मधुश्रावणी व्रत एवं अग्नि परीक्षा:अंशु झा

पति की लंबी आयु व अखण्ड सौभाग्य की कामना हेतु स्त्रियां यह तेरह दिवसीय व्रत करती हंै, परन्तु उसे अंतिम दिन अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है ।


तेरह दिवसीय मधुश्रावणी व्रत के प्रारम्भ के दिन गौरी, विषहरी व अन्य देवताओं की आकृति बनाकर तेरह दिनों तक पूजा की जाती है

हिन्दू धर्म के अनुसार परमात्मा सर्वव्यापी हैं । सृष्टि के प्रत्येक कण में भगवान का वास है । कोई भी जीवन उसकी चैतन्य चेतना से वंचित नहीं है । इसलिए हिन्दू धर्म में सभी जीवों को देवता के रूप में पूजा जाता है, अर्थात् प्रत्येक जीव में देवता निहित हैं ।

सर्वप्रथम ‘रामायण’ की ‘सीता’ जिसे हम सभी लक्ष्मीस्वरूपा मानते हैं उनकी भी अग्नि परीक्षा ली गई थी, तो साधारण स्त्रियां तो असहाय हैं, असक्षम हैं । स्त्रियां तो सदैव शोषित हुई हैं । कभी पुरुष वर्ग से तो कभी स्त्रियां स्वयं से शोषण का शिकार बनी है । स्त्रियों की व्यथा जितना भी लिखूं बहुत ही कम होगा । क्योंकि वह पीडि़ता हैं, शोषिता हैं । यहां तक की परंपरा के नाम पर भी स्त्रियों का शोषण किया गया है । जो इस व्रत में स्पष्ट है
मैं इसी बातों को ध्यान में रखते हुये ‘मधुश्रावनी व्रत’ के संबंध में कुछ लिखने जा रही हूँ । ‘मधुश्रावनी व्रत’ मिथिलांचल में मनाने जाने वाला एक विशिष्ट त्योहार है । यह व्रत श्रावण माह के कृष्ण पक्ष के पंचमी तिथि से आरम्भ होता है और उसी माह के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को समाप्त होता है, अर्थात् इस पूजा की समयावधि तेरह दिनों की होती है । यह व्रत विशेषकर नवविवाहित स्त्रियां करती हैं । इस व्रत में शिव, पार्वती, नाग–नागिन, विषहरी व अन्य देवताओं की पूजा–अर्चना की जाती है । इस तेरह दिवसीय मधुश्रावणी व्रत के प्रारम्भ के दिन गौरी, विषहरी व अन्य देवताओं की आकृति बनाकर तेरह दिनों तक पूजा की जाती है । प्रत्येक दिन सायंकाल व्रतालु अपने सखी–सहेलियों के साथ शिव–पार्वती का गीत गाते हुये विभिन्न बाग–बगीचे व धर्मस्थली में जाकर बांस के डालियों में फूल एकत्रित करती हैं और वही पुष्प प्रातःकाल देवी–देवताओं को विधिवत अर्पण करती हैं । तेरह दिनों की पूजा की तेरह प्रकार की कथाएं श्रवण की जाती है और पूजा भी अलग–अलग विधियों से की जाती हैं । विषहरी की पूजा के लिए दूध, लावा, श्वेतपुष्प, चंदन, मेहन्दी इत्यादि की अनिवार्यता होती है । व्रतालू तेरह दिनों तक सेंधा नमकयुक्त पवित्र भोजन ग्रहण करती हंै । समापन के दिन व्रतालू पूजा सम्पन्न कर सुहागिनों (अहिबाती) में बांस के डाला व सौभाग्य की वस्तुएं– (चूड़ी, सिन्दूर, टीका, वस्त्र इत्यादि) वितरण करती है तथा विभिन्न प्रकार के मिष्ठान व खीर भोजन कराती है ।
वास्तव में मिथिलांचल की संस्कृति बहुत ही रमणीय है, जिसमें मधुश्रावणी का एक विशिष्ट ही महत्व है । यह व्रत वर्षा ऋतु के श्रावण महीना में होने के कारण और ही सुहावन लगता है ।
