पर्यटकीय महत्व के दर्शनीय स्थल

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
नियात्रियों का मन सदैव नई–नई जगह की सैर करने के लिए उत्सुक रहता है । उन स्थलों की प्राकृतिक सुंदरता, वेशभूषा, खानपान, संस्कृति, पर्व–त्योहार आदि उनके लिए आकर्षण का विषय होता है । यदि पर्यटकीय क्षेत्र का मौसम भी सुहावना और पर्वतीय सुंदरता एवं हरियाली से भरा हो तो बात ही निराली हो जाती है ।
काठमांडू और इसके निकट के पर्यटकीय स्थल इन्हीं सब विशेषताओं से भरे हैं । अतः मुझे जब भी समय मिला, मैं एक नियात्री के रूप में इन स्थलों की यात्रा में निकलता रहा, क्योंकि यह यह स्थल मेरी पॉकेट के अनुकूल होते हैं और रमणीय होने के अलावा प्राकृतिक सुुंंदरता से भरे हैं । इन स्थानों का चयन करते हुए एक दिन मैं अपने कुछ मित्रों के साथ ककनी पहुँचा, जो काठमांडू से २३ कि.मी. दूर अवस्थित है । बालाजू बस पार्क से हम तीन मित्र– पत्रकार कुमार रंजीत, राजनीतिक मित्र शंकरलाल श्रेष्ठ और मैं ककनी के लिए रवाना हुए । अप्रील का महीना था । सूर्यदेव अपनी ताप बढ़ाते जा रहे थे । तापमान में वृद्धि होने के कारण मेरे दो मित्र सामान्य वस्त्र धारण किए हुए थे जबकि मैने जैकेट पहन रखी थी । मेरे इस परिधान को देखकर मित्रजन हँसते हुए कहने लगे– ‘इस सुहावने मौसम में भी आप जाड़ा महसूस कर रहे हैं ।’ मैंने कहा–‘ नई जगह जा रहे हैं । पता नही, कब मौसम मे परिवर्तन हो जाय । अतः इसे पहनकर निकलना ही उचित समझा । सर्दी मेरे स्वास्थ्य के अनुकूल नही होती ।’ मैने यह बात इसलिए कही थी कि एक बार मसूरी की यात्रा काल में एकाएक बारिश होने के कारण हमें मौसम में हुए परिवर्तन के कारण गरम कपड़े खरीदने की आवश्यकता आ पड़ी थी । हँसी–मजाक करते हुए हम लोग ककनी पहुँचे । तापमान में भी वृद्धि होती जा रही थी । बस से उतरने से पहले ही मुझे जैकेट उतारने की आवश्यकता आ पड़ी । जैकेट को कंधे पर लटकाते हुए हम लोग इधर–उधर घूमते रहे । काठमांडू के मोटर–कार वाले इस स्थल को एक मनोरम पिकनिक स्पॉट के रूप में भी प्रयोग करते हैं । यहाँ से पहाड़ों की सुंदरता का आनंद प्राप्त किया जा सकता है । प्राकृतिक और पर्वत शिखरों की सुंदरता का अवलोकन करते और मौसम का आनंद उठाते हुए हम लोग एक ऐसे उद्यान में पहुँचे जो सन् ज्ञढढद्द में हुई थाई एयरवेज की दुर्घटना में प्राण त्यागने वाले यात्रियों की स्मृति में बनायी गयी थी । उस दुर्घटना में मेरे एक सुपरिचित व्यक्ति भी कालकवलित हुए थे । उनका नाम पढ़ते हुए मैं भावविभोर हो उठा । विमान दुर्घटना की एक विडंबना यह है कि एक ही साथ कई लोगों को कालकवलित होना पड़ता है । मन में एक भारीपन का एहसास करते हुए मैं मित्रों के साथ आगे बढ़ चला ।
