में करते रहे हैं । विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के साझा हितों के दृष्टिगत नेपाल में भारतीय निवेश की सुरक्षा की जिम्मेवारी भारतीय प्रयासों के बाबजूद भी अभी तक नेपाल द्वारा नही लिया गया है । इसके विपरीत वर्ष २०१६ में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिसिएटिव (बी.आर.इनिसिएटिव) के अंतर्गत प्रधानमंत्री ओली के नेतृत्व में चीन और नेपाल के बीच जो समझौता हुआ उसमे नेपाल में चीनी–निवेश की सुरक्षा हेतु नेपाल की बचनबद्धता का प्राविधान सम्मलित है । नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई अपने कार्यकाल में भारत आए थे और अपने भारत प्रवास के दौरान नेपाल में भारतीय निवेश की सुरक्षा हेतु औपचारिक सहमति जताई थी, लेकिन नेपाल वापसी के बाद अपनी बचनबद्धता को उन्होंने समाप्त कर दिया । इसके अतिरिक्त चीन की परियोजनाओं के लिए नेपाल की ओर से जमीन की उपलब्धता, कर–रियायत आदि सुबिधा देने में जो तत्परता दिखती है, वह भारत की परियोजनाओं के मामलों में परिलक्षित नही होती है । नेपाल की इस दोहरी नीति के कारण भारतीय निवेश के लिए नेपाल आकर्षक–गंतव्य नही बन सका है । इससे लगता है कि चीन और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंधों के हितों के लिए नेपाल हमेशा उत्सुक एवं तैयार दिखता है लेकिन भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंधों के हितों के बीच नेपाल का राष्ट्रवाद खड़ा हो जाता है । स्पष्टतया नेपाल भारत से लाभ तो लेना चाहता है, लेकिन भारत को संतुलित करने के लिए चीन का दामन थामने की नीति पर कायम है । यह तथ्य वित्त मंत्रालय, नेपाल सरकार के आंकड़ों से स्पष्ट है कि वर्ष–२०१२–१३ से लगातार चार सालों में २.५ बिलियन डॉलर से लेकर ४ बिलियन डॉलर का चीनी निवेश नेपाल में हुआ है, जिसके फलस्वरूप नेपाल में पूंजीनिवेश के मामले में भारत चीन से पीछे हो गया ।
नेपाल में चीनी निवेश–
प्रधानमंत्री ओली की हालिया बहुचर्चित चीन की यात्रा के फलस्वरूप नेपाल और चीन के बीच लगभग रूपया १५२ अरब का समझौता हुआ है, जो अबतक का सबसे बड़ा समझौता माना जा रहा है । इन समझौतों के अंतर्गत चीनी कंपनियों द्वारा नेपाल में उत्पादन, निर्यात तथा व्यापार के क्षेत्रों में निवेश हेतु द्विपक्षीय सहमति हुई है । इन समझौतों की रूपरेखा स्पष्ट नही है कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक पूंजी, प्रौद्योगिकी, मानव–संसाधन के रोजगार, उत्पाद के व्यापार आदि में नेपाल की भागीदारी एवं लाभांश कितना होगा । आशंका यह भी है कि चीन भारत के विशाल बाजार कीे दोहन के लिए नेपाल में उत्पादन, व्यापार एवं निर्यात की आधारभूत संरचनाओं में निवेश के लिए आतुर है । अगर ऐसा है तो नेपाल चीन की सामरिक एवं व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं की रणनीति में मात्र साधन बनने तक सीमित हो जाएगा । नेपाल में चीन द्वारा उत्पादित सस्ते उत्पादों एवं चीन से निर्यातित विविध उत्पादों से जब नेपाल का बाजार पट जायगी, उस समय नेपाल की अपनी घरेलू बाजार में नेपाल की अपनी कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों से उत्पादित उत्पादों की स्थिति व्यापारिक दृष्टिकोण से सकारात्मक संकेत नही देती है । वर्णित स्थिति में नेपाल की कृषि एवं अकृषि क्षेत्र में घरेलू उद्योग का विकास किस हद तक कुप्रभावित होगा, इसका आकलन नेपाल के राष्ट्रीय हित मे होगा ।