‘फणीश्वरनाथ रेणु’ द्वारा रचित कहानी ‘पुरानी कहानी –नयां पाठ’ जो उनकी प्रतिनिधि कहानियां पुस्तक में संग्रहित है । उसमें रेणु जी ने मधुश्रावणी व्रत की कुछ अंश वर्णित किया है । उन्होंने व्रतालु नव विवाहिता के नव वस्त्रों की खुशबू व श्रृंगार सज्जा के संबंध में वर्णन किया है । ‘रेणु जी’ आंचलिकता (आचंलिक, उपन्यासकार) के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं । उन्होंने मिथिलांचल की इस संस्कृति को अपनी लेखनी में भी शामिल किया है ।
पति की लंबी आयु व अखण्ड सौभाग्य की कामना हेतु स्त्रियां यह तेरह दिवसीय व्रत करती हंै, परन्तु उसे अंतिम दिन अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है । यह परंपरा सदियों पूर्व से आज तक चलती आ रही है । व्रत के समापन के दिन व्रतालू को पान के पत्ते से वर द्वारा नेत्र बंद कर दिया जाता है और पैरों व घुटनों पर जलते दीये की बत्ती से दागा जाता है । कहा जाता है कि टेमी से दगे गये स्थान पर जितने ही बड़े फफोले होंगे, पति की आयु उतनी ही लम्बी होगी । आज के इस बदलते युग में भी यह परंपरा पूरी निष्ठा से मनाया जा रहा है ।
यह कैसी विडम्बना है कि तेरह दिनों तक जो नवविवाहिता पवित्र हो और पूरी निष्ठा के साथ व्रत रखती है, विभिन्न देवी देवताओं की पूजा करती है, अन्ततोगत्वा उसे अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है । इस ‘दागने’ की परंपरा को अगर गौर से देखा जाय तो स्त्री के ऊपर एक अत्याचार ही है । जो सदियों से मिथिलांचल की स्त्रियां भोगती आ रही हैं । सर्वप्रथम ‘रामायण’ की ‘सीता’ जिसे हम सभी लक्ष्मीस्वरूपा मानते हैं उनकी भी अग्नि परीक्षा ली गई थी, तो साधारण स्त्रियां तो असहाय हैं, असक्षम हैं । स्त्रियां तो सदैव शोषित हुई हैं । कभी पुरुष वर्ग से तो कभी स्त्रियां स्वयं से शोषण का शिकार बनी है । स्त्रियों की व्यथा जितना भी लिखूं बहुत ही कम होगा । क्योंकि वह पीडि़ता हैं, शोषिता हैं । यहां तक की परंपरा के नाम पर भी स्त्रियों का शोषण किया गया है । जो इस व्रत में स्पष्ट है ।
मैं ये नहीं कहती की हमारी परंपरा व संस्कृति अच्छी नहीं है । हमारी संस्कृति तो इतनी सुन्दर है कि प्रत्येक जीव–जन्तुओं व विभिन्न अचल वस्तुओं को विभिन्न पूजा का आयोजन कर उनका स्थान दिया जाता है अर्थात् पूजा जाता है । इस मधुश्रावणी व्रत में विषहरी (सर्प) की पूजा प्रमुख रूप से की जाती है । इसी प्रकार हमारे संस्कृति में अन्य पूजा के साथ अन्य–अन्य जीव–जन्तुओं तथा वस्तुओं को पूज्यनीय बनाया गया है । इतनी सुन्दर मिथिलांचल की संस्कृति होते हुये भी कुछ रुढि़वादी तत्व उभरकर सामने आती है, जो कि आज के बदलते युग में असह्य है । इस रुढि़वादी तत्वों को हमें खण्डन करना चाहिये और जो पीड़ा दायक हो, उसे हटाना चाहिये ।
यह सोचनीय है कि जो नवविवाहिता स्त्रियां इतने हर्षोल्लास के साथ सजसंवर कर इस व्रत में भाग लेती है और उसे अग्नित्रास का सामना करना पड़ता है । यह कितना उचित है ? पूजा के प्रथम दिन से ही वो अंतिम दिन के लिए भयभीत रहती है ।
अतः हम यह कह सकते हैं कि हमारी कोई भी संस्कृति बुरी नहीं होती बशर्ते कि उसमें समयानुकूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है और साथ ही कष्टदायक रुढि़वादी परम्परा में सुधार लाना भी अनिवार्य है ।

Madhu-shrawani-maithali

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