घूमते हुए जब थकान महसूस होने लगी तब हम लोग चाय नाश्ता करने के लिए एक चबेनागृह पर पहुँचे । वहाँ पहुँचते ही मौसम ने जो अँगड़ाई ली उससे शरीर में एकाएक कंपन और सिहरन महसुस होने लगी । मैने झट से जैकेट पहन ली पर मेरे मित्रों को ठिठूरन मिटाने के लिए सिकुड़कर बैठने के अलावा और कोई चारा नही था । इस बीच चाय आ पहुँची । चाय का एक अपना ही जायका होता है । इसका स्वाद जहाँ आनंददायी होता है वहीं इस समय यह शरीर के तापमान को बढ़ाने में सहायक हुई । मुझे जैकेट पहने देखकर मित्रजन फिर कहने लगे–‘उपाध्याय जी तो दूरदर्शी निकले, इन पर तो बदलते मौसम का कोई प्रभाव नही पड़ रहा है ।’ अर्थात तात्पर्य यह है कि पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा में निकलते समय, मौसम भले ही गरमी का हो, एक–दो हलका गरम कपड़ा साथ में होना आवश्यक होता है । ककनी काठमांडू के निकट का एक दर्शनीय पर्यटक स्थल होने के अलावा ट्राउट मछली के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध स्थल है । कहावत है–मांसाहारी पर्यटक की ककनी यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती है जब तक वह यहाँ आकर ट्राउट मछली का स्वाद प्राप्त नही करता या घर के लिए सौगात के रूप में ट्राउट नही ले जाता । ककनी के ऊँचाई से काठमांडू के दृश्य का भी अवलोकन होता है । निकटवर्ती क्षेत्र होने के कारण शाम होते हुोते हम लोग काठमांडू वापस लौट गए ।
नियात्री के रूप में मेरी दूसरी यात्रा बंदीपुर की हुई । बंदिपुरे उकालो… नामक एक नेपाली गीत ने मुझे अपनी सेवा काल में इस स्थल से परिचित कराया था । अतः काठमांडू से लगभग ज्ञघछ कि.मी. दूर अवस्थित इस स्थल की यात्रा मेरे लिए रोमांचकारी रही । इस यात्रा में मेरे साथ मेरे अपने तीन भाइ लोग थे । समुद्र की सतह से लगभग ज्ञण्छण्मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित इस पर्वतीय नगरी में नेवार, गुरुंग और मगर समुदायों की अधिकता होने के कारण यहाँ विभिन्न संस्कृति का आनंद उठाया जा सकता है । पर इसके लिए नियात्रियों को द्द(द्ध दिन रुकने की आवश्यकता पड़ सकती है । इतनी ऊँचाई पर अवस्थित होने के कारण यहाँ की सड़कों में कई मोड़ आते हैं जो यात्रा को रोमांचकारी और दुष्कर दोनों बनाते हैं । इन सारे मोड़ों ओर ऊँचाई को पार करते हुए की जाने वाली यात्रा उस समय रोमांचकारी हो जाती है जब किसी विश्राम स्थल पर बैठकर पहाड़ों से निकलती शीतल बयार और विभिन्न हिम शिखरों की सुंदरता का आनंद प्राप्त किया जा सके । इस प्रकार के विश्राम पर्यटकों का मन मोह लेती हैं और सारी थकान छूमंतर हो जाती है । पर्यटकीय नगरी होने के कारण यहाँ विभिन्न वर्गों के पर्यटकों के लिए अनेक होटल, रिजॉर्ट और गेष्ट हाउस आदि हैं । मंदिर और गुंबा आदि यहाँ के लोगों के मुख्य धार्मिक स्थल हैं । बच्चों के लिए आधुनिक शिक्षा के केंद्र है । यहाँ के अधिकांश लोग व्यापारिक समुदाय के हैं, अतः पर्वतीय स्थल होने के बावजूद लोेगों का जीवन स्तर उन्नत पाया जाता है ।
यात्रा दूर की न हो तो मैं रात का समय घर में बिताना ही उपयुक्त समझता हूँ । अतः कुछ समय वहाँ घूमने, बंदीपुर की सुंदरता का अवलोकन करने और भौगोलिक जानकारी प्राप्त करने में बिताने के बाद हम लोग काठमांडू के लिए चल पड़े । लौटते हुए रास्ते में मनकामना देवी का मंदिर पड़ा । दूर से ही देवी माता को स्मरण करते और उनके लिए सिर झुकाते हुए हम लोग शाम होते होते काठमांडू लौट गए । क्रमशः…..

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