बताया जाता है कि विगत दस महीनों में चीन के साथ नेपाल का व्यापारिक घाटा लगभग रूपया १२४ अरब का है । इस व्यापारिक घाटा को कम करने का साधारण तरीका यह हो सकता है कि नेपाल अपने कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में अपने संसाधनों का विस्तार एवं प्रौद्योगिकी की विकास के आधार पर घरेलू उत्पादन एवं निर्यात की क्षमता में अपेक्षित इजाफा लाए जिससे चीन को नेपाल से निर्यात होने बाली बस्तुओं में अनुपातिक बृद्धि हो । उल्लेखनीय है कि तिब्बत के रास्ते चीन के मुख्य–भूभाग में नेपाली उत्पादों का व्यापार आर्थिक दृष्टि से नेपाल के लिए कितना किफायती एवं लाभप्रद होगा,इसपर भी विचार होना चाहिए ।
द्विपक्षीय संबंधों के लम्बित पहलू–
दो साल पहले वर्ष–२०१६ में नेपाल के प्रधानमंत्री श्री ओली जी की चीन की यात्रा के दौरान चीन और नेपाल के बीच अहम समझौते हुए थे जिसे नेपाली मीडिया द्वारा गेमचेंजर के रूप में प्रसारित किया गया था । ओली जी की हालिया चीन की यात्रा (१९–२४ जून, २०१८) में उन समझौतों के क्रियान्वयन की दिशा में लगता है बात आगे नही बढ़ पायी । इस दौरा में नेपाल और चीन के बीच हुए समझौतों का मुख्य उद्देश्य नेपाल में चीनी निवेश लाना है, पुराने समझौतों को लागू करने में प्रगति ना के बराबर है । हालांकि इस संदर्भ में ओली जी अपने बाद आए नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पुष्पकमल दहाल प्रचंड तथा श्री शेरबहादुर देउवा की आलोचना यह कहकर की थी कि उन दोनों के कार्यकाल में चीन के साथ हुए समझौतों को लागू नही किया जा सका । उदाहरण के तौर पर चीन से नेपाल में पेट्रोलियम पदार्थों का अनवरत आयात प्रारम्भ नही हो सका । वर्ष–२०१६ में नेपाल एवं चीन के बीच ट्रान्स–हिमालयन रेलवे–नेटवर्क बनाने के लिए समझौता हुआ था । इस परियोजना की व्यवहारिकता की जांच के लिए चीन की टीम नेपाल आयी, लेकिन अभी तक टीम की रिपोर्ट प्रस्तुत नही हो पाई है । अब तिब्बत से लुम्बनी के स्थान पर शिगात्से से काठमांडू तक रेल–संपर्क की बात हो रही है । तत्समय दोनो देशों के बीच नए बॉर्डर–पॉइंट्स खोलने के लिए समझौता हुआ था, लेकिन इसकी क्रियान्वयन की स्थिति भी उत्साहवर्धक नही है । सबसे पुराना बॉर्डर–पॉइंट ‘तातोपानी’ वर्ष–२०१५ के भूकंप के बाद से बंद पड़ा है । चीन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस बॉर्डर–पॉइंट को बंद कर दिया है । चीन ने तातोपानी के बजाय ‘रसुवागडी–केरूंग’ बॉर्डर–क्रासिंग के उपयोग का प्रस्ताव दिया था । लेकिन यह भी उपयोग की स्थिति में नही है । बेल्ट एन्ड रोड इनिसिएटिव के अंतर्गत चीन के साथ हुए नेपाल के समझौतों के तहत भी प्रगति दृष्टिगोचर नही हो रही है ।
