Tue. Sep 18th, 2018

मैं खुद ही रोती हूँ और खुद ही चुप हो जाती हूँ । क्योंकि चुप कराने वाली और मुझे मनाने वाली मेरी मां जो अब नहीं हैं


अब कौन बचाएगा जिंदगी के संघर्ष में मिलने वाले धूप, गर्मी, बारिश और गम से ? शायद कोई नहीं या शायद मां ही पूण्य आत्मा बन कर उपर से बचाएगी अपनी इस सब से छोटी और लाडली बेटी को


मां का अतिंम संस्कार कर के देवघाट से लौटने के बाद की पहली रात मेरी मां के बिना जिदंगी की पहली रात थी जिसे मुझे अकेले गुजारना पड़ा । बचपन में एक ही बेड में और बडे होने पर अगल–बगल के बेड पर मां के साथ बिताई हुई अनगिनत रात मेरी जिंदगी के बहीखाते में याद बन कर दर्ज है

‘माँ’ इस एक शब्द में पूरी कायनात समायी हुई है । मां के गर्भ से सृष्टि ही नहीं होती प्रेम और विश्वास की वृष्टि भी माँ ही करती है । माँ जो उत्साह और हिम्मत का अजस्र स्रोत है । वही स्रोत मेरी जिदंगी मे सूख गया है हमेशा के लिए । मां की सांसों की डोर जैसे ही टूटी मेरी जिदंगी से, बरसों से चली आ रही लय भी टूट गयी । सुबह उठते ही माँ, रात को सोते समय भी माँ । वो सिर्फ माँ नहीं थीं, मेरे दिल की धड़कन थी जिससे मैं हर पल साँस लेती थी और जिंदा रहती थी ।
पर अब जिदंगी रुक सी गयी है । शरीर है पर उस में प्राण नहीं है । मेरे अंदर प्राण के रूप में तो माँ थी, जब वही चली गयी एक अनंत यात्रा में तो मेरा शरीर माटी का पुतला रह गया है । माँ के जाने के बाद हर सुबह जब मैं उठती हूँ तो आश्चर्य में पड़ जाती हूँ कि, ‘अरे ! मैं तो अभी तक जिंदा हूँ ।’ क्योंकि बचपन में सभी माँ के प्रति मेरा लगाव और प्रेम देख कर कहते थे कि यह माँ के बिना जिंदा नहीं रहेगी । पर अभी जिन्दा हूँ, एक मशीन की मानिंद । जैसे कोई मुझ से यह सब करवा रहा है और मैं यंत्रवत कर रही हूँ । माँ का जाना एक बहुत बड़ा खालीपन छोड़ गया है, जो कभी नहीं भर सकेगा । हर चीज पर माँ की छाप और उनकी याद जुड़ी हुई है ।
बचपन में सभी मुझे माँ की पूंछ कहते थे । माँ जहां जाती थी मैं भी चली जाती थी और सब कहते ‘वह देखो अपनी माँ की पूंछ आ गई ।’ माँ भी मुझे अपने से कभी अलग नहीं करती थी । रिश्तेदार कहते थे ‘इसकी शादी होगी न तो यह दहेज में अपनी माँ को साथ ले जाएगी ।’ और माँ भी हंस कर कहती थी, ‘मैं इस के दहेज में चली जाउंगी ।’ पर आज मां हमेशा के लिए चली गई, राख हो कर अंतरीक्ष मे विलीन हो गई पर मैं उनकी पूंछ उन के साथ न जा सकी ।
मैं मां से इतनी ज्यादा सटी हुई थी कि, रात में सोते समय उनकी साड़ी का पल्लू अपने हाथ में बांध कर सोती थी । रात में माँ बाथरुम जाने के लिए भी उठती तो उनका खाली बिस्तर देख कर मैं डर जाती और चिल्लाने लगती । उसी मां को जब मुखाग्नि दे कर मैंने अग्नि को सुपुर्द किया तो धू–धू कर जल रही चिता और राख बनती जा रही अपनी मां को देखना और उस कष्ट साध्य दृश्य को देखना अपने–आप में मरने के समान है । मरने के बाद भी मृत शरीर जब तक रहता है तब तक लगता है अभी भी कुछ बांकी है, पर जलाने के बाद तो अस्तित्व राख बन जाता है । वह दृश्य मेरी जिंदगी का सबसे दुखपूर्ण और यादगार लम्हा है जिसे मैं घंटो तक रोते हुए चुपचाप निहारती रही । एक इंसान कैसे शरीर से राख में तब्दील हो जाता है मैंनें उसी दिन महसूस किया । सच में इंसान मिट्टी का ही ढेर है जो अंत में पानीं में बह कर मिट्टी बन जाता है ।
मां का अतिंम संस्कार कर के देवघाट से लौटने के बाद की पहली रात मेरी मां के बिना जिदंगी की पहली रात थी जिसे मुझे अकेले गुजारना पड़ा । बचपन में एक ही बेड में और बडेÞ होने पर अगल–बगल के बेड पर मां के साथ बिताई हुई अनगिनत रात मेरी जिंदगी के बहीखाते में याद बन कर दर्ज है । मैं मां की सबसे छोटी बेटी और सब से लाडली थी । मां ही मेरी दोस्त, भाई, बहन और सब कुछ थी । मां से ही मैं अपने मन की बात बांटती थी । मां भी अपने सभी गम और बातें मुझ से खुल कर कहती थी । मां की इच्छा थी कि मैं अपने पैंरो पर खड़ी हो कर अपने बलबुते पर नाम कमाउंm । जब मुझे पत्रकारिता के लिए पुरस्कार और विभिन्न संस्थानों से सम्मान किया गया तब मां बहुत खुश हुई थी और कहा था ‘मेरे सभी बच्चों में इसी ने मेरा मान बढाया ।’ सब को मेरा पुरस्कार, प्रशंसा पत्र और सम्मान पत्र खुश हो कर दिखाती थी । मेरा लेख पत्रिका में छपता तो जैसे–तैसे कर के पढती नहीं तो उस लेख को हाथ से छू कर निहारती रहती थी ।
