खेती की बातें या बातों की खेती ? : देवेश कुमार मिश्र

कृषि मूलश्च जीवनम्
संपूर्ण मानव जीवन का मूल आधार कृषि है । खाने पीने का तौर तरीका समय, स्थान, परिस्थिती, संस्कार, रीति रिवाज के आधार पर अलग हो सकता है, लेकिन जो भी हो इसका आधार तो खेती पाती ही है । हमारा पेशा, व्यवसाय, आय अर्जन करने का तौर तरीका अलग हो सकता है । हम चाहे किसान, व्यापारी, उद्यमी, उद्योगी, नौकरी वाले, पण्डित, पुजारी जो भी हो हमारे रसोई मे तो खेती पाती से ही उत्पादन होने वाली चीज जैसे ः अन्न, दाल, तरकारी ही बनती है । हम कितना भी धन संपत्ति अर्जित कर लें लेकिन हमारे रसोई के बर्तन में रुपया, सोना, चादी या हीरे जवाहरात नही पकेंगे पकने के लिए तो चावल, आंटा, तरकारी और अन्य पकवान ही है ं।
हमारे देश की करीब दो तिहाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और संपूर्ण राष्ट्रीय आय का करीव एक तिहाई अंश कृषि या इससे संबन्धित पेशा व्यवसाय से ही प्राप्त होता है । कृषि के उन्नति और प्रगति हेतु सरकारी, गैर सरकारी तथा निजी स्तर के संघ संस्थाओ द्वारा बहुत पहले से प्रयास हो रहे हैं लेकिन इतने प्रयासों के बावजूद भी यथोचित और समयोचित रूप से कृषि का विकास नही हो पा रहा है । किसी जमाने में अपने पड़ोसी मुल्क को खाद्यान्न विशेष रूप से धान और चावल का निर्यात करने वाला देश आज अपने ही नागरिकों के भरण पोषण के लिए हरेक वर्ष विदेशों से अरबों रुपये का खाद्यान्न आयात कर रहा है । यदि खाद्यान्न आयात न हो तो उस स्थिति में यहां भूखों मरने तक की नौवत आ सकती है । हम सभी के लिए इससे बड़ी और शर्म की वात क्या हो सकती है ?
कृषि एक एैसा व्यवसाय है जो तमाम क्षेत्रो से जुड़ा हुआ है । इसका सम्बन्ध सिंचाई, भूमि व्यवस्थापन, उद्योग, उर्जा, बैक, वन, भू–संरक्षण, सड़क, स्वास्थ्य, पशु पालन, सहकारी, विज्ञान और प्रविधि, अनुसंधान, जैसे तमाम क्षेत्रो से है । लेकिन इन सभी क्षेत्रों का कार्य संपादन करने का अपना–अपना तौर तरीका और प्रक्रिया है । करने के लिए सभी लोग कर ही रहे है लेकिन किसी का किसी से कुछ लेना देना नहीं है । एक आपस में समन्वय और सहकार्य का अभाव है । जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि क्षेत्र भुगत रहा है । कोई खर्च कर रहा हो, किसी तरह कर रहा हो आखिर खर्च तो हो रहा है, लेकिन फिर भी कृषि का विकास संतोषजनक रूप से नही हो पा रहा है इससे हम अनभिज्ञ नही है ।
कृषि क्षेत्र के विकास के लिए राज्य द्वारा बनाए गए नीति नियम अपर्याप्त नही है, सरकार की तरफ से हरेक वर्ष कृषि के विकास बजट में बढोत्तरी हो रही है, गैर सरकारी और निजी क्षेत्र भी प्रयासरत है लेकिन फिर भी संतोषजनक स्थिति नही बन पा रही है । इसका मुख्य कारण वास्तविक काम करने के बजाय प्रचारवाजी को ज्यादा महत्व दिया जाना है । इससे लगता है हम खेती की बातो से ज्यादा बातो की खेती को प्राथमिकता तो नही दे रहे हैं ? इस पर विचार, चिन्तन, मनन और विश्लेषण करने का समय आ गया है । अगर हम इसी ढर्रे पर चलते रहे और अपनी कार्यशैली में परिवर्तन नही किए तो इस पेशा का कभी उत्थान होने वाला नही है । आत्मनिर्भर कृषि, व्यवसायिक कृषि, आधुनिक कृषि, संमानित कृषि केवल नारा मे ही सिमट कर रह जाएगा ।
कृषि के विकास के लिए फसल विशेष के आधार पर उपयुक्त क्षेत्र का वैज्ञानिक परीक्षण के पश्चात योजना बनाना, कार्यान्वयन करना और खेती योग्य भूमि का चकबंदी व्यवस्था करने जैसे कार्यक्रम की शुरुवात करने की आवश्यकता है । हमारे देश के अधिकाशः किसानो के पास बहुत थोड़ी भूमि है और जो है वह भी छोटे छोटे टुकड़ों में बँटी हुई है, बिखरी हुई है । इन परिस्थितियाें में किसानों की खेती की लागत अधिक पड़ती है, कृषि यांत्रिकरण करने मे असुविधा और पैदा हुए फसलाें को ढोने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है । ऐसी परिस्थिति में चकबंदी जैसे कार्यक्रम संचालन की आवश्यकता और अधिक महसूस हो रही है ।
किसानों को समय से सिंचाई की सुविधा, खादाें और बीजों की पर्याप्त उपलब्धता की सुनिश्चितता, कृषि औजार और उपकरण में सरकारी अनुदान में बढ़ोतरी और निरन्तरता की व्यवस्था, कम ब्याज पर कृषि ऋण की सुविधा, किसानों द्वारा उत्पादन किए हुए कृषि उपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारन्टी जैसे कार्यक्रम केवल सिद्वान्त, प्रवचन और भाषण का अंश न होकर वास्तव में व्यवहारिक रूप से किसान को अनुभूति हो सके इस तरह के कार्यक्रम की व्यवस्था की जानी चाहिए । सरकारी, गैर सरकारी और निजी क्षेत्र से किसानों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली सेवा सुविधा वास्तविक रूप में, सही अर्थों में जरुरतमंद किसानाें तक पहुँचे इसके लिए सेवा सुविधा प्रदान करने की प्रक्रिया सहज और सरल हो इस तरफ भी संबन्धित क्षेत्र का ध्यान जाना जरुरी है ।
अभी तक के अनुभवाें के आधार पर यह देखा गया है कि कृषि और किसानों की उन्नति और प्रगति के लिए तमाम तरह की योजनाए बनाई जाती हैं, उसके विषय में खूब चर्चा परिचर्चा, संगोष्ठी और सेमिनार का आयोजना करके उसकी शुरुआत की जाती है । लेकिन उस योजना की अवधि समाप्त होने पर उसके सफलता÷असफलता के पर्याप्त समीक्षा बिना ही फिर दूसरी योजना को यह कहकर कि यह पहले वाली योजना से कहीं बेहतर है शुरुआत कर दी जाती है । कोई भी योजना अपने उद्देश्य में सफल हुआ÷असफल हुआ, किस कारण से हुआ उसकी समीक्षा और विश्लेषण के पश्चात अगर कोई नयी योजना की शुरुवात की जाती है तो वह हम सभी कृषि के क्षेत्र में लगे हए लोगो के लिए एक मार्ग दर्शन हो सकता है ।
खेती खर्च और उससे प्राप्त हुए प्रतिफल का विश्लेषण होना पड़ा । हरेक वर्ष कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ रहा है फिर भी यथोचित उपलब्धि प्राप्त नहीं हो पा रहा है । इसके कारणो की खोज होनी चाहिए । कृषि क्षेत्र में संलग्न सरकारी, गैर सरकारी तथा निजी क्षेत्र के लोग अपनी जिम्मेवारी पूरी कर रहे हैं या नही इसके विषय में तटस्थ और निष्पक्ष रूप से छानबीन होनी चाहिए । अच्छा करने वालों को सम्मानित और अपनी जिम्मेवारी तथा दायित्व पूरा नहीं करने वालों को दण्डित करन ेकी परम्परा की शुरुआत भी होनी चाहिए । रोजगार के लिए विदेश जाने वाले यूवा जनशक्ति को आकर्षित करने के लिए विशेष कार्यक्रम की आवश्यकता है । आवास, उद्योग स्थापना और कृषि भूमि के उपयोग के लिए सरकार द्वारा बनायी गयी नीति नियम का कड़ाई के साथ पालन करने की स्थिति बननी चाहिए । जमीन का खण्डीकरण हो रहा है उसे निरुत्साहित करने के लिए योजना और कार्यक्रम बनना चाहिए और इमानदारी के साथ उसका परिपालन भी होना चाहिए ।
रेडियो, टी.वी., अखवार, भाषण, गोष्ठी सेमिनार में हर जगह कृषि को प्राथमिकता दी जाती है, औपचारिक अनौपचारिक किसी भी कार्यक्रम में जहां भी जाय खेती की ही बातें, खेती की ही चर्चा लेकिन व्यवहारिक रूप में वह कितना चरितार्थ हो रहा है इसके विषय में जिम्मेदारी कौन लेगा ? कब लेगा ? अभी कितने समय तक धैर्य रखना पडेÞगा ? कब तक हम वास्तविक खेती की बजाय बातों की खेती में ही उलझे रहेंगे ? इसी में अभी कितना समय खर्च करते रहेंगे ? कबतक केवल बातों की खेती में अपन िबुद्धि और विवेक को लगाते रहेंगे ? कब तक अपनी असफलता का दोष दूसरे के सर पर मढ़ते रहेंगे ? यह या वह कहकर कब तक बहाना बाजी करते रहेंगें ? अपनी कमजोरी कब तक दूसरों के सर मढते रहेंगे ? अब तो गम्भीरता से खेती की बातें करनी चाहिए ।
इस पेशा में लगे हुए हम सब आत्मसमीक्षा करे, अपनी–अपनी जिम्मेदारी वहन करने में लगें । इससे हम अलग नही हो सकते यह समय की मांग और यथार्थ भी है । इस पेशा को मर्यादित बनाने के लिए संपूर्ण किसान और संबन्धित लोग लगे इसी में हम सभी का कल्याण है । समय रहते अब भी हम नही सोचेंगे, नही करेंगे तो हमारी अगली पीढ़ी हमें माफ करने वाली नहीं है । आशा है समय, परिस्थिति और आवश्यकता की गम्भीरता को सभी समझेंगे और बातों की खेती को विश्राम देकर वास्तविक खेती की बातों पर अमल करेंगे ।

 

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