नेपाल और चीन के बीच हुए समझौते के तहत परियोजनाओं के फंडिंग पर दोनों देशों के बीच लगता है विवाद शुरू हो गया है । रेल नेटवर्क के लिए चीन द्वारा नेपाल को कर्ज का आफर दिया गया है । अगर परियोजनाओं की फंडिंग कर्ज के आधार पर होता है, तो नेपाल चीन के ‘कर्ज–जाल’ में फसता नजर आ रहा है । परियोजनाओं की फंडिंग का मामला संभवतः अभी भी अधर में ही लटका हुआ है ।
विस्तारवाद में बैंकों की भूमिका–
चीन की सरकारी बैंकें अपने देश मे लोगों को कर्ज देने से ज्यादा दूसरे मुल्कों को कर्ज दे रहे हैं । चीनी बैंकों के इस कार्यप्रणाली को वहाँ की सरकार की सोची–समझी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है । वाल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार चीन अपनी कंपनियों को दुनियाँ के उन देशों में बिजनेस के लिए आगे कर रहा है जहाँ से एकतरफा मुनाफा कमाया जा सके । चीन अपने उपनिवेशवाद की नीति के तहत कर्ज की रणनीति पर कार्य कर रहा है ।
पिछले साल मार्च में अमेरिका के तत्कालीन विदेशमंत्री रेक्स टिलर्सन ने कहा था, ‘चीन अन्य देशों को अपने ऊपर निर्भर बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है । वह जिन अनुबंधों को हासिल कर रहा है, वह पूरी तरह अपारदर्शी है, नियम एवं शर्तों को लेकर स्पष्ट नही है, बेहिसाब कर्ज दिए जा रहे हैं और इससे गलत कार्यों को बढ़ावा मिलेगा । उन देशों की आत्मनिर्भरता कम होगी, साथ ही संप्रभुता पर भी असर पड़ेगा । चीन में क्षमता है कि वह आधारभूत ढांचों का विकास कर सकता है लेकिन वह इसके नाम पर कर्ज के बोझ को बढ़ाने का काम कर रहा है ।’
सेन्टर फार ग्लोबल डेवलपमेंट का मत है कि वन बेल्ट वन रोड में भागीदार बनने बाले आठ देश चीन के कर्ज के तले दबे हुए हैं । ये देश हैं– जिबूती, किर्गिस्तान, लाओस, मालदीप, मंगोलिया, मोन्टेनेग्रो, पाकिस्तान तथा तजाकिस्तान ।
उपसंहार–
भारत और नेपाल की साझा हितों की लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है । इस परिपेक्ष में दोनो देशों की सहभागिता आधारित सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत है । दोनो देशों के बीच खुला बॉर्डर है, दोनो ओर से लोगो तथा सामानों के आवागमन की स्वतंत्रता है । नेपाल के लोगों को भारत मे सरकारी नौकरी, व्यवसाय एवं बसने आदि की एकतरफा सुविधा प्राप्त है, जबकि भारत के लोगों को नेपाल में उल्लिखित सुविधाएं उपलब्ध नही है । उल्लिखित सुविधाएं चीन द्वारा नेपाल के नागरिकों को नही दिया गया है । इसके बाबजूद चीन के सापेक्ष भारत के साथ नेपाल का रबैया उत्साहवर्धक नही है । वर्णित पृष्ठभूमि में समुचित होगा कि भारत के हितों के साथ नेपाल अपने हितों को जोड़कर चले । इससे ही दोनों मुल्कों की साझा विरासत को उन्नयन की नई ऊंचाइयों तक ले जाने में मदद मिलेगी । प्रश्नगत प्रकरण में नेपाल के लोगों के बीच भी विमर्श की अपार संभावनाएं हैं ।

प्रेमचन्द्र सिंह,
भारतीय पब्लिक सेक्टर उद्यम के पूर्व महाप्रबंधक एवं प्रबंधनिदेशक हैं। पब्लिक फाइनेंस एवं वित्तीय प्रबन्धन में विशेषज्ञ हैं।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

avatar
  Subscribe  
Notify of
%d bloggers like this: