हमारे राजनीतिज्ञों में साहस और दृष्टिकोण नहीं है -प्रो. जयराज आचार्य

प्रो. जयराज आचार्य

चाहे नेपाल हो अथवा भारत, दोनों की प्राथमिकता आज विकास ही है । लेकिन विकास कैसे किया जाए, यह चुनौतीपूर्ण है । आप लोग विकसित भारत की बात करते हैं, लेकिन मैं नहीं मानता । एक उदाहरण देता हूं– मैं सन् १९७४ में प्रथम बार भारतीय शहर बनारस पहुँचा था । उसके बाद सन् २०११ में वहां पहुँचा । लेकिन बनारस वैसा ही था, जो पहले था । सत्य तो यह है कि १९७४ की तुलना में बनारस में और गंदगी बढ़ गई थी । आज कुछ सुधार तो हो रहा है, लेकिन पर्याप्त नहीं है ।
हमारे परराष्ट्रमन्त्री प्रदीप ज्ञावली जी ने प्रधानमन्त्री की ओर से प्रस्तुत ६ सूत्रीय प्राथमिकता प्रस्तुत किया । ६ सूत्रीय प्राथमिकता में विकास की बात सबसे अन्त में है । राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र, सामाजिक न्याय जैसे विषयों को सबसे आगे रखा गया है, जो वि.सं. २०१२ साल में स्व. वीपी कोइराला ने वीरगंज सम्मेलन में भी कहा था । अर्थात् यह कोई भी नयी बात नहीं है । राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र, समाजवाद तथा सामाजिक न्याय की बात हम लोग सालों से करते आ रहे हैं, आज भी जारी है । लेकिन मेरे खयाल से विकास की बात प्रथम प्राथमिकता में होनी चाहिए ।
२५० साल के इतिहास को समेट कर कान्तिपुर ने कुछ महीने पहले विशेषांक निकालने की तैयारी की थी । २५० सालों की इतिहास में से सिर्फ २५ लोगों को लेना था, जहां पृथ्वीनारायण साह से प्रचण्ड तक थे । परराष्ट्र के क्षेत्रों में से यदुनाथ खनाल को चुना गया । उनके बारे में लिखने के लिए मुझे ही कहा गया । यदुनाथ के बारे में मैं एक बात स्मरण करना चाहता हूं– जब वीरन्द्र वीरविक्रम शाह राजा हो गए, यदुनाथ जी ने एक आर्टिकल लिखा था । उस आर्टिकल में नेपाल की परराष्ट्र नीति के संबंध में कहा गया था । उन्होंने अपने लेख में भूपरिवेष्ठित देश स्वीटजरल्याण्ड और मंगोलिया तथा राजनीतिक और कुटनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मायने रखनेवाला श्रीलंका और पाकिस्तान को प्रस्तुत करते हुए नेपाल के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में भी लिखा था । उन्होंने निष्कर्ष में कहा था– ‘नेपाल की परराष्ट्र नीति विकास पर ही केन्द्रित रहनी चाहिए । यदुनाथ जी का मानना है कि जब तक नेपाल अविकसित रहेगा, तब तक हम लोग सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे । उनका यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष है ।
