प्रदेश नं.२ में स्थानीय चुनावों के नीहितार्थ-कुमार सच्चिदानन्द

मधेश की त्रासदी यह है कि उसकी आवाज को बेअसर साबित करने के लिए राज्य ने कोई कसर नहीं छोड़ी

इस संशोधन विधेयक के पक्ष में और विपक्ष में जो मतदान हुए उससे न केवल क्षेत्रीय वरन वैश्विक स्तर पर यह संदेश तो स्पष्टतः गया कि निश्चित रूप से यहाँ कुछ समस्याएँ हैं जिनका संबोधन होना शेष है

हमें सावधान रहना ही चाहिए कि इन चुनावों में जिस अन्दाज में पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं, उसे देखते हुए कुछ अपवादों को छोड़कर किसी सत्य हरिश्चन्द्र के अवतार की परिकल्पना तो नहीं ही की जा सकती । लेकिन तुलनात्मक रूप से सही और ईमानदार प्रतिनिधियों को चुनने का अवसर आज जनता के हाथ में है


नव–गठित अन्य प्रदेशों की तरह ही देर से ही सही प्रदेश नं.२ में भी स्थानीय चुनावों का विगुल फूँका जा चुका है और मनोनयन पंजीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है । इसके साथ ही चुनावी दंगल में ताल ठोके जा रहे हैं, पैतरे बदले जा रहे हैं और मतदाताओं को लुभाया जा रहा है । कुछ अर्थों में यह चुनाव खास है क्योंकि लगभग दो दशकों के बाद यह हो रहा है । इसलिए लम्बे अर्से के बाद गली मुहल्ले के उन नेताओं को किसी राजनैतिक पद पर जाने का इसने अवसर दिया जिनकी महत्वाकांक्षाएँ सुषुप्त थीं । कुछ महत्व प्राप्त कर चुके राजनीतिकर्मी भी अवसर के हिसाब से इस पर नजर टिकाए बैठे थे । इसलिए समग्र रूप से नेताओं और कार्यकर्ताओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है । लेकिन आमलोगों की मनःस्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं क्योंकि भले ही स्थानीय निकायों का चुनाव दो दशकों के बाद हो रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है कि चुनाव भी दो दशकों के बाद हो रहा है । हर चुनाव में लोग विजयी हुए हैं और उन्हें अवसर भी मिला है । लेकिन इन अवसरों का प्रयोग जनहित में उतना नहीं हो सका जितनी कि अपेक्षा की जाती थी । सबसे बढ़कर पद और अवसर के लिए जो अभ्यास यहाँ हुए हैं और इसके मिल जाने के बाद इसका जो सदुपयोग या दुरूपयोग यहाँ हुआ है, वह किसी से छुपा नहीं है । इसे देखते हुए आम जनता में राजनीति और राजनीतिकर्मियों के प्रति कोई सकारात्मक संदेश नहीं है । इसलिए आज विभिन्न दलों के नेता और कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर गली और मुहल्ले तक के विकास की योजनाएँ बनाकर जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं, वे सारे डपोरशंखी दावे के सिवा उन्हें और कुछ नहीं लगता और इसे सुनना आमलोगों के लिए मसखरा मात्र लगता है । फिर भी चुनाव है तो इसकी प्रक्रिया पूरी होगी और यह सम्पन्न होगा । लेकिन यह गौर करने की बात है कि यह चुनाव खास है क्योंकि यह २ नं. प्रदेश का विशेष चुनाव है । इसलिए इसके नीहितार्थ भी अलग हैं ।
सर्वविदित है कि मधेश अपने स्वाभिमान और पहचान की लड़ाई लड़ रहा है । इस क्रम में उसने कई चरणों के आन्दोलन भी किए और चढ़ाव–उतार भी देखा लेकिन मधेश की त्रासदी यह है कि उसकी आवाज को बेअसर साबित करने के लिए राज्य ने कोई कसर नहीं छोड़ी । एक ओर उसकी संवेदना का मखौल उड़ाया गया तो दूसरी ओर विभिन्न चरणों के आन्दोलन से स्थापित अधिकारों को भी नए संविधान में या तो सीमित कर दिया गया या समाप्त कर दिया गया । मधेश की माँगों के प्रति जो प्रतिक्रिया उभरकर सामने आयी उसे देखकर यह साफ लगा कि राज्य किसी भी हालत में उनकी माँगों को मानने की स्थिति में नहीं है । मधेश और उसकी संवेदना का इस तरह अवमूल्यन का सबसे बड़ा कारण था कि संसद या संविधानसभा में उसकी कमजोर उपस्थिति । यही कारण था कि बिना किसी बहस फास्ट ट्रैक से संविभान की धाराओं को पारित किया गया और इसके विरोध में उठी आवाजों के पूरी तरह खारिज कर दिया गया । एक तरह से देखा जाए तो इसके लिए सारे बड़े दल जिम्मेवार थे । ह सच है कि इन स्थानीय निकायों के चुनाव से न तो संसद में मधेश का प्रतिनिधित्व होगा और न ही विधायी स्तर पर नीति निर्माण में इनकी कोई भूमिका होगी । मगर इन चुनावों के परिणाम से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी । अगर मधेश की राजनीति करनेवाले दलों को सम्मानजनक स्थिति प्राप्त होती है तो इससे स्पष्ट संकेत जाएगा कि मधेश के मुद्दे अभी मरे नहीं हैं और कभी भी जागृत होकर अपनी व्याप्ति में पूरे क्षेत्र को अशांत कर सकता है । ठीक इसके विपरीत अगर राष्ट्रीय शक्तियाँ अपनी असरदार उपस्थिति दायर करती है तो इसका यह साफ–साफ संदेश होगा कि मधेश के मुद्दे फिलहाल नेपथ्य में चले गए हैं और इसकी अवाज की उपेक्षा कर भी इस समुदाय पर शासन किया जा सकता है ।
यह सच है कि औपचारिकता निर्वहन करने के लिए ही सही पिछले दिनों मौजूदा सरकार ने मधेश के मुद्दों को सम्बोधित करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जिसे न पारित होना था और न हुआ । लेकिन इस संशोधन विधेयक के पक्ष में और विपक्ष में जो मतदान हुए उससे न केवल क्षेत्रीय वरन वैश्विक स्तर पर यह संदेश तो स्पष्टतः गया कि निश्चित रूप से यहाँ कुछ समस्याएँ हैं जिनका संबोधन होना शेष है । इस तरह उन दलों और इस संशोधन विधेयक के विपक्ष के पैरवीकारों के मुँह पर भी तमाचा लगा जो गर्दन ऊँची कर यह दावा करते थे कि यह संविधान ९० प्रतिशत सभासदों के समर्थन से पारित हुआ है, इसलिए यह विश्व का उत्कृष्ट संविधान है । सवाल है कि अगर यह विश्व का उत्कृष्ट संविधान है तो इतना शीघ्र संशोधन की क्या आवश्यकता आन पड़ी ? फिर संशोधन के पक्ष में जो मतदान का प्रतिशत