विवादों ही विवादों में नेताओं के वादे कहीं खोने लगे हैं : श्वेता दीप्ति

पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार और वर्चस्व की भावना, कभी–कभी गम्भीर परिस्थितियाँ और परिणाम को जन्म देती है, जो कभी देश हित में सही नहीं होता ।

सम्पादकीय ( वर्ष २१, अंक २, फरवरी ) | (विवादों के साए में घिरा प्रदेश)  विवादों ही विवादों में नेताओं के वादे कहीं खोने लगे हैं । नीतिविहीन राजनीति और सशंकित जनता, अब तक अपने नए प्रधानमंत्री का इंतजार कर रही है । वामगठबन्धन की सरकार और उसके साए में नए नेपाल के निर्माण की आस, विकास और स्थायित्व के सपने सभी के दिलों में पल रहे हैं और उस दिन का इंतजार है, जब देश की दशा और दिशा बदलेगी, फिलहाल तो नेतागण अपनी दशा बदलने की ओर अग्रसर नजर आ रहे हैं । बँटवारे की राजनीति आज भी अपने पुराने रंग में ही सभी को रंगे हुए है । एमाले और माओवादी केन्द्र का एकीकरण हर रोज किसी ना किसी बहाने टल रहा है । अगर किसी कारणवश यह एकीकरण नहीं हुआ तो स्थायित्व के सपने भी धुमिल होने की पूरी गुँजाइश है । पर सोच अच्छे की ही होनी चाहिए, तो शायद कुछ अच्छा हो जाय । मधेशी दलों का गठबन्धन भी दो नम्बर प्रदेश को लेकर अब तक कोई नीति निर्माण नहीं कर पाई है, वहीं काँग्रेस के पास फिलहाल भविष्य को लेकर आत्मविश्लेषण के अलावा कोई विशेष कार्य नजर नहीं आ रहा ।
चुनाव हुए, परिणाम आया और साथ ही संघीयता की ओर देश ने अपने कदम को बढ़ाया । पर जहाँ देश या प्रदेश को विकास की योजना की चाह होनी चाहिए वहाँ भाषा, जाति, प्रदेश के नामकरण और राजधानी के मसले को लेकर विरोध और आन्दोलन का वातावरण है, जो निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है । आशा करें कि यह विरोध का वातावरण किसी अनचाहे परिस्थितियों को जन्म न दे । पूर्वाग्रह से ग्रसित विचार और वर्चस्व की भावना, कभी–कभी गम्भीर परिस्थितियाँ और परिणाम को जन्म देती है, जो कभी देश हित में सही नहीं होता । इसलिए सही वक्त पर सही निर्णय और सोच की आवश्यकता देश को भी है और प्रदेश को भी है ।
मौसम ने अपना रंग बदलना शुरु कर दिया है, फाग के रंग बहुत जल्द फिजा में रंग घोलने वाले हैं । आइए एक रंग में हम रंगे और एक सही सोच के साथ आगे बढें । शुभकामनाओं सहित–

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