क्योंकि पृथ्वीनारायण शाह ने कहा है– नेपाल दो पत्थरों के बीच में स्थित फल है । इसके पीछे वही असुरक्षा की अनुभूति है । जंगबहादुर राणा ने नेपाल को १०४ साल तक ‘आइसोलेसन’ में रखा । इसके पीछे जो मनोदशा है, वह भी असुरक्षा से जुड़ी हुई है । २००७ साल में क्रान्ति हुई, हम लोग नये युग में प्रवेश किए । इसी बीच में नेपाल भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में एक सदस्य राष्ट्र के रूप में पंजीकृत हो गया । चीन के साथ कुटनीतिक सम्बन्ध विस्तार हुआ । लेकिन आज भी हम लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं । असुरक्षित महसूस होने के कारण ही राजा वीरेन्द्र ने सन् १९७५ में नेपाल को ‘शान्ति क्षेत्र’ घोषणा करने के लिए राष्ट्रसंघ में प्रस्ताव किया । यहां विद्वान यदुनाथ खनाल की बात स्मरणीय है । उन्होंने नेपाल क्यों हरदम असुरक्षित महसुस करता है, इसके बारे में उल्लेख किया है । उनका मानना है कि हम लोग विकसित नहीं है, इसीलिए असुरक्षित महसुस करते हैं । मैं भी इसी पर जोर देना चाहता हूं– जब तक हम लोग अविकसित रहेंगे, तब तक असुरक्षित ही रहेंगे । इसीलिए प्रधानमन्त्री की प्रथामिकता में विकास संबंध प्रथामिकता सबसे पहले आना चाहिए, जो ६ नम्बर बुँदा में है ।
आज हम लोग भारत की आर्थिक वृद्धिदर के संबंध में बात कर रहे हैं । कहते हैं कि वहां ७ प्रतिशत से अधिक आर्थिक वृद्धिदर है । लेकिन मैं दावे के साथ कहता हूं– अगर भारत भी इसी गति में आगे बढ़ता है तो युरोप की तरह विकसित होने के लिए भारत को और १०० साल लगेंगे । क्योंकि सन् १९७४ में मैंने जो बनारस देखा है, आज भी बनारस वैसा ही है । राजा हरिशचन्द्र के जमाने में जो बनारस था, ५ हजार साल के अन्तराल में भी वह वैसा ही है ।
फिर भी जोर देकर कहता हूं– सिर्फ नेपाल, भुटान, बंगलादेश की ही बात नहीं है, भारत के लिए भी प्रमुख प्राथमिकता आर्थिक विकास ही है । इस में विवाद करने की आवश्यकता नहीं है । इसीलिए नेपाल और भारत साथ–साथ आगे बढ़ने की जरुरत है । दोनों देशों के लिए गन्तव्य एक ही है, यात्रा एक है, जटिलता और सुरक्षा चिन्ता भी एक ही है । दोनों देशों को यह महसूस होना चाहिए । इस सत्य को महसूस करना ही आज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है । उसके बाद परस्परिक विश्वास और सहयोग का वातावरण बनना चाहिए । भारतीय सहयोग के लिए हाथ बढ़ने से और सहयोग के लिए आवश्यक लिष्ट देने से कुछ भी नहीं होगा । सहयोग लेने और देने से पहले होमवर्क होना जरुरी है ।
हमारा विकास किस तरह हो रहा है ? इसके लिए मैं एक अनुभव सहित उदाहरण पेश करना चाहता हूं । कुछ दिन पहले मैंने सिन्धुपाल्चोक, दोलखा, रामेछाप और सिन्धुली की यात्रा की । भूकम्प के बाद लामोसांघु से जिरी तक के लिए राजमार्ग को बिस्तार किया जा रहा था । कहीं जगहों में डोजर से सड़क चौड़ी की गई थी । यहां की जो दुर्दशा है, उसके बारे में पत्रिकाओं में तो मैंने पढ़ा ही था, भ्रमण के दौरान प्रत्यक्ष देखने को भी मिला । डोजर चलने के बाद आज वहां कुछ भी काम नहीं हो रहा है । सडक निर्माण की जिम्मेदारी कोई भारतीय कम्पनी को ही दी गई है । लेकिन लामोसांघु से जिरी तक कहीं भी ५ आदमी देखने को नहीं मिला, जो सड़क निर्माण के लिए काम कर रहे हैं । यह है, हमारी विकास की गति । क्या इस तरह देश को विकसित किया जा सकता है ? नहीं ।
आप वि.सं. २०२५ साल फाल्गुन ९ गते का गोरखापत्र देख सकते हैं । जहां लिखा है कि पृथ्वी राजमार्ग निर्माण के लिए दैनिक १६ हजार मजदूर काम कर रहे हैं और ७ जगहों से काम हो रहा है । अब मुझे बताइए कि नेपाल में जारी कौन–सी एक परियोजनाएं हैं– जहां दैनिक १६ हजार नहीं, १६ सौ मजदूर काम करते हैं ? १६ सौं भी दूर की बात, दैनिक १६० मजदूर काम करनेवाला कोई भी एक प्रोजेक्ट है हमारे पास ? मुझे तो लगता है, नहीं है । नेपाल की हालात यही है, जो हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है ।
भूकंप के तुरन्त बाद नेपाली सेना ने जो काम किया, वह प्रशंसायोग्य रहा । उस समय चारों ओर नेपाली सेना की प्रशंसा हुई थी । लेकिन आज ३ साल बीत चुका है, भूकंप पीडित आज भी दयनीय अवस्था में हैं, उन लोगों का घर निर्माण नहीं हो पा रहा है । मैंने तो कई जगहों में कहा कि भूकंप पीडितों के घर निर्माण के लिए भी नेपाली सेना को जिम्मेदारी देनी चाहिए । सैनिक अधिकारियों ने प्रस्ताव भी रखा लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने जबाव दिया– ‘यह नहीं हो सकता ।’ राजनीतिक नेतृत्व का मानना है कि लोकप्रिय काम सिर्फ सेना ही करेगी तो राजनीतिक नेताओं को देश छोड़ना पड़ेगा, देश सेना के कब्जा में चला जाएगा । हमारे राजनीतिक नेतृत्व में इस तरह की दरिद्र मानसिकता है । इसतरह की नपुंसक दृष्टिकोण से क्या देश बन सकता है ? नहीं । हमारी देश में ९६ हजार सेना है, उसमें से ७४ प्रतिशत सेना व्यारेक में बिना काम रहते हैं । अपने सेना को पुननिर्माण में भेजने की बात होती है तो राजनीतिक नेतृत्व भयभीत होते हैं । क्यों ?
इसीतरह एक और उदाहरण धुर्मुस–सुन्तली का भी है । उन लोगों ने पहाड़ में दो और तराई में दो बस्ती निर्माण किया है । तराई में अधिकांश लोग छठ मनाते हैं । छठपूजा के लिए उन लोगों ने जहां देवी–देवताओं के फोटो रखे हैं, उस जगह धुर्मुस–सुन्तली का भी फोटो है । अर्थात् वे लोग धुर्मुस–सुन्तली को भी भगवान की तरह पूजा कर रहे हैं । हमारे राजनीतिक नेतृत्व क्या यह सब नहीं जानते हैं ? या जानना नहीं चाहते है ? मैं पूछता हूँ– सरकार ने धुर्मुस को क्या दिया है ? निर्माण के लिए आवश्यक समाग्रियों में थोड़ा–सा कर में छूट दिया है । अपने ही घर कोे बेच कर धुर्मुस ने बस्ती निर्माण अभियान शुरु किया । एक धुर्मुस यह सब कर सकता है, लेकिन सरकार कुछ नहीं । इसलिए हमारे राजनीतिज्ञों में कोई भी साहस और वीजन नहीं है, आज की चुनौती यही है । हमारे पास दक्ष जनशक्ति पर्याप्त हैं, लेकिन उस को परिचालन करनेवाले कहां हैं ?
माओवादी जनयुद्ध को दबाने के लिए सन् २००१ में सशस्त्र पुलिस गठन किया गया । आज तो माओवादी जनयुद्ध नहीं है, लेकिन सशस्त्र पुलिस है । उक्त संस्था का औचित्य क्या है ? सशस्त्र पुलिस को विकास निर्माण के लिए क्यों परिचालित नहीं किया जाता ? ऐसी ही गति में आगे बढ़ेगे तो नेपाल विकसित होने के लिए और ५ सौ साल लगेगा ।

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