क्या आवश्यक पूर्वाधार और मधेश को नकार कर चुनाव सम्भव है ?

जिस चुनाव में मधेसी का विरोध हो उस चुनाव की सफलता असफलता का विचार किये बिना चुनाव की मिति घोषणा करना कितना उपयुक्त कदम ?


जनता अपने अधिकार के प्रति जागरूक हो रही है, राजनैतिक घटनाक्रम को नजदीक से देखना,अध्ययन करना, विश्लेषण और भविष्य का आंकलन करना अपना दायित्व समझने लगी है तो क्या अब ऐसे समय में छल प्रपंच की राजनीति टिक सकती है ?

 

दुनियां की प्रचलित राज्य व्यवस्था सर्वोत्तम व्यवस्था लोकतान्त्रिक व्यवस्था है जो जनता को अपना नेता चुनने का पूरा हक और अधिकार देती है । वर्तमान में करीब करीब दुनिया के हरेक देश में यह पद्धति अभ्यास में है जिसमें जनता द्वारा बनाए गए संविधान के माध्यम से जनता को नेता चुनने और नेताओं के अधिकार कार्य सीमा एवम् प्रणाली को निर्धारित किया जाता है । सही माने तो संविधान के माध्यम से लोकतंत्र के मर्म को समझते हुए अगर इसका अभ्यास किया जाय तो इस व्यवस्था से देश के हरेक क्षेत्र, तबके और वर्ग के लोगों की उनके क्षमता अविवर्धन के साथ क्षमता अनुसार भरपूर प्रगति की ओर अग्रसर किया जा सकता है । हालाँकि यह पद्धति भी नकारात्मकता से अछूता नही है लेकिन अन्य शासकीय पद्धति के अनुपात में अगर लोकतान्त्रिक पद्धति को सही तरीका से प्रयोग में लाया जाय तो इसके जैसा अन्य राज्य व्यवस्था की पद्धति और नही है । शुरुआती दौर में जहाँ जहाँ यह पद्धति लागू हुई हर देश में कुछ समय तक राजनैतिक अव्यवस्था एवम् अस्तव्यस्तता रही परन्तु समयानुसार जनता नेता एवम् विद्वत समूहों द्वारा समस्याओं का निराकरण करते हुए लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान करना ही कल्याणकारी सिद्ध हुआ है और देश अग्रगमण को प्राप्त हुआ है ।vote
वर्तमान में नेपाल भीं लोकतान्त्रिक अभ्यास के प्रथम चरण में है एवम् राजनैतिक अस्थिरता, अस्तव्यस्तता से गुजर रहा है और उस से निकास पाने के लिए आम जनमानस में एक छटपटाहट सी दिख रही है । यह छटपटाहट कभी कभी क्रोध की सीमा को पार करते हुए विद्रोह का रूप भी लेता है । नेपाल की राजनैतिक घटनाक्रम करीब पिछले सात दशक से उथलपुथल में बीता है । “पारिवारिक राणातन्त्र“ के गिरफ्त में एक सौ आठ साल तक बन्दी जीवन में रहा यह देश वि स २००७ में लोकतान्त्रिक सांस लेने का पूरा प्रयास भी नही कर पाया की पुनः राजशाही पंचायत प्रणाली ने इसका गला पकड़ लिया । करीब ३० साल तक शाहवंशी निर्दलीय व्यवस्था के शिकंजा में रहा देश वि.स. २०४६ साल में कांग्रेस कम्युनिष्ट पार्टी और जनता के आंदोलन द्वारा अर्ध प्रजातंत्र को प्राप्त हुआ । कुछ साल बाद कम्युनिष्ट पार्टी माओवादी के सशस्त्र द्वन्द के चपेट से गुजरते हुए ०६२और०६३ के मधेस विद्रोह द्वारा पूर्ण लोकतंत्र की ओर अग्रसर हुआ । मधेस विद्रोह के फलस्वरूप नेपाल सरकार और मधेसियों के बीच हुए समझौतों को नेपाल के लोकतंत्र का आधार मानना चाहिए जिसके बाद अंतरिम संविधान का निर्माण हुआ । अंतरिम संविधान के आधार पर दो बार हुए संविधान सभा चुनाव के माध्यम से नेपाल ने एक दशक लम्बा समय के बाद मधेसियों को असंतुष्ट करते हुए नेपाल का संविधान ०७२ जारी किया ।

शासक वर्ग वह हैं जो अपने आपको “गोर्खाली–नेपाली“ मानते हैं और शासित वर्ग वह हैं जो अपने आपको “गैर–गोर्खाली–नेपाली“ अर्थात मधेसी आदिवासी जनजाति ।
छल, कपट, प्रपंच, स्वार्थ सिद्धि, सत्ता लोलुपता जैसी चीजें राजनीति में हमेशा से रही है परन्तु वर्तमान नेपाल में यह सब राजनीति की पर्याय बन गई है । सत्तासीन नेता तो शुरू से राजनीति में साम दाम दण्ड भेद की नीति अपनाते आये हैं परन्तु वह उस समय जब लोगों को राजनीति दिलचस्पी नही रहती थी, खबर एक से दूसरे तक पहुँचने में काफी समय लगता था, लोग उतने शिक्षित नही होते थे । अब जनता अपने अधिकार के प्रति जागरूक हो रही है, राजनैतिक घटनाक्रम को नजदीक से देखना,अध्ययन करना, विश्लेषण और भविष्य का आंकलन करना अपना दायित्व समझने लगी है तो क्या अब ऐसे समय में छल प्रपंच की राजनीति टिक सकती है ? कदापि नही । परन्तु राजनीति के पुराने खिलाड़ी अब भी उसी तरह की अनैतिक प्रकृया के माध्यम से सत्ता पर टिके रहना चाहते हैं । इस तरह सत्तालोलुप स्वार्थियों के कारण नेपाल स्पष्ट रूप से दो भागों में विभक्त सा दिखने लगा है अर्थात देश खुले रूप से शासक और शासित वर्ग । शासक वर्ग वह हैं जो अपने आपको “गोर्खाली–नेपाली“ मानते हैं और शासित वर्ग वह हैं जो अपने आपको “गैर–गोर्खाली–नेपाली“ अर्थात मधेसी आदिवासी जनजाति । हालाँकि अंदरुनी तरीके से नेपाल की शासन प्रणाली दशकों से इस विभक्ति को धारण किये हुए शासित वर्ग के द्वारा शासित पर शासन चलाते रहने के लिए पूरा पूरा सहयोग किया है । परन्तु जनचेतना, शिक्षा, संचार आदि के कारण लोगों में जनचेतना काफी हद तक फैली है जिसके फल स्वरूप लोकतान्त्रिक नेपाल में शासक एवम् शासित के बीच संघर्ष चल पड़ा है ।

प्रधानमन्त्री के कुर्सी सम्भाले ६ महीने बीतने के बाद प्रचण्ड जी अपनी असमर्थता का बहाना बनाते हुए विभेदी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं । सवाल यहाँ यह है कि आखिर इनकी नीयत में खोट क्यों है? अगर नीयत में खोट नही तो आज तक एक भी समझौता कार्यान्वयन क्यों नहीं हुआ ?

अपने आपको गोर्खाली–नेपाली मानने वालों के अनुसार गैर–गोर्खाली–नेपालियों को जो भी अधिकार वर्तमान संविधान के माध्यम से “दिया गया“ है वह उनके लिए पर्याप्त है परन्तु गैर–गोर्खाली–नेपाली के अनुसार जारी संविधान ने अंतरिम संविधान में दिए गए हक की भी कटौती कर ली है । वास्तव में अगर किसी तटस्थ व्यक्ति या संस्था से नेपाल की राजनैतिक व्यवस्था एवम् कर्मचारीतन्त्र का निष्पक्ष अध्ययन कराया जाय तो खुल्लम खुल्ला विभेद का वातावरण दुनिया के सामने लाया जा सकता है । गैर–गोर्खाली–नेपाली में मधेसी भी हैं जिन्हें नेपाल के कई राष्ट्रीय पार्टी नेपाली मानने से भी इन्कार करती है । मधेसी की मांग को भारत की मांग, मधेस के नेताओं को भारतीय कह कर भी सम्बोधित किया जाता है । मधेसियों के साथ किये गए किसी भी सम्झौता पर अमल नही करना गोर्खाली–नेपाली अपना बहादुरी समझते हैं । इस विभेदी प्रकृया ने संस्कार का रूप धारण कर लिया है । जो गोर्खाली–नेपाली गैर–गोर्खाली–नेपाली को जितना दबाए वह उतना बड़ा राष्ट्रभक्त माना जाता है और इस संस्कार को एवम् परम्परा को गोर्खाली नेपाली द्वारा जी जान से निभाई जाती है । लोकतान्त्रिक नेपाल में भी इस एक दशक में जितने प्रधानमन्त्री हुए हैं उन्होंने बड़ी सफलतापूर्वक इस परम्परा का निर्वाह किया है तथा वर्तमान प्रधानमन्त्री भी इसे निर्वाह करने में कस कर लगे हैं ।
माननीय प्रचण्ड जी को मधेसियों ने इसी शर्त पर प्रधानमंत्री के कुर्सी पर बैठने के लिए अपना समर्थन दिया कि जारी संविधान में मधेसी आदिवासी पिछड़े वर्ग के जो भी अधिकार से वंचित रखा गया है वह संविधान संसोधन के माध्यम से उनको मिले । परन्तु प्रधानमन्त्री के कुर्सी सम्भाले ६ महीने बीतने के बाद प्रचण्ड जी अपनी असमर्थता का बहाना बनाते हुए विभेदी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं । सवाल यहाँ यह है कि आखिर इनकी नीयत में खोट क्यों है? अगर नीयत में खोट नही तो आज तक एक भी समझौता कार्यान्वयन क्यों नहीं हुआ ? पुराने मुद्दे का निराकरण करने की बजाय उसे टालकर दूसरा नया मुद्दा पैदा करके देश को द्वन्द में धकेलकर कैसा राष्ट्रवाद निभाते हैं ? क्या देश को भ्रम में रखकर अपना स्वार्थ सिद्धि करना ही इनका अभीष्ट है ? शायद हाँ । अगर ऐसा नही होता तो वर्तमान में प्रचण्ड सरकार संविधान संसोधन को प्राथमिकता में रख कर उस पर कुछ न कुछ कार्य किया रहता परन्तु प्रतिपक्ष को मिलाने का बहाना बनाकर संसोधन प्रस्ताव को दर्ता तक कराने की हिम्मत प्रचण्ड की नाकामयाबी ही मानी जायेगी । इस से भी बड़ी नाकामयाब कदम प्रचण्ड सरकार के लिए चुनाव घोषणा है जो कि उनकी अदूरदर्शिता का परिचायक है ।
नेपाल के गोर्खाली–प्रजाति लोग हमेशा अपनी असफलता का कारण किसी और को बनाने में व्यस्त रहते हैं । परन्तु इतिहास गवाह है कि गोर्खाली प्रजाति के लोग देश को राजनैतिक अस्थिरता, अव्यवस्थिता, भ्रष्टाचार एवम् कुशासन के चक्रव्यूह में फंसाकर व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त रहते हैं, न तो इन्हें देश की पिÞmक्र है और न ही जनता की । किसी भी कीमत पर धन आर्जन करना, देश प्रेम से ज्यादा विदेश में अपने संतान के लिए सुख सुविधा जोड़ना, देश को जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा लूटना और उनके विरुद्ध खड़े होने वालों को राजनैतिक, कानूनी या गैर कÞानूनी तरीके से सपÞmाया करवाने वाले निकृष्ट राजनैतिक एवम् कर्मचारी व्यक्तित्व ने देश को भ्रष्टाचार के मामले में विश्व के तीसरे नम्बर पर ला कर खड़ा कर दिया है । अपने आपको राष्ट्रभक्त दिखाने के लिए खोखले आदर्श के सिवाय जनता ने इन गोर्खाली प्रजाति से कुछ भी प्राप्त नही किया । अपनी असफलता छुपाने के लिए कभी भौगोलिक, कभी राजनैतिक तो कभी वैदेशिक कूटनीति को जिम्मेवार ठहराते हुए यह गोर्खाली प्रजाति के लोग सत्ता सयल में व्यस्त रहते हैं ।
कहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्र का गहना है, चुनाव के बिना लोकतंत्र का कोई मूल्य नही । चुनाव निश्चित समय पर हो और जनता को अपना नेता चुनने का अवसर मिले यही लोकतंत्र की पहली उपलब्धि है । नेपाल में स्थानीय स्तर अर्थात गाँव एवम् नगर क्षेत्र का चुनाव हुए अठारह साल बीत गए । कहा जाता है कि नेपाल में संविधान कार्यान्वयन के लिए चुनाव जल्द से जल्द होना अति आवश्यक है नही तो देश संवैधानिक संकट में फंस सकता है । तो क्या चुनाव के सभी मूल्य मान्यताओं को ताक पर रख कर चुनाव होना चाहिए या चुनाव के नियम कानून और जनता के हक को पूरा करते हुए चुनाव होना चाहिए ? शासन व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाने के लिए जनता के हक को चुनाव के नाम पर हनन करना कैसी लोकतन्त्र की स्थापना है ? सब को पता है चुनाव के लिए कुछ बुनियादी बाते होती है जिसको पूरा किये बगैर चुनाव होने न होने का कोई मतलब नही रह जाता और उसके बिना चुनाव होना भी असम्भव सा ही है ।
१) मतदाता नामावली – यह चुनाव की पहली जरूरत है कि हर चुनाव से पहले सरकार पूरे देश से मतदाता नामावली संकलन करे । क्योंकि एक से दूसरे चुनाव के दरम्यान कितने नए मतदाता बन गए रहते हैं तो कितने मतदाता गुजर गए रहते हैं । किसी एक को भी मताधिकार से बंचित रखना लोकतंत्र की मान्यता के विपरीत है और वह देश के साथ धोखा है । प्रचण्ड सरकार ने वर्तमान में जो वैशाख ३१ गते चुनाव की घोषणा की है उससे कितने लोग चुनाव से वंचित रहेंगे इसका अंदाजा भी नही लगाया जा सकता,क्योंकि अभी तक मतदाता नामावली संकलन नही हुआ और इतने कम समय में पूरे देश से संकलन होना सम्भव भी नही है ।
२) मतदाता परिचय पत्र – मतदाता नामावली संकलन के बाद तस्वीर के साथ मतदाता परिचय पत्र बांटा जाता है जिसमे कई बार छपाई में त्रुटि भी रहती है । इस लिए चुनाव से कुछ समय पहले मतदाता परिचय पत्र मतदाता के हाथ में होना चाहिए ताकि अगर उसमे कोई त्रुटि है तो उसे समय रहते ठीक किया जा सके और मतदान से बंचित नही हो । वर्तमान सरकार ने जब मतदाता नामावली ही संकलन करना छोड़ दिया तो मतदाता परिचय पत्र तो बहुत दूर की बात हो गई ।
३) चुनाव क्षेत्र का निर्धारण– नेपाल में वर्तमान चुनाव में अभी तक चुनाव होने वाले गाँवों की सीमा भी निर्धारण नही हुई तो चुनाव कैसे सम्भव है ? प्रचण्ड सरकार एवम् चुनाव के अंध समर्थक का कहना है कि पुरानी संरचना के आधार पर चुनाव हो । अगर उस आधार पर चुनाव हुआ, नेता चुने गए और एक साल के अंदर पुनर्संरचना आयोग का प्रतिवेदन पारित हुआ तो उन नेताओं के कार्य क्षेत्र का क्या होगा ? उनका कार्य क्षेत्र नया वाला होगा या जिस से उन्होंने चुनाव लड़ा वह क्षेत्र होगा ? इस लिए चुनाव पुराना सीमांकन के आधार पर होना भी द्वन्द को ही निमन्त्रण देना है ।
३) विवादित विधेयक – नेपाल में चुनाव सम्बन्धी कुछ विवादित विधेयक अभी भी संसद में है जिस पर कोई सहमति नही बन पाई है । उन विधेयकों में एक “थ्रेसहोल्ड“ है जिस पर इतने कम समय में निर्णय होना सम्भव नहीं दिख रहा ।
४) मत वहिष्कार (नो वोट) – नेपाल के निर्वाचन आयोग ने उम्मीदवार वहिष्कार करने का अधिकार मतदाताओं को दिया है । अगर किसी मतदाता को एक भी उम्मीदवार पसन्द नही आये तो वह अपना मत वहिष्कार कर सकते हैं । वहिष्कृत उम्मीदवार का क्या होगा ? कितने प्रतिशत मत वहिष्कृत होने पर क्या होगा ? इसके बारे भी अभी कोई विस्तृत नियम नही बना, निर्वाचन आयोग इस नो वोट को किस चुनाव से लागू करेगा यह बात अभी तक स्पष्ट नही हुवा है अर्थात चुनाव में होने वालों द्वन्द के कारणों में एक कारण यह भी हो सकता है ।