मां से मैं झगडा भी करती और धमकी भी देती थी यदि वह खाना नहीं खाएगी तो मैं भी नहीं खाउंगी तो वह तुरंत मान जाती थी । वैसा ही मां भी मेरे साथ करती और गलती हो जाती और मैं नाराज हो जाती तो कान पकड़ कर ‘सॉरी’ कहने में भी नहीं शर्माती थी । मैं अपने काम से कहीं चली जाती या बाजार जाती तो बरामदा में कुर्सी रख कर बाहर की ओर ताकती और मेरी बाट जोहती रहती थी । जब तक मैं नहीं आ जाती थी, वह टकटकी लगाए देखती रहती थी । मां को भी मुझ से उतना ही लगाव और प्रेम था जितना कि मुझे । इसीलिए जो भी उनसे मिलने आता सब से मेरी ही चिंता करती थी । बीमारी के कारण तो उनकी यह चिंता और ज्यादा बढ़ गइ थी कि मेरे बाद यह कैसे रहेगी ? रिश्तेदारों के स्वार्थी व्यवहार का उनको पता लग चुका था । वह जान चुकी थी कि उसके मरने के बाद कोई इस को सहारा नहीं देगा न सहयोग ही करेगा ।
मां सब से प्रेम करती थी और सभी का हित चाहती थी । उन्होनें सभी का भला सोचा और मेरे लिए सब से लड़ी और मेरा साथ दिया । मेरी मां वास्तव में एक योद्धा थी जो लड़की या बेटी के पक्ष में हमेशा खड़ी रही । इसीलिए बेटों के होते हुए भी मां ने अपनी दागबत्ती या मुखाग्नि की क्रिया मेरे हाथों से करने की इच्छा जतायी थी जिसे मंैनें पूरा किया । यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि, मेरी मां मुझ से कितना प्यार करती है, या करती थी । वास्तव में मेरी मां तो उसी दिन मर गई थी जिस दिन उनके छोटे बेटे ने उन्हे अपने घर से निकल कर आश्रम या वीरगंज चले जाने के लिए कहा था । मां की पहली मौत तो उसी दिन हो गई थी जब छोटे बेटे ने उन पर हाथ उठाया था । दूसरी मौत मां की तब हुई थी जब गत १९ नवंबर को वीरगंज आ कर उनके चार संतानो ने उनका मोलतोल किया था । एक करोड़ रुपए के बदले में मुझ से मेरी मां यानि कि मेरी जान की कीमत लगाई थी । उसके अगले दिन से मां बीमार पड़ गई और कहा था ‘लगता है यह चारों मेरी काल बन कर आए थे और मेरी जान ले कर ही मानेंगे । इन को मेरा जिंदा शरीर कभी देखने को न मिलें ।’ और हुआ भी ऐसा ही मेरे अलावा उनके बांकी संतानो ने उन्हे जिंदा नहीं देखा । जिस दिन मां सचमुच में मरी वह तो उन का सिर्फ भौतिक शरीर था । मर तो वह उसी दिन गयी थी जब उनके अपने जायों नें उनके साथ दुव्र्यवहार किया था । आत्मा मर चुका थी सिर्फ शरीर जिंदा था जिसे उस दिन देवघाट में अग्नि को समर्पित करने के बाद मां चिता की सेज में सुकून की गहरी नींद सो गई और अनंत ब्रह्माण्ड में समा गई ।
मैं अकेली और तन्हा मां की यादों के कारवां को घर और अपने दिल में समेटे पीछे रह गयी । कितनी बात अनकही रह गई । मैं खुद ही रोती हूँ और खुद ही चुप हो जाती हूँ । क्योंकि चुप कराने वाली और मुझे मनाने वाली मेरी मां जो अब नहीं हैं । मां तो घर का वह मजबूत खंबा थी जिस पर सारा घर टिका हुआ था । जिस दिन मां नाम का खंबा ढहा सारा घर बिखर कर रह गया । मां तो घर का वह छत थी जो जिंदगी धूप, बारिश और गम से बचाती थी । पर वह छत काल की आंधी या भूकंप से उड़ गया । अब कौन बचाएगा जिंदगी के संघर्ष में मिलने वाले धूप, गर्मी, बारिश और गम से ? शायद कोई नहीं या शायद मां ही पूण्य आत्मा बन कर उपर से बचाएगी अपनी इस सब से छोटी और लाडली बेटी को । ‘मां आप को मेरी तरफ से सहस्त्रों बार अश्रु पूरित श्रद्धाजंली है । आप के बिना मैं अधूरी और एकाकी हो गई हूँ । मां मुझे अपने पास बुला लो मां । मेरा मन यहांँ बिल्कुल नहीं लगता । मां मैं भी आप के पास आना चाहती हूँ मां ।’

“मेरी दुनिया हैं मां तेरे आंचल में,
सुख की छाँव है तू दुख के जगंल में ।”

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