है, आखिर उसका संदेश क्या है ? स्पष्ट है कि न तो मधेश मरा है और न मुद्दे मरे हैं । अगर यह दबा हुआ है तो महज इसलिए कि मौजूदा संसद का अंकगणित इसके पक्ष में नहीं और राष्ट्रीय राजनीति करने वाले कुछ दल इसके सन्दर्भ में दुराग्रह के चरमोत्कर्ष पर बैठे हैं । इसलिए यह चुनाव यह सिद्ध करने का अवसर है कि मधेश विभाजित तो है मगर इतना नहीं कि वह तथ्यों को नहीं समझता ।
आज मधेश में चुनाव की दहलीज पर देखा जा रहा है कि जो मधेश की राजनीति करने वाला दल हो या राष्ट्रीय राजनीति करने दावा करने वाला दल, सभी उत्साहित हैं । कारण साफ है कि मधेश आन्दोलन के समय सड़कों पर उतरने वाली जो भीड़ थी, उसमें न तो कोई दल था और न कोई जाति या सम्प्रदाय ही । मगर चुनाव की घोषणा होते ही इस भीड़ का कुछ अंश दलों के कार्यकर्ता के रूप में परिणत हो गए और कुछ खामोश होकर बैठे हैं जिसे हम आमलोग कहते हैं । यह तो हमें मानना ही चाहिए कि दलों के नेता और कार्यकर्ता तो वास्तव में कथित सिद्धान्त और व्यकिगत स्वार्थ के आधार पर किसी भी पार्टी के प्रति संचालित होते हैं । मगर परिवर्तन का वाहक तो वह गुमसुम और खामोश जनता है जो चुपचाप रहती है और संवेदना के स्तर पर मतदान करती है । इसके लिए न तो कोई दल महत्वपूर्ण होता और न ही कोई झाँसा । यह सच है कि इनकी संवेदना में कभी–कभी सेंध लगने की बातें भी सामने आती है । कारण अनेक चुनावी हथकण्डे हैं । लेकिन निर्णायक यही वर्ग है । इसलिए यह चुनाव यह संदेश देगा कि क्या इस वर्ग को गुमराह कर भी क्या चुनाव जीता जा सकता है ?
आज जो भी दल चुनाव के मैदान में उतरे हैं वे खाली हाथ नहीं उतरे और उनके पास गाँव–नगर–महानगर और यहाँ तक कि गली–मुहल्ले को आदर्श बनाने की स्पष्ट योजना है । लेकिन प्रायः राष्ट्रीय दलों के राष्ट्रीय एजेण्डे से यह मुद्दा गौण है । यह सच है कि हर चुनाव में हर दल विकास को मुद्दा बनाता है लेकिन सत्ता की आपाधापी के बीच विकास की रोशनी और बातें धीमी पड़ जाती हैं । इस बात को भी हमें समझनी ही चाहिए कि देश के समग्र विकास के लिए आवंटित राशियों का या तो उपयोग नहीं हो पाता या सही उपयोग नहीं हो पाता । इसलिए हमें यह भी समझना चाहिए कि जब तक देश मजबूत नहीं होगा तब तक शासन की समस्त ईकाइयों के मजबूत होने की बाते ख्वाबी पुलाव के अतिरिक्त कुछ नहीं है । इसलिए स्थानीय निकायों के चुनाव में जो दल या उम्मीदवार भौतिक पूर्वाधार और विकास की लम्बी–लम्बी बातें और वादे लेकर जनता के बीच जा रहे हैं उसे डपोरशंखी वादों के सिवा और कुछ नहीं माना जा सकता । इस चुनाव के द्वारा आमलोग इस क्षेत्र में क्रियाशील दलों और इसके नेताओं को यह संदेश दे सकती है कि राजनीति करने वालों की चिकनी–चुपड़ी बातों का अर्थ वह समझती है और अब वह गुमराह होने की स्थिति में है या नहीं ?
