पर्सा चुनाव में मधेशी दलों का बोलवाला

पर्सा में चुनाव के परिणाम ने इतिहास रच दिया । चार सांसद के सीट में से चारो पर मधेशी गठबंधन की जीत हुई, आठ विधायक के सीट में से छह पर भी मधेशी गठबंधन की जीत हुई । जिन दो बिधायक के सीट पर रामचंद्र पंडित और रामनरेश यादव हारे, वो भी बहुत कम मतांतर से हारे । इसमें सांसद में हरिनारायण रौनियार और बिधायक में सिंघासन साह कलवार तो चुनाव और राजनीति में पहली बार अपनी किस्मत आजÞमाने उतरे थे । दो विधायक के उम्मीदवार जन्नत अंसारी और अब्दुल रहीम उर्फ मंजुर अंसारी एकदम युवा है । प्रदीप यादव, बिमल श्रीवास्तव, लक्ष्मण लाल कर्ण, लालबाबू राउत गद्दी, रमेश पटेल, प्रह्लाद गिरी पहले से जाने–माने हस्ती है ।
स्थानीय चुनाव से पहले हरिनारायण रौनियार और बिजय सरावगी एक ही दिन पोखरिया में स.स.फोरम में प्रवेश किए थे, वहा के जनसैलाब को देखकर अंदाज लग गया था, कि आगे क्या होने वाला है । स्थानीय चुनाव में बिजय सरावगी ने बीरगंज महानगर पालिका में जीतकर झंडा गाड़ दिया । वही संसदीय चुनाव में हरिनारायण रौनियार ने कांग्रेस के सुरेंद्र चौधरी और एमाले के राजकुमार गुप्ता को हराकर किÞला पÞmतह किया ।
पर्सा ४ का नतीजा और रोचक रहा, जहा हमेशा पहाड़ी दल का बर्चस्व रहता था, वहां हमेशा से कांग्रेस से रमेश रिजाल और माओवादी से उर्मिला अर्याल का सिक्का चलते आया है । लक्ष्मण लाल कर्ण के बारे मे गलतफहमी थी कि वे प्रत्यक्ष चुनाव नही जीत सकते, उन्हें चुनाव हराकर नेपथ्य में भेजने के लिए उन्हें राजपा से चुनाव में उतारा गया, जबकि उन्होने हजार के मतांतर से जीत दर्ज कराया । पर्सा २ में बिमल श्रीवास्तव विपक्षी से नही खÞुद से लड़ रहे थे, स्थानीय चुनाव में दल बदलने के कारण उनकी छवि धुमिल हुई थी और चुनाव के मुहाने पर वे फोरम में आए थे । ये चुनाव उनके लिए खÞुद को साबित करने वाला चुनाव था, जिसमे उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज अजय चौरसिया को धूल चटाया ।
सबसे रोचक चुनाव पर्सा १का रहा, यहा से फोरम उम्मीदवार प्रदीप यादव थे । प्रदीप यादव के शानो–शौकÞत से प्रभावित होने और जलने वालो की संख्या बेशुमार है, आरोप–प्रत्यारÞोप से उनका चोली–दामन का साथ है । वे सारे मधेश विरोधियो के प्रमुख निशाने पर रहते हंै । उन्हें हराने के लिए सारे दल भीतर ही भीतर मिल चुके थे, जिसका प्रमाण बिचारी यादव को मिले वोट को देखकर स्पष्ट हो जाता है । एमाले के वोट को कांग्रेस में रूपांतरित किया गया, मड़वारी वोट पाने के लिए अशोक रूंगटा को लड़ाया गया । तरह–तरह के लांछना लगाए गए, प्रदीप यादव और बिजय सरावगी में फूट की बाते उड़ाई गई, करीमा बेगÞम की नाराजगी और अनदेखी की बात उड़ाई गई । तमाम हथकण्डे अपनाने के बाद भी प्रदीप यादव के बिजय रथ को कोई नही रोक सका ।
बिधायक की बात की जाए तो, सबसे नाटकीय पर्सा १ (क) रहा, जिसमे फिरोज मंसूर को टिकट मिला, उम्मीदवारी दर्ज भी हो गयी, उसी सीट पर फोरम से ही जन्नत अंसारी की भी उम्मीदवारी दर्ज हो गया । एक ही सीट पर एक ही दल के टिकट पर दो उम्मीदवार हो गए थे । बाद में बड़ी मुश्किल से फिरोज मंसूर को मनाया गया, और जन्नत अंसारी ने जीत दर्ज किया । १ के (ख) में चुनाव लड़ने के लिए नगरपालिका की नौकरी छोड़कर आए शम्भू गुप्ता को टिकट नही मिला, वे विरोध में एमाले के टिकट से चुनाव लड़ गए, दूसरे राजपा के युवा नेता ओमप्रकाश सर्रापÞm भी बागी होकर स्वतंत्र लड़ गए, इसके आलावा कई मुस्लिम उम्मीदवार भी मैदान में होने के कारण फोरम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लालबाबू राउत गद्दी के लिए चुनौती कड़ा हो गयी थी, लेकिन तमाम अटकलों को गÞलत साबित करते हुए लालबाबू राउत ने गद्दी में जीत दर्ज कराई ।
२ के (क) कांग्रेस का गढ़ रहा है, वहा का आधा क्षेत्र अजय द्विवेदी का रहा है, तो आधा क्षेत्र अजय चौरसिया का रहा है, इसके बावजूद रामनरेश यादव ने बहुत कड़ा टक्कर दिया । २ के (ख) में रमेश पटेल के सामने खÞुद की पार्टी से ही असहयोग झेलना पड़ा, इसके बावजूद उनकी जीत हुई ।
३ के (क) में मधेशी दल बहुत ही कमजोर था, लेकिन मंजूर अंसारी के अथक मेहनत के कारण जीत हासिल हुई । ३ के (ख) में फोरम के ही बिंध्याचल ठाकुर, शंकर यादव और हरिहर साह के बागÞी उम्मीदवारी के कारण जीत मुश्किल थी, वहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी, लेकिन एक कार्यक्रम में कांग्रेस से उम्मीदवार जनार्धन सिंह क्षेत्री ने मधेशी दल को मुर्गी फार्म कह दिया, जिसके प्रतिकिया में बहुत मधेशी वोट उनसे कट गया, अंततः प्रह्लाद गिरी की जीत हुई । यहाँ हरिनारायण रौनियार जैसे मजÞबूत उम्मीदवार होने के कारण ही जीत दर्ज हुई ।
४ के (क) में राजपा से रामचंद्र पंडित थे, जो जीत नही पाए, इसका प्रमुख कारण था की ये क्षेत्र पहाड़ी और थारू बहुल क्षेत्र था, जिसमे या तो किसी थारू को टिकट देना चाहिए था, या फोरम के नेता बिरेंदर यादव को टिकट देना चाहिए था, गौरतलब है कि बिरेंदर यादव इन इलाको में बेहतर प्रभाव रखते है । ४ के (ख) में फोरम से सिंघासन साह कलवार उम्मीदवार थे, स्थानीय चुनाव में इनके भाई इन्द्रासन कलवार बहुत कम वोट से चुनाव हारे थे, स्थानीय लोगो के दबाव के कारण इन्हें टिकट मिला, जिस कारण भारी मत से इनकी जीत सुनिश्चित हुई ।
पर्सा में भारी जीत तो हुई, इसका प्रमुख कारण रहा, मधेश के पक्ष में जन लहर । भारी जनलहर के बावजूद टक्कर कड़ा रहा, तो इसका कारण रहा, मधेशी गठबंधन के संगठन की कमी और विपक्षी दलो का संगठन उनके लिए मददगार रहा । टिकट वितरण में भी मधेशी गठबंधन ने भारी चूक किया, कई जगह तो टिकट बिक्री को आरोप लगा । कुछ तो बागÞी होकर चुनाव लड़ गए, गÞनीमत इतनी रही मधेशमय माहौल में असंतुष्ट लोग विरोध करने से परहेज कर गए । चुनाव के दौरान उम्मीदवारों में व्यवहार कुशलता का बड़ा अभाव देखा गया । कई जगहों पर अपने खÞास और जाति के लोगो को प्रमुखता देने से नाराजगी जाहिर हुई । सबसे मजबूत पक्ष रहा कि विपक्षी किसी भी रूप में वोटर को प्रभावित करने का प्रयास तो किया, लेकिन उसे वोट में बदलने में सपÞmल नही हो पाया । समग्र में कहा जाए तो ये चुनाव नाकाबंदी और संशोधन के विरोध का करारा जबाब है ।
अब आगे के चुनौतियों पर ध्यान दे, तो सबसे मुश्किल काम है सभी विजेता को एक सूत्र में बाँधकर रखना । सांसद–विधायक अपने करीबी को समानुपातिक में मनोनीत करने का प्रयास करेंगे । बिमल श्रीवास्तव को अपने लोगो को संगठन में जगह दिलाने के लिए संघर्ष करना होगा । तीनों मंत्री बनने का प्रयास करेंगे । अभी से मुख्यमंत्री और मंत्री बनने–बनाने के लिए गुट बनने लगे है । कोई कुछ बने या नही, लेकिन बर्चस्व की लड़ाई तय है ।
समर्पित कार्यकर्ता की अनदेखी बहुत महंगा पड़ेगा । समर्पित कार्यकर्ता को भविष्य में बड़ी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए । खासकर उनको जिनकी उम्र २५ से ५० के बीच है, ताकि वे अपनी गतिविधियां बढ़ाकर अधिक से अधिक लोगो तक पहुच सके । समर्पित कार्यकर्ताओं की पहचान होने और उनका सही मूल्यांकन से भविष्य के लिए कई अच्छे नेता मिलेंगे । क्षेत्र से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जब भी जिम्मेदारी देने की बात आए, तो समर्पित कार्यकर्ताओं को सबसे पहले मौका दिया जाना चाहिए । समर्पित कार्यकर्ता के द्वारा मधेश लहर को संगठन से जोड़ना होगा ।
आम लोगो की उम्मीदें भी सातवे आसमान पर है । विकास की उम्मीद तब और बढ़ जाएगी, जब पर्सा जिला को मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री या मंत्री मिलेगा । बीरगंज को राजधानी बनाने के नाम पर विपक्षी दल अभी से घेराबंदी करने लगे है । दुर्भाग्य से देश के शासन को संचालित करने वाले कायदे कानून पूर्वाग्रही हैं । उनमें से अधिकांश मधेश के जरूरतों के हिसाब से ठीक नहीं है क्योंकि वे मूलतः एक उपनिवेश को चलाने के लिए बने है । आज स्थिति यह है कि उनसे हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है । बहुत सुधार लाने की जरूरत है, जिसमें आम आदमी की शासन में भागीदारी आवश्यक है ।
पर्सा में सड़कें नाम मात्र का है, यहां बड़े पैमाने में सड़कों को जाल बिछाना होगा । किसानों की बेहतरी पर ध्यान देना होगा । किसानों को बुनियादी ढ़ाचे मुहैया कराने पर कम ध्यान दिया जाता है । किसानों को उनकी उपज का बेहतर मुल्य मिले, इसके लिए बेहतर बुनियादी ढाचा तैयार करने की जरुरत है । नहरों के पानी का सही ब्यवस्थापन करके उचित समय पर पानी उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा । बिद्युत प्रसारण कई दिनों तक बिना कारण अवरुद्ध रहता है, जिस पर नियंत्रण रखना होगा । बिद्युत सुचारू होने से ग्रामीण विकास की तस्वीर बदल सकती है । स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार लाना होगा । वन व्यस्थापन करके लकडि़यों की चोरी रोकनी हिगी । चंदा और अवैध वसुली पर रोक लगाना होगा । हमेशा जनता के संपर्क में रहना होगा ।
चुनाव के दौरान जो वादे किए गए और जो बातें घोषणा पत्र में कही गई, उन वादों को पूरा करना बड़ी चुनौती है । मधेश अपनी मूल जरूरतों के लिए उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है । हर बार बाढ़ में डूबने वाले इलाका और सूखा प्रभावित इलाके का विकास करना बड़ी चुनौती है । पिछले कुछ सालों में पुलिस और प्रशासन व्यवस्था का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है । राजनीतिज्ञों, पुलिस, अपराधियों, तस्करों के बीच एक नापाक गठजोड़ बन गया है, जिसके कारण कानून व्यवस्था एक पक्षीय होकर रह गया है । अनेक शिकायतें दर्ज तक नहीं होती और उनपर उल्टा कार्यवाही भी हो जाती है । चुनौती उस नापाक गठजोड़ को तोड़कर, कानून स्थापित कर सुशासन की अनुभूति देनी होगी ।
सुशासन की मुख्य विशेषताएं होती है, भागीदारी,आम सहमति, जवाबदेह, पारदर्शी, उत्तरदायी, प्रभावी, सक्षम, न्यायसंगत तथा समावेशी एवं कानून के शासन का पालन करना है । जो कि बहुत बड़ी चुनौती है । पर्सा में बीरगंज के मेयर, जिला समन्वय समिति के सभापति, बहुमत स्थानीय प्रतिनिधि, बहुमत बिधायक और सांसद मधेशी दल के है, अब सभी काम की असफलता इनके सिर पर जाएगी । अगर सब मिलकर एकजुट होकर काम करे, तब जनता की उम्मीदों पर खड़े उतर सकते है, अगर ऐसा नही हुआ और सत्ता–भत्ता, आर्थिक सहयोग, चंदा, पुरस्कार में उलझ कर रह जाएंगे, तो दीमक लगे पेड़ की तरह भरभराकर गिरने से कोई नही रोक सकता ।

 

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