कर्मयोग

गीता व्यवहारिक वेदान्त का सर्वाधिक प्रमाािण्त ग्रन्थ है । इसका प्रमुख उद्देश्य मानव मात्र को निष्काम भाव से निज कर्तव्य पालन हेतु संलग्न कर उसे आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करना है । भगवान श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट रूप से इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि कर्म से किसी भी प्रकार से वंचित नहीं रहा जा सकता । जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त यह प्रक्रिया अबाध गति से गतिशील है । जीवन के प्रत्येक क्षण में कर्म अनिवार्य रूप से सम्बद्ध है । जीवन की गतिशीलता कर्म के द्वारा ही निर्धारित होती है ।
इसीलिए गीता में कहा गया है कि कर्म किए बिना कोई भी प्राणी क्षण मात्र भी जीवित नहीं रह सकता । कर्म प्रकृति का अनिवार्य परिणाम है, किन्तु इसका निर्धारण करना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किया जाए । वस्तुतः गीता में कर्म की गति को अति गहन कहा गया है । कर्मो की इस गहनता के विषय में विद्वान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं । प्रत्येक मनुष्य में सत्यम् शिवम् सुन्दर’ की अनुभूत करने की एक नैसर्गिक प्रवृत्ति है । इस अनुभूति को ज्ञान, कला और प्रेम के रूप में अभिव्यक्त करने की हममें एक चरनात्मक अभिलाषा होती है । कर्म तभी सार्थक हो सकता है, जब यह उच्चतर अनुभूति की साधना तथा आत्म–अभिव्यक्ति की प्रक्रिया के रूप में धारण कर लेता है । स्वामी विवेकानन्द जी के मतानुसार हम किसके अधिकारी है, हम अपने भीतर क्या ग्रहण कर सकते हैं, इन सब का निर्धारण कर्म के द्वारा ही होता है । अपनी वर्तमान अवस्था के जिम्मेदार हम ही है, और जो कुछ हम होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कार्यो द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है । अतः एवं हमें यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किया जाए ।
गीता के अनुसार ‘कर्मयोग का अर्थ है– कुशलता से अर्थात् वैज्ञानिक प्रणाली से कर्म करना, कर्मानुष्ठान की विधि को भलीभांति जानने से मनुष्य को श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो सकता है । यह स्मरण रखना चाहिए कि समस्त कर्मों का उद्देश्य है मन के भीतर पहले से ही विद्यमान शक्ति को प्रकट कर देना या आत्मा को जाग्रत कर देना । प्रत्येक मनुष्य के भीतर पूर्ण शक्ति और पूर्ण ज्ञान विद्यमान है । भिन्न–भिन्न कर्म इन महान् शक्तियों को जाग्रत करने तथा बाहर प्रकट कर देने में साधन मात्र है । अर्जुन क्षत्रिय है, अतः उसका स्वभाविक, सहज एवं स्वधर्म युद्ध है । महाभारत का युद्ध अर्जुन पर परिधिवश थोपा गया, अतः वह धर्म है । इस प्रकार का धर्मयुद्ध भाग्यवान क्षेत्रीयजन प्राप्त करते हैं । भगवान श्रीकृष्ण इस धर्मयुद्ध की ओर अर्जन का ध्यान आकर्षित कर उसे युद्ध हेतु प्रेरित करते हैं । इस धर्मयुद्ध में अर्जुन के समक्ष उसके प्रतिपक्षी गुरुजन, पारिवारिकजन और मित्रगण है । युद्ध में गुरुजनों और संगे–सम्बन्धियों की मृत्यु का विचार अर्जुन को भयभीत कर रहा है । परिणामतः वह युद्ध से विमुख होकर संन्यास ग्रहण करना चाहता है ।
परमाथिक दृष्टिकोण से निश्चय ही एक ही परमतत्व परमात्मा सबसे विद्यमान है, परन्तु व्यवहारिक दृष्टिकोण से सभी जीवात्मा है । आत्मदृष्टि से भले ही पाप का प्रश्न उपस्थित न हो, किन्तु देह दृष्टि से यह दोनों एक ओर आग्रसर होते हैं । इस परिस्थिति में युद्ध भले ही क्षत्रियों का धर्म हो, परन्तु इससे होनेवाली हिंसा का पाप किस प्रकार दूर होगा । यही अर्जुन का द्वन्द्व है । अर्जुन की इसी द्वन्द्वात्मक मनःस्थिति के निराकरण हेतु भगवान श्रीकृष्ण उसे कर्मयोग के माध्यम से युद्ध हेतु प्रेरित करते हैं । कर्मयोग में भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मदृष्टि की पारमार्थिकता और देह दृष्टि से युद्ध को धम्र्य अर्थात् कर्तव्य–कर्म स्वीकार करना है, जबकि आत्मिक दृष्टि से युद्ध से प्राप्त होनेवाले परिणाम के प्रति समत्व बुद्धि का अभ्यास करना है । अतः भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ‘सुख–दुःख, लाभ, हानि, जय–पराजय को समान समझ फिर तुम युद्ध के लिए प्रवृत हो जाओ । इस प्रकार कर्तव्य कर्म करने से तुम्हें पाप स्पर्श भी नहीं कर सकेगा ।
इस प्रकार के कर्तव्य कर्म से वासना चरितार्थ नहीं होती अपितु शास्त्र एवं गुरु के आदेशों का पालन अन्तर्निहित होता है । अतः ऐसे कर्तव्य कर्मो में जो आनुषंगिक दोष होते हैं, वे हमें स्पर्श भी नहीं कर पाते हैं । यह कर्मयोग का शाश्वत रहस्य है ।
कर्म, कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सब का हित करनेवाली हो ।

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