आज स्थानीय निकाय के चुनावों में भाग ले रही राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों को मधेश आधारित क्षेत्रीय दलों, विशेषतः राजपा और संघीय समाजवादी फोरम से कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है । यह सच है कि जो उम्मीदवार हैं, उनके लिए मुद्दा अवसर का है लेकिन जो आमलोग है उनके लिए यह मुद्दा संवेदना का है । यही कारण है कि आज आन्दोलन राष्ट्रीय दल और उसके नेतागण भी स्थानीय मुद्दे को वहन करने लगे हैं तथा एक तरह से क्षेत्रीय दलों पर कभी अवसरवादिता तो कभी फूट और कभी दल बदलने के आरोपों को लेकर मधेशवादी पार्टियों को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है । लेकिन ऐसे लोगों को मधेश के आमलोगों को यह भी समझाना चाहिए कि जब मधेश में दमन हो रहा था तब उनकी संवेदना कहाँ थी ? जब एक स्वर से मधेश ने मौजूदा संविधान को अस्वीकार करने की आवाजें उठायीं, उस समय उनकी खामोशी का राज क्या था । जिस समय निरीह और निहत्थी जनता पर गोलियाँ बरसायी जा रही थी उस समय वे कहाँ थे ? आज उनके हृदय परिवर्तन का कारण क्या है ? आज जो बातें की जा रही हैं, उन बातों की विश्वसनीयता का आधार क्या है ? सीधी सी बात है कि यह चुनावी हवा है और इसमें बातें चक्रवात में कागज के टुकड़े की तरह उड़ती हैं ।
एक बात तो मानी जा सकती है कि स्थानीय निकायों के चुनावों को दलगत आधार पर कराकर समाज को राजनैतिक रूप से बुरी तरह विभाजित कर दिया गया है । शहरी क्षेत्र में जहाँ पहचानहीनता की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक होती है, वहाँ तो यह विभाजन सतह पर नहीं दिखलाई देता लेकिान ग्रामीण इलाकों पर इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है । यह सच है कि बीस वर्षों की राजनैतिक शून्यता ने इस भावबोध को थोड़ा कम कर दिया था । लेकिन इस चुनाव के बाद इसके गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन इस शून्यता की स्थिति में एक और प्रवृति हावी हुई है और वह है सर्वदलीय संयंत्र के माध्यम से मिल–बैठकर अवसर और लाभ का वंदरबाँट करना । इन चुनाव के परिणामों से जब नव–निर्वाचित प्रतिनिधि स्थानीय निकायों की कमान अपने हाथों में सँभालेंगे तो सर्वदलीय संयंत्र की अवधारणा खत्म होगी और अधिकारी व्यक्तियों द्वारा ही समस्त योजनाओं का संचालन होगा । इसके साथ ही स्थानीय तंत्र पर जो लालफीताशाही का चस्पा लगा है, उसका अंत होगा और योजनाओं के जनमुखी होने की संभावनाएँ है ।
एक तरह से देखा जाए तो इस चुनाव को विशिष्ट इसलिए कहा जा सकता है कि इससे स्थानीय स्तर पर एक शून्यता का अंत होगा और जनता के प्रतिनिधियों के हाथों में शासन की बागडोर आएगी । लेकिन यह इसका भी निर्धारण करेगा कि आम लोगों के लिए विकास का सब्जबाग महत्वपूर्ण है या उसकी अस्मिता । अगर आमलोगों ने अपने पहचान के संघर्ष पर मुहर लगायी या ऐसे दलों के उम्मीदवारों को चुना जो मधेश के लिए मित्रवत् है या नाटक ही सही मगर मधेश की समस्याओं के पक्ष में बात करता है तो भविष्य में राष्ट्रीय नीतियाँ भी मधेशमुखी हो सकती है और जो धुर विरोधी शक्तियाँ हैं उसके भी मनोबल को गिरने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यहाँ लोकतंत्र है और इसमें जनाकांक्षाओं को बहुत दिनों तक उपेक्षित करके नहीं रखा जा सकता । इस बात के प्रति तो हमें सावधान रहना ही चाहिए कि इन चुनावों में जिस अन्दाज में पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं, उसे देखते हुए कुछ अपवादों को छोड़कर किसी सत्य हरिश्चन्द्र के अवतार की परिकल्पना तो नहीं ही की जा सकती । लेकिन तुलनात्मक रूप से सही और ईमानदार प्रतिनिधियों को चुनने का अवसर आज जनता के हाथ में है । इसका सदुपयोग होना ही चाहिए ।

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