५) चुनाव चिन्ह – नेपाल के कानून ने यह तय किया है कि नेपाल के राष्ट्रीय चिन्ह से चिन्हित किसी भी चिन्ह को चुनाव चिन्ह नही बनाया जा सकता । नेपाल के २ राष्ट्रीय पार्टियों का चुनाव चिन्ह ऐसा है जो राष्ट्रीय चिन्ह में अंकित है । एक तो राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का चुनाव चिन्ह “गाय“ और दूसरा नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी एमाले का चुनाव चिन्ह “सूर्य“ । राप्रपा का चुनाव चिन्ह तो पार्टी के एकीकरण के कारण बदलने की सम्भावना बढ़ गई है परन्तु एमाले के चुनाव चिन्ह को या तो एमाले नेपाल के कानून की मर्यादा रक्षा करते हुए स्वविवेक से निर्वाचन आयोग से बदलने के लिए सिफारिस करे नही तो निर्वाचन आयोग सम्बंधित कानून का प्रयोग कर के एमाले का चुनाव चिन्ह को बदले । क्योंकि नेपाल के राष्ट्रीय झंडा में अंकित सूर्य किसी भी पार्टी का चुनाव चिन्ह नही हो सकता । इस तरह अगर और भी किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह बदलना है तो वह निर्वाचन के लिए मतपत्र छपने से पहले ही बदलना होगा । जैसे कि गोर्खाली प्रजाति के लिए नेपाल का सारा नियम कानून ताक पर रख दिया जाता है वैसे इसे भी रख दिया जाए तो कोई बड़ी बात नही होगी ।
६) मत पत्र छपाई, मत पेटिका वितरण, सुरक्षा और चुनावी चरण –
भले ही नेपाल छोटा देश है पर भौगोलिक स्थिति और चुनाव के लिए निर्धारित समय देख कर यह निश्चित कहा जा सकता है कि चुनाव घोषित समय पर होने से रहा । क्योंकि वर्तमान चुनाव के लिए कम से कम पचीस हजार मत पेटिका निर्माण कर के निर्वाचन स्थल पर पहँुचाना, करीब डेढ़ करोड़ मत पत्र छापना, करीब पचहत्तर हजार आवधिक सुरक्षाकर्मी चयन करना और उनको प्रशिक्षित करना ।
देश का माहौल अभी कैसा है, मधेसी आदिवासी जनजाति पिछड़ा वर्ग अभी आंदोलन में है । इस अवस्था में एक ही चरण में मतदान करना कितना सम्भव है ? यह सारा काम २ महीने में पूरा करना निश्चित ही बहुत बड़ा लक्ष्य भेदन करने जैसा है ।
७) सभी पार्टियों से सहमति – चुनाव की सब से बड़ी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें सभी राजनैतिक पार्टी हिस्सा ले । मतदाता ज्यादा से ज्यादा मात्रा में मतदान करें । परन्तु वर्तमान अवस्था में प्रचण्ड सरकार ने मधेसी की मांग के अनुसार संविधान संसोधन करने का वादा कर के संसोधन की बात तो दूर, संसोधन विधेयक दर्ता भी नही करवा पाया । अब किस आधार पर प्रचण्ड सरकार मधेस के पार्टियों से चुनाव में सहयोग की अपेक्षा रख सकती है ? कई बड़े राष्ट्रीय स्तर के पार्टी के नेता का कहना है कि मधेसी पार्टी भाग नही भी ले तो भी चुनाव निर्धारित समय पर होगा । जिस चुनाव में मधेसी का विरोध हो उस चुनाव की सफलता असफलता का विचार किये बिना चुनाव की मिति घोषणा करना कितना उपयुक्त कदम ?
उपरोक्त चुनावी विन्दुओं पर विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान सरकार ने जो वैशाख ३१ गते की चुनाव के समय की घोषणा की है वह अपने सर से असफलता का कालिख मिटाने के सिवाय और कुछ नही है । राजनीति में अपने आपको महारथ प्राप्त समझने वाले प्रपंची प्रचण्ड ने आगामी चुनाव की असफलता मधेसी के सर मढ़ने के लिए बिना किसी पूर्व तैयारी के, मधेसियों की मांग को अनसुना करके अपना सत्ता लम्बा करने के लिए ही चुनाव की घोषणा की है, इसमें कहीं राई रत्ती सन्देह नही होना चाहिए । अब सम्पूर्ण देश के जनता को यह निर्णय करना चाहिए कि इस तरह के छल छद्म करने वालों के हाथ से कैसे देश को बचाया जाए और किस प्रकार उन्नति की मार्ग पर अग्रसर किया जाए ?

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